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  • 26decemberborn 7w

    मिट्टी का जिस्म इक दिन तो राख होना ही है
    आस लगाऊँ भी क्यों जब खाक होना ही है

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    वादा न कर जो निभाया जा सकता नहीं
    टूटा आईना हूँ मुझे वैसा ही रहने दो अब

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    वक़्त गुज़र चला पर जख़्म गहरे आज़ भी है
    वक़्त के सोहबत सभी राज़ ठहरे आज़ भी है

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    नग़्मा-१७

    उम्मीद है के वह अभी तक हारा नहीं होगा
    माना के कोई उसका बना सहारा नहीं होगा

    वो छुएगा बुलंदीयाँ सारी जो चाहता दिल से
    ता-उम्र का पल भी किया गवारा नहीं होगा

    अभी तक के पड़ाव में ऐसा शख़्स न देखा
    पाक दिल उस जैसा कोई प्यारा नहीं होगा

    यूँ तो दस्तूर है जमाने का जो छिन लेता है
    इल्म है के हालातों का वो मारा नहीं होगा

    उसने तो राह पर अपने कितनों को ले चला
    डुब जाएगा कैसे उस सा किनारा नहीं होगा

    अभी सुर्ख़ ज़रूर हो जाती है निग़ाह मेरी
    ज़ीस्त में कोई फ़िर ऐसा दुबारा नहीं होगा

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    तुम ही जहान मेरा, तुम ही ख़ुदा हो
    जुड़ कर भी मैं, क्यों? तुम जुदा हो

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    तुम वो ख़्वाब हो जो आता-जाता टूटता दिखता है
    चैन-ओ-सुकूँ से ख़ुदी को हर बार छुटता दिखता है

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 8w

    नफ़रत से या मुहब्बत से तुम चाहे उस नज़र से देखो
    शमअ्' बुझेगी उस वक़्त तक का साथ ख़ुदा ने दिया

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 9w

    अभी नाराज़ हूँ ख़ुद से और शिक़ायतें भी बहुत रही
    काश! ज़िंदगी में इक पल ख़ुदी के लिए जिया होता

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 9w

    न तो बद'दुआओं का असर हो, न दुआएँ बे-असर हो
    दर-ब-दर इशरतों के माहौल में, कुछ ऐसा ऐ शहर हो

    ©26decemberborn

  • 26decemberborn 9w

    नग़्मा-१६

    क़रीब हो फ़ासलों के बावज़ूद तुम यहीं मुहब्बत है मेरी
    लब-ओ-लबाब बस कहे इतनी दास्ताँ-ए-उल्फ़त है मेरी

    चाँद-ओ-सितारे लाऊँगा कैसे जमीं पर जहाँ तुम रहती
    जन्नत वहीं है मेरे लिए जहाँ रहती हमेशा चाहत है मेरी

    मेरा ख़ुदा भी तुम हो, ईश्वर भी, परवरदिगार जो कहो
    जिस दरपर दुआएँ क़ुबूल होती ऐसी तुम मन्नत है मेरी

    पड़ाव उम्र का तय तो कर बहुत आया साहिल न कोई
    अब ठहराव चाहिए जो उस सुकूँ की तुम राहत है मेरी

    मुझे ठोकरों से अब लगाव सा हो गया है जान-ए-मन
    वाकिफ हूँ ख़ुद से तो तुम्हारे साथ की ज़रूरत है मेरी

    लौट तो हम दोनों भी न आएँगे दीवार रब की पार कर
    मौत से लिपट कर भी सोहबत हो तुम यह हैरत है मेरी

    ©26decemberborn