anandbarun

https://youtu.be/egx9JmfpaQ8

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  • anandbarun 19h

    आशा

    विस्मृति की गह्वर गहरी
    गुम जाती है कित आपा
    जठराग्नि निस्तेज हो रही
    धधकाओ फिर इक स्यापा
    आँच अंतरे अस्ताचल को
    लहका लो रे वो लावा
    भ्रमित कोहरे कर जाती हैं
    जो सूरज की भी ज्वाला
    झोंक चाह की झंझावाती
    उड़ा ही जाती जड़ जाला
    पार अंधेरी रात घनेरी
    उगने को है सत आभा
    छोड़ अहम की अंधकोठरी
    जग आओ रे बन आशा
    चेतन मन निश्चेष्ट पड़ा है
    बस दो इसको इक धापा
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    परिपूर्णता!

    ज़िंदगी बस सहजता से बिताई जाए
    रहन-सहन में सरलता अपनाई जाए
    जो सीखते आए हैं उन्हें भुलाई जाए
    नव उल्लास पल-पल में जगाई जाए
    चार दिनों में इक कारवाँ बसाई जाए

    सृष्टि की सुंदरता मन में समाई जाए
    इसे सतत संवारते फिर सजाई जाए
    सौभाग्य पे अपने सदैव इतराई जाए
    एक रूहानी मासूमियत कमाई जाए
    आस के दिए हर जर्रे में जलाई जाए
    ©anandbarun

  • anandbarun 1w

    (कविता)

    उभरे थे अंतर्मन में
    अकस्मात इक दिन
    उकेर दी थी मैने तुझे
    अनायास ही पलछिन
    असंगत से इक पृष्ट पे
    फिर तुम हो गए थिर
    संग मेरे रच-बस गए
    सुकोमल भावों में भिन
    उतरे अभिव्यक्ति बन के
    निखरते मेरे हेतु नित
    सारथी मेरे सबसे सच्चे
    ठहरे अंतर सखा अभिन्न
    तलाशते नई सीमाऐं
    पार जिसके सहज खिल
    छू लेने को आतुर हुए
    शब्दों की संपदा गिन
    काश कभी ऐसा जगे
    तुम अमर हो मेरे बिन
    ©anandbarun

  • anandbarun 2w

    स्तब्ध

    सर्द तो थी रातें
    सूरज न खिला फिर से
    बादल उतर आए जमीं पे
    और बूँदों की झरी लागे
    धरा ने झीनी चादर ओढ़े
    फुनगियों पे थरथरी ठहरे
    पेड़ों की स्तब्धता खले
    अंधेरों में सफेद रौशनाई से
    नहाई है आकृतियां कैसे
    स्निग्ध रुई सी फाहें
    उतर रही है परकोटे
    निस्तब्धता में खलल न पड़े
    मगन हूँ मैं बर्फ में ठंडे
    लड़ रहा हूँ अंतर उष्मा से
    कि कहीं कोई ना जगा दे
    ©anandbarun

  • anandbarun 2w

    गीत

    आ जाओ कि हैं दरम्यां
    वायदों के अनछुए से पहरे
    हुई क्या अब भी देर है
    कि जाना क्यूं है परे

    जो ख़्वाव हमने बुने थे
    बिखरने क्यूं लगे ऐसे
    सपने अनकहे से
    अब क्यूं हैं अड़ने लगे

    कदम हैं थम से गए
    हुए जो ओझल नज़र से
    नहीं थी ऐसी मजबूरी
    कि राहें अलग होने लगे

    जाओ तो ले जाओ
    हवाओं से महक अपने
    ठहर से जो गए हैं
    सांसों में फना हो के

    कहाँ तक बेखुदी की रातें
    तारों से करे बातें
    जिऐं तो किस हाल में
    कि अब दिन नहीं खिलते

    मिले थे जो फितरत से
    झुठलाऐं अब कहो कैसे
    ये वक्त बहता जाऐ
    दूर हो रहे किनारे

    न जाने क्या है किस्मत में
    नहीं देखेंगे पलट के
    कि ये आस जब भी जाए
    तेरा अक्स बस नज़र आए

    एहसास जम से गए
    आहों की हुई बारिशें
    बेगाने से रुत रीते
    पराए सब लगने लगे

    कदम ये अब डगमगाए
    बरबस किधर को जाए
    डगर अंजाने हुए
    यकायक अंधेरे घिरते से

    आ जाओ कि हैं दरम्यां
    वायदों के अनछुए से पहरे
    हुई क्या अब भी देर है
    कि जाना क्यूं है परे
    ©anandbarun

  • anandbarun 3w

    मोल

    ख़्वाहिशों से जवानी
    रहती है पाँव दबे आती
    उम्र-ए-दराज़ के सदके
    पल-पल खुशरंग मनहारी
    भर जीवन खिलखिलाती
    खत्म नहीं इक ज़िंदगानी
    रहे साँसों में जो उमंग जारी
    पड़े अंत पे आशा भारी
    दो पल की और ज़िद पे वारी
    न्यारी ख़ज़ानें दुनियावी सारी
    ©anandbarun

  • anandbarun 3w

    जब मैं छोटा बच्चा था
    खुशबू में खो जाता था
    बेकरी में रंग-बिरंगा
    स्वाद का ख़ज़ाना था भरा
    सुगंध से महमहाते राह
    घुलते जाते अंतर्तम एहसास
    जब स्कूल आते-जाते गुजरता
    मन ही मन मैने ठान लिया था
    मेरा बड़ा होने का सपना
    आएगा इक दिन ऐसा
    इन सबका स्वाद ले पाऊंगा
    सुबह से रात तक खाऊंगा
    ©anandbarun

  • anandbarun 3w

    दिशा हारा..

    हर पल है सौभाग्य का कि जीना नहीं है सजा
    गवारा नहीं है कोसना कि जीना नहीं है सजा

    यह पल है मात्र अपना कि बीता नहीं बस का
    संवारना है हर सपना कि जीना नहीं है सजा

    भाग्यवान हम हैं इतना कि ज़िंदा हैं अभी यहाँ
    शीश नित उन्नत रखना कि जीना नहीं है सजा

    सुनाना नहीं दुखड़ा कि रोना क्यूं कर व्यर्थ का
    सीख है जो भी बिगड़ा कि जीना नहीं है सजा

    अड़चनों का हो तांता कि राह सही है बतलाता
    हमें हर हाल है निखरना कि जीना नहीं है सजा

    रूबरू होना रोज सूरज, चाँद, तारों से है मजा
    प्रशंसा में है नहीं रुकना कि जीना नहीं है सजा

    जल जीवन का आधार कि महासागर है भरा
    रुको ना कहती नदिया कि जीना नहीं है सजा

    जंगल, खेत, पहाड़, महसूस कर यह आबोहवा
    धरा पे है स्वर्ग का समा कि जीना नहीं है सजा

    भर ले यह प्राणवायु कि सिहरा है बयार ताजा
    हर मौसम का ले मजा कि जीना नहीं है सजा

    हमारी हदें तय करता कि शिकायतें हैं छलावा
    जो खुलकर जी लें ज़रा कि जीना नहीं है सजा
    ©anandbarun

  • anandbarun 4w

    वचन

    मोल-तोल के बोल हे मनवा
    वचन के है बड़ रूप छलावा
    जीव-जगत एक ऐसा आवा
    अनायास ही, उगले है लावा
    जिह्वा करे है कितना बलवा
    सोच सहज ही बतला जाता
    माथा-पच्ची व करत निहोरा
    जलता मन, रहे आग-बबूला
    एक संभाले है दूजा फिसला
    होए हताहत खुद से निगोड़ा
    ©anandbarun

  • anandbarun 4w

    @gannudairy_ #rachanaprati131
    जब भी मैं गुरू गोबिंद सिंह जी के ये शबद पढ़ता हूँ तो उन्हें अंतर्मन में अनुभव करता हूँ। हृदय करुणार्द्र और साहस से सराबोर हो जाता हूँ।
    धन श्री वाहेगुरू��
    गुरू जी दा खालसा, गुरू जी दा फतेह��

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    शबद

    देह सिवा बरु मोहि इहै सुभ करमन ते कबहूं न टरों।
    न डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै करि अपुनी जीत करों ॥
    अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
    जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों ॥
    ~ गुरू गोबिंद सिंह

    हे शिवा (परम् पिता परमात्मा)! मुझे यह वर दें कि मैं शुभ कर्मों को करने से कभी भी पीछे न हटूँ। जब मैं युद्ध करने जाऊँ तो शत्रु से न डरूँ और युद्ध में अपनी जीत पक्की करूँ। और मैं अपने मन को यह सिखा सकूं कि वह इस बात का लालच करे कि आपके गुणों का बखान करता रहूँ। जब अन्तिम समय आये तब मैं रणक्षेत्र में युद्ध करते हुए मरूँ।
    ( साभार: विकीपीडिया)