aaditya

hamlet: o fuck. (exit hamlet)

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  • aaditya 13w

    और फिर?
    फिर लौटती हैं वे प्रतीक्षाएँ– वे इच्छाएँ, जिनका कोई नाम नहीं।

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    धीरे-धीरे आख़िरकार अब सब कुछ
    मौसम के मुताबिक़ हो रहा है।
    मार्च लगने वाला है, ठंड कम हुई है
    और तापमान उतना है जितना इस समय होना चाहिए।
    शाम का सूरज अब थोड़ी देर से डूबता है।
    सूरज को चमकने से रोकने वाला अब कोई नहीं है।
    कभी-कभी लगता है मेरा कुछ हिस्सा
    सर्द मौसम के साथ पीछे छूट गया है।
    सूरज ढलने और चाँद के उगने के बीच में
    एक अंधेरा होता है, जो मुझ में बचा हुआ है।

    ख़ैर!
    सबसे सुंदर कविताएँ हमेशा सबसे ज़रूरी हिस्से के बिना लिखी जाती हैं।
    सबसे सुंदर प्रेमिकाएँ हमेशा सबसे नालायक लड़कों को मिली हैं।
    शायद प्रेम की पूर्णता नाकामी से ही सम्भव है।
    लेकिन मेरा अँधेरापन और मेरी सारी नाकामी
    मैं एक दस्तावेज की तरह तुम्हारे लिए लिखता आ रहा हूँ।
    मानो तुम्हारा स्पर्श मुझे बना देगा सफ़ल
    और मिल जाएगा मुझे कुछ वापस जो छूट गया था
    कहीं उसी बुरे मौसम में।

    जानती हो
    बहुत लिखने वाले प्रेमी एक उम्र के बाद चुप हो जाते हैं।
    उन्हें अपने जीवन का इंतज़ाम कविताओं के बाहर करना होता है।
    वे जितना लिखते हैं, उतने ही कम प्रेमी होते जाते हैं।
    फिर आप उनके चेहरे नहीं
    बस उनकी स्मृतियाँ याद रखने की कोशिश करते हैं।
    कभी-कभी प्रेम नहीं बस आवाज़ें ठहरती हैं

    जिनका शोर बस एकांत में होता है।

    ©आदित्य

  • aaditya 13w

    when is a monster not a monster?
    oh, when you love it.

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    every valentine
    i go back to your house,
    where i abandoned my heart
    a keyring, and few blouse.

    your house got same colour
    and window same blinds,
    same trees, same streets
    and your smell in the wind.

    i almost saw you coming
    and my heart little sank,
    i felt so lonely all of sudden
    like i am in love again.

    you walk with some flowers
    where i wept in the streets,
    where my verbs turned blue
    but our hearts couldn’t meet.

    you climb your stairs
    with my love neath your tongue,
    like your lips treasured my taste
    but your mouth never sung.

    you ring the bell finally
    and your lover is home,
    you gift her the flowers
    now your hands feel alone.

    after crying my heart
    i leave your town,
    i grasp your sorrow
    and softly lay it down.

    if my grief ever halves
    i will never love you less,
    i will dig you from my nails
    and make my flesh confess.

    i will write you in sonnets
    till the sky is blue,
    because words are from where
    love cries through.

    i change my clothes
    and sleep back drunk,
    coz hurt is the always
    half of the fun.

    i wake up with a smile
    feeling young in the pain,
    so that next valentine

    i visit your house, again.

    ©aaditya

  • aaditya 14w

    is the blood on your hands dry? is it slowly disappearing?mine isn't.

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    my therapist asks
    ‘why i sleep so much?’
    assuming i am sad mostly
    nowadays.

    i reply my heart wants
    someone to swallow my grief
    and flee.
    my skin needs someone
    to crawl their hand
    and as soon as they touch
    i burst into tears.
    my mouth wants
    a handful of sorrow.
    warm, dark, and black in colour.
    he replies ‘you don’t want someone
    with handful of sorrow.
    what it needs is mouthful of love.’

    his medicine tries
    to make me forget
    a childhood memory stuck right on the
    tip of my tongue which i am trying to speak
    since decades.

    he prepares ketamine
    to inject in my veins.
    i pretend my heart is ready
    to bear its pain.
    i pretend breathing hurts
    but not the needle.

    before i leave he asks
    ‘how your grief feels now?’
    i reply ‘it feels good

    because it’s mine.’

    ©aaditya

  • aaditya 14w

    if i loved you less, i might be able to talk about it more.

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    ~how the dead do grieving

    my tears have been clogged for days.
    i don’t want to clean but the room smells awful
    and clothes have been piled up on the table.
    for the past one hour, i am still in bed.
    it’s spring again, the sky is pink
    and sunlight pours through the curtain after months.

    for the past few months, i carry your void in my morning hours.
    i walk to the grocery store, instead of driving.
    i forget groceries in the store and realise when i am halfway home
    thinking why my fingers aren’t feeling the burden of my past.

    i’ve been thinking this is how the dead grieve.
    living the same life, again and again.
    but yesterday, hurrying from the grocery store,
    i scar myself on the sidewalk
    spilling your favourite coffee on street.
    i gave thought about it the whole day
    should i stop hurrying and accept what is going in my head?

    when you finally accept things
    you walk through hell and watch closely
    specks of sanity which are still left on your skin.
    you try to trace the chaos you left behind
    through your tears.
    you want to call someone one last time
    and if not call then, a letter, a kiss or a one night stand.

    but there are moments while walking outside the grocery store,
    i catch my glimpse, through the glass door.
    i watch my freckles, my fake smile with blowing hair
    and my eyes, with your clogged tears and your love untethered.
    your sadness is not clung to my face now but still somehow,
    i feel it changing.
    my smile seems fake, deprived of any love or joy.

    and even after everything, to seek my joy again
    i want to kiss you one last time, and forget to breathe you out.
    you’ll point a gun at my head, and beg to escape.
    you’ll try to break my heart and carry leave the debris, like last time,
    but realise i am not letting you out.

    i will swallow you as my guilt, so that from now on
    when my tears are clogged, and i waste my morning hours
    you bleed through my mouth, burning my oesophagus
    and make me forget, the delicacy of hurt.
    people grieve in goodbyes

    i will grieve in love~

    ©aaditya

  • aaditya 14w

    कभी कभी उदासी भी थक जाती है!

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    कल एक पुरानी किताब पढ़ते तुम्हारे कुछ ख़त मिले हैं।
    उन्हें ले कर ठंड में छत पर बैठा हूँ।
    तुम्हारे शब्दों में अब एक ठंडापन है जो मुझे समझ नहीं आता।
    कोई बात हुई होगी ना? हम इतने दूर तो कभी नहीं थे।
    हम शायद अब एक दूसरे से कट गए हैं।

    वो मिलने से पहले हमसे कहती कोई एक रंग चुनो
    फिर शाम को डेट पर उसी रंग की ड्रेस पहन कर आतीं।
    उनके आने पर कैफ़े की टेबल पर रखे फूल
    उनके ड्रेस के रंग में बदल जाते थे।
    और हमारे गाल गेंहुआ होते हुए भी लाल।
    उनकी हँसी तय करती थी आज धूप होगी या बादल।
    उन्हें हिंदी छोड़ के बाक़ी सारी भाषाओं के गीत पसंद थे,
    और हमें उनका मतलब समझाते वो।
    हम जब भी पूछते इस लाइन का मतलब क्या है
    हंस कर हर बार खुदसे कुछ भी समझा देतीं।
    हम पूछते हर बार गायक अलग बातें क्यों बोलता है
    तो ग़ुस्सा कर जवाब आता तुम्हारी हरकतों के हिसाब से मतलब बदल देते हैं।
    अडैप्टेशन यू नो!


    लेकिन तुम्हारे ख़तों में अब कोई रंग नज़र नहीं आता।
    सारे शब्द अब स्याह हो गए हैं।
    तुम ना हो तो कोई रंग महसूस नहीं होते
    और ना ही इन ख़तों के जवाब देने को शब्द मिलते हैं।
    जबसे तुमने मुझसे पढ़ना छोड़ा है, मैं ठीक ठीक लिख भी नहीं पाता।

    जानती हो
    जब कोई समझाने वाला ना हो तो
    मातृभाषा में लिखे शब्द भी जटिल हो जाते हैं।
    पढ़ने की हिम्मत नहीं होती, बस मुस्कुराना होता है।
    प्रेम के बिना प्रेम-पत्र पत्थर बन जाते हैं
    और आपको लगता है की कुछ भी अमर नहीं होता।
    फिर आप सारे ख़तों को जेब में रख कर छत से नीचे आ जाते हैं।
    और इस तरह से आपका प्रेम निरर्थक होते हुए भी बड़ी सहजता से

    अपना कल्प पूरा करता है।

    ©आदित्य

  • aaditya 52w

    the last dance.

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    often, I write my poetry as
    my tears fall.
    the paper soaking
    the imprints of broken pieces

    while my grief dries dead.

    ©aaditya

  • aaditya 52w

    अपने शब्दों से ख़ौफ़ खाता लेखक
    असल में अपने शब्दों में भी प्रेम के ना मिल पाने की नाकाबिलियत से डरता है।
    फिर भी मैंने हमेशा तुमको ठीक ठीक लिखने की कोशिश की है।
    अगर प्रेमी लिखना जानता है तो कभी मर नहीं पाता।
    वह ना चाहते हुए भी खुदको ज़िंदा रखने की कोशिश
    अपनी कहानियों में करता है।
    ठीक उसी तरह जैसे की एक तैराक कभी
    आत्महत्या करने को नदी में नहीं कूदता।
    उसकी जगह अपने छत पर मज़बूत पंखा लगाने की कोशिश करता है।

    पर शायद तुम्हें ठीक ठीक लिखने की कोशिश इस लिए करता हूँ
    की मेरे ना रहने पर भी मेरा प्रेम तुम्हारे समक्ष रहेगा।
    मैंने अपनी कल्पना में भी हमेशा खुदको तुम्हारा पाया है।

    जानती हो
    प्रेम को कभी अमर नहीं होना चाहिए।
    एक उम्र हो जाने के बाद उसका मर जाना ठीक रहता है।
    ज़्यादा उम्र होने पर प्रेम डरावना हो जाता है
    क्योंकि दो प्रेमी कभी उतना ज़िंदा नहीं रहते।
    वह धीरे धीरे मरते जाते हैं।
    फिर आप साथ तो सोते हैं पर बिस्तर के किसी कोने पर
    आपका प्रेम अकेला पड़ा रहता है।
    अपने मृत्यु की प्रतीक्षा में।
    ठीक उसी तरह जैसे किसी गाड़ी से कुचले जाने पर
    सड़क के एक कोने पर जानवर पड़ा रहता है।
    उसको जीवन से ज़्यादा मौत की ज़रूरत होती है।
    ठीक उतनी जितनी एक डरे हुए लेखक को ज़रूरत होती है,

    प्रेम की।

    ©आदित्य

  • aaditya 52w

    मेरी उदासी तुम्हारे प्रेम तक ले जाने वाली अदृश्य सीढ़ी है।
    जिसकी बढ़ती ऊँचाई के साथ मैंने हमेशा
    खुदको तुम्हारे थोड़ा और नज़दीक पाया है।

    ऊँचाई बढ़ने पर मैंने पाया की मेरा प्रेम डरा हुआ था।
    मैंने उसको अपनी मुट्ठी में क़ैद करके रख लिया
    और बिना किसी और बिना किसी को दिखाए ख़ूब रोया।
    अक्सर इतना रोना काफ़ी होता है की आपके मन में
    उदासी की जगह थोड़ा-सा प्रेम रह जाए।

    जानती हो
    दुःख को हमेशा प्रेम के साथ मिल कर पारदर्शी होना चाहिए।
    इतना की जब दुखी होके मैं अपने ईश्वर से तुम्हारी बुराई करूँ
    तो मेरे उदासी भरे संवाद को तुम प्रेम-मात्र समझो।
    मेरी प्रार्थनाएं वो आँसूँ बन जाएँ जो मेरी आँखों से होते हुए
    तुम्हारे होठों तक पहुँचे।

    जिन्हें तुम अपने मन में मेरा शोक
    और मैं संकोच करते हुए मेरे हिस्से का प्रेम समझ रख लूँ।

    ©आदित्य

  • aaditya 52w

    जब लेखक किसी स्त्री से प्रेम करता है
    तो उसके सामने उसके सारे शब्द फीके पड़ जाते हैं।

    किन्तु जब कोई स्त्री किसी लेखक से प्रेम करती है
    तो उसे लेखक से ज़्यादा अलौकिक उसके लिखे शब्द लगते हैं।

    जानती हो
    हमारे लिए कोई उतना ही प्रेम लिख पाता है
    जितना खालीपन उसके मन में होता।
    उससे ज़्यादा ना कोई अपना लेख और
    ना ही अपने प्रेम का हिस्सा देना चाहता है।

    और ना ही आप उससे ज़्यादा सह पाते हैं।

    ©आदित्य

  • aaditya 52w

    लिखने में हमेशा लेखक का एक हिस्सा खर्च हो जाता है।
    और जब कहानी ख़तम होती है तो आपको खुद नहीं पता होता है
    आप उस कहानी के मुख्य किरदार के तौर पर उभर के आए हैं
    साइड रोल या फिर हमेशा की तरह विलेन।
    पर ध्यान से देखा जाए तो मैं हमेशा वो किरदार रहा हूँ जिस पर ज़्यादा कोई ध्यान नहीं देता।
    जो चुपचाप अपना काम कर के साइड से निकल जाता है।
    हीरो और विलेन तो भूल जाओ हमें खुद डायरेक्टर नहीं ध्यान दे रहा होता है।

    हमारा दिल कभी हीरोइन पर नहीं बल्कि उसकी बेस्ट फ्रेंड पर आता है
    और वो भी हमेशा की तरह बिना हाँ बोले किसी और के साथ निकल जाती है।
    हम वो हैं जिनकी बस किसी इम्पोर्टेन्ट एग्जाम से पहले या तो ख़राब हो जाती है
    या भीड़ इतनी होती है की धक्का देके भी चढ़ नहीं पाते।
    हमारी ट्रेन स्टेशन से ज़्यादा समय हमेशा आउटर पर बिताती है।
    जब हमें रिजर्वेशन मिलता है तो कभी भी बगल वाली सीट पर कोई सुन्दर लड़की आके नहीं बैठती
    बल्कि एक दादा होते हैं जो हमारी विंडो सीट बेटा-बेटा कह के हथिया लेते हैं
    और हमको अप्पर बर्थ पर टांग दिया जाता है।

    हम एग्जाम में चिट लेके जाते हैं तो उस दिन खुद प्रिंसिपल राउंड पर निकला होता है।
    हमारी शकल देख कर टीचर हमें बिना कुछ किये ही बाहर भेज देता है।
    हम पढ़ाई में सबसे ज़्यादा मेहनत करते हैं पर पास हमेशा बॉर्डर पर होते हैं।
    फिल्म और सीरीज में हम कभी मेन हीरो से कनेक्ट नहीं करते
    बल्कि उसको जीते हैं जो हमेशा ब्रोकेन बट ब्यूटीफुल टाइप होता है।

    हम भगवान में इतना मानते हैं की अंत में नास्तिक हो जाते हैं।
    हम कोई काम बस उतना कर पाते हैं जितना जीने भर के लिए काफी होता है।
    हमको घर वाले सबसे ज़्यादा प्यार से तभी बुलाते हैं जब कोई काम करना होता है।
    गर्मी में कूलर में पानी भरने से लेके दिवाली में घर के जाले मुंह पर गिराते हुए हम ही साफ़ करते हैं।
    बारिश होती है तो छत से भाग के कपडे लाने का काम हमारे सर ही आता है।

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    हम इतने शर्मीले होते हैं की कभी धूप वाला चश्मा लगा के नहीं जाते क्योंकि
    मन में शक रहता है की लोग कार्टून समझेंगे।
    हम बाल कटाने सैलून नहीं नाइ की दूकान पर जाते हैं और कभी ये नहीं बताते
    की बाल कैसे काटना है।
    उसके 'कैसा रहेगा' पर हमारा जवाब बस इतना होता है की 'छोटा कर दो।'

    हम लोगों की बर्थडे हमेशा रिमाइंडर पर लगा के रखते हैं पर हमेशा विश करने वाले दिन जल्दी सो जाते हैं।
    शादी-बियाह में हम लोगों के ज़िद्द करने पर भी कभी 'सात समुन्दर पार' पर नाच नहीं पाते बस कोने में खड़े होक गुलाबजामुन का मज़ा लेते हैं।
    डी.पी के नाम पर हमारे कोई रैंडम इंटरनेट से डाउनलोड हुई फोटो होती है।
    हम ज़माने से सिंगल रहते हैं पर ज्ञान इतना होता है की शादी-शुदा लोगों के झगडे भी सुलझा देते हैं।
    हम हमारे सारे दोस्तों के बेस्ट फ्रेंड होते हैं पर हमारा बेस्ट फ्रेंड कोई नहीं हो पाता।

    हमारी सलाह को घर में कोई सीरियस नहीं लेता है।
    टीचर कभी हमारा नाम नहीं याद रखते बल्कि हमारे दोस्त से हमारे बारे में पूछते हैं की वो जो लड़का तुम्हारे साथ रहता था कहाँ गया।
    सड़क पर चलते चलते हम अक्सर बॉलिंग वाला एक्शन करने लगते हैं
    किसी से मिलना होता है तो हम हमेशा 10 मिनट पहले पहुँचते हैं पर सामने वाला हमेशा सॉरी कहके आधा घंटा लेट आता है।
    हमको न ढंग से अंग्रेजी आती है न ही हिंदी। बस बीच में कहीं झूल रहे होते हैं।

    रिश्तेदार हमेशा हमको अपने बच्चों की कहानी सुना के चले जाया करते हैं।
    हम कभी कोई नशा नहीं करते पर दोपहर का खाना खा के 4 घंटे सोते हैं।
    लड़ाई में हम हमेशा सुनाने के बजाय शांत रहके गुस्सा दिखाते हैं
    और जब कोई बेइज़त्ती करता है तो लाइव लड़ने के जगह हम उसको अपने मन में सुना के हराते हैं।
    हमसे ज़रूरी वादे अक्सर टूट जाते हैं और पहले ब्रेकअप के बाद फुट फुट कर रोते हैं।
    भिखारी को हम कभी सिक्का नहीं 10 की नोट देते हैं।
    हमारी प्रेमिका हमसे हमेशा शादी के बाद मिलती है।

    इतना कुछ हो रहा होता है फिर हम खुद को एक कहानी में लिखते हैं
    और थोड़ा-सा फिर से खर्च हो जाते हैं।

    ©आदित्य