anita_sudhir

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Aakhya student of poetry master of chemistry

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  • anita_sudhir 1d

    काश

    पहले

    अंधेर नगरी चौपट राजा
    *टका सेर भाजी टका सेर खाजा*

    अब

    अंधेर नगरी चौपट राजा
    *सवा सेर भाजी मुफ्त में खाजा*

    काश ....

    अंधेरी न नगरी रहे न चौपट राजा
    *टका सेर भाजी हो और चार टके का खाजा*

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 1w

    दलबदल

    चुनावों का समय आया।
    पुराना दल कहाँ भाया।।

    टिकट जब दूर होता है।
    भरोसा धैर्य खोता है।।
    कहाँ फिर ठीकरा फोड़े।
    विधायक को कहाँ तोड़े।।
    ठगी जनता भ्रमित सुनती
    सभी ने झूठ जो गाया।।
    चुनावों का समय आया।
    पुराना दल कहाँ भाया।।

    लगाती दौड़ सत्ता जब।
    मुसीबत में प्रवक्ता तब।।
    कहाँ से तर्क वह लाए
    कि बेड़ा पार कर पाए।
    मची तकरार अपनों में
    तुम्हीं ने ही अधिक खाया।।
    चुनावों का समय आया।
    पुराना दल कहाँ भाया।।

    बड़े ही धूर्त बैठे हैं ।
    सभी के कथ्य ऐंठे हैं।।
    बदलते रंग सब ऐसे।
    मरें कब लाज से वैसे।।
    कहानी पाँच वर्षों की
    अजब यह दलबदल माया।।
    चुनावों का समय आया।
    पुराना दल कहाँ भाया।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 2w

    मकर संक्रांति

    मकर राशि में सूर्य जब, करें स्नान अरु दान।
    उत्सव के इस देश में, संस्कृति बड़ी महान ।।

    सुत की मङ्गल कामना, माता करे अपार।
    तिल लड्डू को पूज कर,करे सकट त्यौहार।।

    मूँगफली गुड़ रेवड़ी,धधक रही अंगार ।
    नृत्य भाँगड़ा लोहड़ी,करे शीत पर वार ।।

    खिचड़ी पोंगल लोहड़ी, मकर संक्रांति नाम।
    नयी फसल तैयार है, झूमें खेत तमाम ।।

    रंग बिरंगी उड़ रही ,अब पतंग चहुँ ओर ।
    मन पाखी बन उड़ रहा, पकड़े दूजो छोर।।

    जीवन झंझावात में ,मंझा रखिये थाम ।
    संझा दीपक आरती ,कर्म करें निष्काम ।।

    उड़ पतंग ऊँची चली, मंझा को दें ढील।
    मंझा झंझा से लड़े ,सदा रहे गतिशील।।

    ऋतु परिवर्तन जानिये, नव मधुमास बहार।
    पीली सरसों खेत में ,धरा करे शृंगार।।

    उर में प्रेम मिठास से, लिखिए पर्व विधान।
    संकट के बादल छँटें,आये नव्य विहान।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    संकल्प

    शुभारम्भ संकल्प से ,परम्परा प्राचीन।
    ध्येय सिद्धि की पूर्णता,रहिये इसमें लीन।।

    सुप्त पड़ी क्षमता जगा,शक्ति मानसिक साध।
    एक ज्योति संकल्प की,जलती रहे अबाध ।।

    सदाचार के ह्रास से, हुई सभ्यता भार।
    भूल गये संकल्प वो,जो जीवन आधार।।

    दृढ़ इच्छा रख प्रण करें,यही बने संकल्प।
    जीवन के निर्माण में ,संशय रखें न अल्प।।

    शक्ति बड़ी संकल्प में,कहते संत सुजान ।
    है अनगिन सम्भावना,कठिन कार्य आसान।।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 5w

    ग़ज़ल

    टूटते ख्वाब की जो कहानी बनी।
    लफ़्ज़ बिखरी हुई जिंदगानी बनी।।

    हर्फ दर हर्फ जो उम्र लिखती रही
    क्यूं उसी कारवाँ की रवानी बनी।।

    रात परछाईयों की सहमती दिखे
    क्या नज़र भी अभी ख़ानदानी बनी।।

    गम सिखाते चले मुस्कुराना हमें
    जिंदगी फिर यही आसमानी बनी।।

    राख जो चिठ्ठियों की छिपा कर रखी
    याद उस दौर की अब निशानी बनी ।।
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 6w

    काशी

    धर्म और अध्यात्म का,लेकर रूप अनूप।
    विश्वनाथ के धाम का,देखें भव्य स्वरूप।।

    वरुणा असि के नाम पर,पड़ा बनारस नाम।
    घाटों की नगरी रही,कहें मुक्ति का धाम।।

    घाटों के सौंदर्य में,है काशी की साख।
    गंग धार की आरती,कहीं चिता की राख।।

    विश्वनाथ बाबा रहे, काशी की पहचान।
    गली गली मंदिर सजे,कण कण में भगवान।।

    गंगा जमुनी मेल में रही बनारस शान।
    तुलसी रामायण रचें, कबिरा संत महान।।

    कर्मभूमि उस्ताद की,काशी है संगीत।
    कत्थक ठुमरी साज में,जगते भाव पुनीत।।

    काशी विद्यापीठ है, शिक्षा का आधार।
    हिन्दू विद्यालय लिए,'मदन' मूल्य का सार।।

    दुग्ध कचौरी शान है, मिला पान को मान।
    हस्त शिल्प उद्योग से, 'बनारसी' पहचान।।

    नित्य शवों की त्रासदी,भोग रहें हैं लोग।
    करें प्रदूषित गंग को, काशी को ही भोग।।

    बाबा भैरव जी रहे, काशी थानेदार।
    हुये द्रवित अब देख के, ठगने का व्यापार।।

    धीरे चलता यह शहर,अब विकास की राह।
    मूल रूप इसका रहा,जन मानस की चाह।।

    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 7w

    उल्लाला छन्द

    कविगण अपनी कल्पना,बाँधे जब आकार में।
    संग्रह होता पूर्ण तब, मौलिकता के सार में।।

    पहली सीढ़ी लक्ष्य की,जिज्ञासा ही जानिए।
    अपने पर विश्वास हो,दूजा इसको मानिए।।

    डोली सँग थी प्रीत की,स्मृतियों के बारात में।
    संबल बाराती बने, जीवन के अहिवात में।।

    अम्बरपल्ली बेल सम, इच्छा फलती फूलती।
    लतिका बन पोषण लिया,बिना मूल के झूलती।।

    जीवन शाला नाट्य की,अभिनय करते हैं सभी।
    पर्दा होता बंद जब,कुर्सी खाली फिर तभी।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 8w

    शून्यता

    बोली मन की शून्यता
    क्यों डोली निर्वात

    कठपुतली सी नाचती
    थामे दूजा डोर
    सूत्रधार बदला किये
    पकड़ काठ की छोर
    मर्यादा घूंघट लिए
    सहे कुटिल आघात।।
    बोली मन ...

    चली ध्रुवों के मध्य ही
    भूली अपनी चाह
    पायल की थी बेड़ियां
    चाही सीधी राह
    ढूँढ़ रही अस्तित्व को
    बहता भाव प्रपात।।
    बोली मन ...

    अम्बर के आँचल तले
    कहाँ मिली है छाँव
    कुचली दुबकी हूँ खड़ी
    आज माँगती ठाँव
    आज थमा दो डोर को
    पीत पड़े अब गात।।
    बोली मन ...

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 9w

    लिव इन रिलेशनशिप

    डगमगाती सभ्यता का
    अब बनेगा कौन प्रहरी

    सात फेरे बोझ लगते
    नीतियों के वस्त्र उतरें
    जो नयी पीढ़ी करे अब
    रीतियाँ सम्बन्ध कुतरें
    इस क्षणिक अनुबंध को अब
    देखती नित ही कचहरी।।

    जब सृजन आधार झूठा
    तब नशे ने दोष ढूँढ़ा
    सत्य बदले केंचुली जो
    चित्त ने तब रोष ढूँढ़ा
    फल घिनौने कृत्य का है
    हो रही संतान बहरी।।

    पत्थरों ने दूब कुचली
    सभ्यता अब रो रही है
    माँगती उत्तर सभी से
    चेतना क्या सो रही है।।
    आँधियों के प्रश्न पर फिर
    ये धरा क्यों मौन ठहरी।।
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 10w

    बिरसा मुंडा

    जनजातीय गौरव दिवस

    एक आदिवासी नायक ने,आजादी की थाम मशाल। क्रांतिवीर बिरसा मुंडा ने,उलगुलान से किया कमाल।।

    धरती आबा नाम मिला है,देव समझकर पूजें आज।
    कलम धन्य है लिखकर गाथा,लाभान्वित है पूर्ण समाज।।

    शौर्य वीर योद्धा थे मुंडा,जल जंगल के पहरेदार।
    उलगुलान में जीवित अब भी,माँग रहे अपने अधिकार।।

    सबके हित की लड़ी लड़ाई,नहीं दिया था भूमि लगान। एक समाज सुधारक बन के, कार्य किए थे कई महान।।

    विष देकर गोरों ने मारा,छीन सके क्या क्रांति विचार। परिवर्तन की आंधी लेकर,जन्मों फिर से हर घर द्वार।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir