agyaanee

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  • agyaanee 6h

    गणतंत्र दिवस

    यह मात्र देश नहीं, एक विचार है,
    सभ्यता का धाराप्रवाह संचार है,
    जिस गणतंत्र का आज मना रहे हैं उत्सव,
    ग्रंथों में ही हमारे, निहित ये संस्कार है।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 2d

    नेताजी

    कुछ नेता ऐसे हुए जिनके जाने के बाद उनका 'छद्म-यश' ढलता चला गया,
    और
    कुछ नेता ऐसे हुए जिनके जाने के बाद उनका 'कीर्ति-यश' बढ़ता चला गया

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 3d

    सियासत

    बड़ी अमन-ओ-बरक़त है मुल्क़ में,
    चलो सियासत की जाए।
    किसी मंदिर को फूँक दें,
    कहीं मस्जिद तोड़ी जाए।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    घर

    वापस लौटने की खुशी में,
    दिन सरपट बीत जाता है
    चार दीवारों के भीतर ही,
    जब पूरा संसार नज़र आता है।

    उन चेहरों को मुस्कुराते देखना,
    होता है मात्र लक्ष्य जीवन का
    उन आँखों का ख़्वाब,
    जब ज़ाती अरमान बन जाता है।

    सब तराने लगते हैं बेसुरे,
    वो हँसना कानों में ऐसा रस घोल जाता है
    दुनिया की दावतों की कौन बिसात,
    जब मेहनत का निवाला कोई प्रेम से खिलाता है।

    अस्तित्व खोना ही अस्तित्व लगता है,
    जब 'मैं' 'हम' में सराबोर हो जाता है।
    लकड़ी-पत्थर में उठ पड़ती हैं तरंगें,
    और ढांचा मकान से तब 'घर' हो जाता है।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    जिन्हें मिरे अल्फ़ाज़ चुभा करते थे,
    सुना, अब ख़ामोशियाँ गूंजती हैं उन कानों में।
    वो छटपटा रहे हैं मिरा मशविरा सुनने को
    जो किया करते थे गिनती मिरी दीवानों में।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    अपने

    मैं ख़्वाब जुटाता हूँ, वो जुड़ने नहीं देते
    खींच लाते हैं 'अपने', मुझे उड़ने नहीं देते

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    उनकी गाथा, क्या कोई लिख पाए,
    कलम में वो अपना लहू भरते हैं
    सिंधुतल से पर्वतराज तलक जो
    हम सब का स्वातंत्र्य लिखते हैं

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    इंसानी फ़ितरत

    दूसरे की उड़ान काटने का,
    पुरज़ोर जश्न मना रहे हैं।
    आज लोग छतों पर, पतंग उड़ा रहे है।

    ज़मीं को तो कर चुके हैं मिलक़ियत कब की,
    'इंसानी फ़ितरत' का परचम आज,
    फ़लक़ पर भी लहरा रहे हैं।

    आज लोग छतों पर, पतंग उड़ा रहे है।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    दिखावा क्या करना,
    जो हैं, उस होने से किस बात का डरना।
    श्रृंगार परिचय है कुंठित मन का,
    चेहरे ऊपर चेहरा जैसे, बाहर जीना अंदर मरना।

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee

  • agyaanee 1w

    पतंग

    पतंग जितना ऊपर जा रही थी,
    उतनी शांत और स्थिर नज़र आ रही थी
    जितना नीचे आती थी,
    उतना विचलित दिखती, यहाँ वहाँ गोते खाती थी

    नीचे हर दूसरी पतंग से,
    अनायास उलझना चाहती थी
    न किसी को उड़ने देती थी,
    न स्वयं ही उड़ पाती थी

    मनुष्यों के बीच,
    शायद वो भी मनुष्य हो गई थी
    उड़ पाने के अहंकार में,
    गुणों से, कहीं बड़ी हो गई थी

    आकाश की विशालता ने
    शायद उसे झकझोरा था,
    केवल एक डोर पर निर्भर है उसकी उड़ान
    उसके अंतर्मन ने ये बोला था

    शायद ऊपर पहुँच कर सब
    साफ साफ नज़र आ रहा होगा
    संकीर्णता और कुंठा का नीचे छूटना,
    उसे उर्ध्वगामी बना रहा होगा

    -अज्ञानी-
    ©agyaanee