_harsingar_

nature worshipper

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Reposts
  • _harsingar_ 19w

    @nanhi_kalam तुम्हारे कहने पर कोशिश की है ��@jigna_a jigna आजकल तुम कम लिख रही जो या टैग नहीं करती @amateur_skm कहां हो भाई मैं tag तो देख ही लेती हूं कर दिया करो

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    जड़ हुई कल्पना जीवन की
    नए स्वप्न दिखलाए कौन
    भस्म हुए शब्द सब मन ज्वाला में
    नए वर्ण सिखलाए कौन
    क्षीर्ण हुई यौवन की ज्वाला
    नई अलख जगाए कौन

    श्वेत हुई वो धानी चूनर
    जो झूम झूम लहराती थी
    जम गई नदी वो आशाओं की
    जो कल कल कर इठलाती थी
    थम गई बयार अब जीवन की
    जो चमन मेरा महकाती थी

    इक नन्ही सी बूंद अभी
    इंद्रधनुष सी लहराई
    नेह भरे उस आमंत्रण को
    मैं टाल नहीं फिर पाई
    बरखा है उसने भेजी
    जज़्बातों ने ली है अंगड़ाई

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 27w

    जो ख़्वाब रात भर मेरा था
    सूरज ने पराया कर दिया
    मुट्ठी में धूप को समेटना चाहा
    इस दीवानेपन में वक्त ज़ाया कर दिया

    छोड़ा नहीं है ख़्वाब देखना
    खुद को परीशां करना आदत बन गया
    तुझको तो केवल चाहा था
    जाने कब प्यार इबादत बन गया

    दूरियों से कोई गुरेज़ नहीं था मगर
    यूं भूल जाना तेरा कयामत कर गया
    लाख समझाया इस दिल को मगर
    कमबख्त बगावत कर गया

    इस उम्मीद का क्या करूं
    हर मोड़ पे मिल जाती है
    जिस गली में तूने छोड़ा था
    नजर खुद उसी पे मुड़ जाती है

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 30w

    तेज़ हवाओं के डर से चिराग़ जलाना ना छोड़ देना
    दरकार हो रोशनी की गर रुख आंधी का मोड़ देना


    ठहरा कब था वक्त.. ये भी निकल जायेगा
    किरचें तमाम ले कर इंसा फिर संभल जायेगा

    डॉ सीमा अधिकारी

    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 30w

    बचपन फिर से जीना था
    मुझे पीहर आना था
    कुछ रुक जाती ना मां
    तेरी आंखों में मेरा मोल था
    ये जीवन अनमोल था
    तेरी आंखों में ये देखना था
    कुछ रुक जाती ना मां
    दर्द भी अब कहां दर्द रहा
    अपना दर्द तेरी आंखों में देखना था
    कुछ रुक जाती ना मां
    दुनिया की इस भीड़ में खो सी गई हूं
    मुझे खुद को अब ढूंढ़ना था
    कुछ और रुक जाती ना मां
    जीते जीते थक गई हूं सबके वास्ते
    खुद के लिए अब जीना था
    कुछ रुक जाती ना मां
    मैं भी खुदगर्ज हूं ये अब पता चला
    तेरे लिए भी अब जीना था
    कुछ और रुक जाती ना मां!

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 31w

    दूर बैठ कर अपनी बच्ची को परेशान हालत में नहीं देख सकती बहुत
    असहाय महसूस कर रही हूं खुद को
    @jigna_a @amateur_skm @flame_ @shriradhey_apt

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    हवाओं में जहर है, कुदरत का कहर है
    सहमी सी गजल है, मुंतशिर सी बहर है
    तेरा बंदा उदास है , इक तेरी ही आस है
    कुछ तो सुबूत दे , के तू आस पास है

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 32w

    ये क्या रंग है जिंदगी का
    छूट रहा है संग अपनों का
    उड़ रहा है रंग सपनों का
    माना अंत अनिश्चित अवश्यंभावी तब भी था
    पर क्रूर काल कभी भी ना इस कदर हावी था
    तांडव मौत का इतना भी प्रमादी ना था
    रख कर हाथ माथे पे हाल पूछ सकते थे
    जाने वाले को जी भर कर देख सकते थे
    चार जने अपनों को कांधा तो दे सकते थे
    क्या क्रूर रूप मृत्यु धर कर आई है
    सारी दुनिया पर मायूसी सी छाई है

    आशा ही जीवन है
    धैर्य मन स्पंदन है
    मानव की इच्छा शक्ति का
    साक्षी पृथ्वी का कण कण है

    रंग सपनों का फिर वापस आएगा
    घनघोर अंधेरा छंटेगा नया सूर्य मुस्काएगा
    हां, इंद्र्दनुष के रंग फिर आसमान पर चमकेंगे
    इंसा फिर मस्त हो नाचे गाएंगे
    माना रात थोड़ी गहरी है
    पर क्या कभी काल चक्र की कमान ठहरी है
    बदली कितनी भी गहरी हो बरस बरस थक जाएगी
    अटूट आस्था मानव जीवन की कभी न टूटने पाएगी
    श्वास चक्र है यह जीवन, इसे न टूटने देना है
    इक दिन हम सबका होगा धैर्य बनाए रखना है

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 32w

    गर्दिश-ए-दौरां = मुसीबत का समय
    गमख़्वार = दुख में साथ देने वाली
    मसर्रत= खुशी


    मौत से ली थी उधार ये जिंदगी
    हर सांस खुल कर ले लो
    फकत सांस की रफ्तार है ये जिंदगी
    मसर्रतों में काट लो
    तो गुलज़ार है ये जिंदगी
    रहे जो रंजीदा
    तो बस खार है ये ज़िंदगी
    खुद को समझो तुम कुछ भी
    करवाती हर किरदार है ये जिंदगी
    हर लम्हा हंस कर जी लो
    तो गमख़्वार है ये जिंदगी
    गर्दिश-ए-दौरां में सब्र थोड़ा कर लो
    देख लो उस पार है ये जिंदगी

    डॉ सीमा आधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 33w

    आवारा से अजनबी सुन ले ज़रा,
    यूं तो मुझे आवारगी पसंद नहीं
    फिर तुझसे क्यों नफरत नहीं
    रात रात जागना मेरी फितरत नहीं
    क्यूं नींद ना आने का सबब मालूम नहीं
    डरती थी बेवक्त हवाओं के झोंकों से
    इन बेवक्त हवाओं के चलने का अब डर नहीं
    पाबंद हूं मैं, वक्त की यूं तो
    वक्त के पंजों से आज़ाद हुई कब मालूम नहीं


    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_

  • _harsingar_ 34w

    तेग़-ए-कोह = पहाड़ की चोटी

    किसी को घेरती है जब कभी भी
    कितनी तन्हा होती है खुद भी ये तन्हाई
    बिखर जाती है वरकों पर लफ्ज़ दर लफ्ज़
    जब कभी ऊब जाती है ये तन्हाई
    सिमट जाती है धूप जब तेग़-ए-कोह में
    कितनी राहत देती है ये तन्हाई


    डॉ सीमा अधिकारी

  • _harsingar_ 34w

    #five_words

    बारिश, साड़ी , आँखें ,काजल होंठ
    काफी पहले दिए गए शब्द आज भेज रही हूं

    @political_guruji @jigna_a @amateur_skm क्या ख्याल है जिग्ना, सौरभ फिर से शुरू किया जाए क्या मुमकिन है ये @deepajoshidhawan #rangkarmi_anuj #go_win_the_heart


    आज फिर साड़ी का आंचल लहराने को जी चाहा है
    इक ज़माने के बाद
    काजल भरी इन आंखों ने फिर शर्म से झुक जाना चाहा है
    इक ज़माने के बाद
    अपने होंठों की लर्ज़िश को फिर आजमाने को जी चाहा है
    इक ज़माने के बाद
    बारिश से भीगे आंगन को फिर से निहारने को जी चाहा है
    इक ज़माने ये बाद
    तेरे अहसास भर ने दबी ख्वाहिशों को फिर से हवा दी है
    इक ज़माने के बाद

    डॉ सीमा अधिकारी

    डॉ सीमा अधिकारी
    ©_harsingar_