anonymous_143

Er. by profession. Shayar by instinct.

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  • anonymous_143 3d



    सूरत से तो अच्छी हो मैं धोखा भी खा सकता हूॅं
    मिलो किसी गरीब के घर फिर सीरत देखूंगा

    मत पाल मेरे बेटे! अभी मैं चलता फिरता हूॅं
    खटिया पकड़ लूॅंगा तब तेरी नियत देखूंगा

    दो परिन्दें सर्द रात में ठिठुर ठिठुर कुछ बोल रहे हैं
    कल सुबह ज़िंदा रहे तो उनकी तबीयत देखूंगा

    धोखेबाज़ तो नहीं हो पर वफ़ादार भी लगते नहीं
    वक़्त बुरा आएगा तो तेरी फ़ितरत देखूंगा

    बहुत शौक है न तुझे बेजुबानों को चखने का
    तेरी जीभ काटकर मैं फिर तेरी हरकत देखूंगा

    शख़्स के पीछे साया, हर साया है खंजर ताने
    अपने साये की भी मैं अब नीयत देखूंगा

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 1w

    How can we be like this!

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    रंगीन पतंग सी तु, सफेद धागे सा मैं...
    दूर जाने की ज़िद तु करे, साथ एक गांठ से जुड़ा हुआ हमेशा चल पडु मैं...
    हंसती हुई आसमान को चिरती चले तु,
    शांत सा शरमाते तेरी पंखों से प्यार कर बैठु मैं!
    ऊंचाईयो में आवारा आदत बन जाती तु, साथ में घुम जाने की चाहत बन जाती तु...
    आसमान भी हसेगा की दूर कैसे होंगे ये, क्योंकि कट भी जाऊं तो ऐसा की थोड़ा सा तो तेरे संग ही रहूॅं!

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 2w



    "सहमी सी आंखें P-4"

    "कंस्ट्रक्शन" का छोटा मोटा काम रहता है।" पता नहीं सिविल इंजीनियर को जानती होगी या नहीं... सो आने वाले सारे प्रश्नों से बचने के लिए मैंने ऐसे बता दिया। वैसे भी मेरे गाँव में जब कोई पूछता है तो मैं यही जवाब देता हूँ।

    "अच्छा!"

    चलते चलते हम उनके कमरे के पास पहुँच गए।

    "ये आ गया हमारा रूम" उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।
    "चलिये फिर, मैं चलता हूँ।"
    "चाय?"
    "फ़िर कभी" मैंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ मना कर दिया।

    "थैंक यू!" जैसे ही मैं पीछे मुड़ रहा था चलने के लिए, उसने एक धीमी आवाज़ में कहा।

    "मैंने कुछ नहीं किया! हाँ! बच्चों को पढ़ाइये और कोशिश करिये की वहाँ सड़क पे आपका कोई स्टूडेंट न हो।" मैंने उन तानाकशी वाले फूहड़ आदमियों की तरफ इशारा करते हुए कहा।


    "ज़रूर!" अब उसके चेहरे पे हँसी बिखर चुकी थी।
    "आपसे बात करके अच्छा लगा"
    "मुझे भी" हल्की सी हसीं के साथ उसने कहा।

    "चलते हैं" मैंने एक मुस्कान के साथ अलविदा किया और आगे की ओर चल दिया।

    अनजान जगह पर लड़की के साथ चल तो दिया था पर मेरी भी फट चुकी थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
    रास्ता मैं भटक चुका था। बातों बातों में ध्यान ही नहीं रहा कि कब किधर कहाँ से मुड़ा था।

    मैंने बहन को कॉल किया। उसको व्हाट्सएप्प लोकेशन शेयर किया और फिर गूगल की जगह उसके इंस्ट्रक्शन्स फॉलो करते करते हुए उसके कमरे पर पहुंच गया।

    अभी घर को लौट रहा हूँ।

    मुझे मन ही मन चिंता होने लगी.... मेरी बहन की और उन सारी लड़कियों की जो ऐसे दूर दराज गाँवों में शिक्षण का काम कर रही हैं और ऐसी स्थिति उनके दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है।

    (समाप्त)

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 2w



    "सहमी सी आंखें P-3"

    "मुझे गाँव का नाम तो नहीं पता... एक्चुअली मुझे कुछ भी पता नहीं यहाँ का। पहली बार आया इधर, कोलवड़ा।"
    मैंने पास से गुज़र रहे एक ऑटो से थोड़ा बचते हुए कहा।

    "पर इधर ही रहती है...यहीं" मैंने हाथ से इशारा कर दिया।

    "अच्छा अच्छा।" उसने समझ लिया कि मैं बिल्कुल अनाड़ी हूँ इधर।

    "पहली बार ? तो कैसा लगा कोलवड़ा?" आंखों में थोड़ी चमक के साथ उसने पूछा।

    "आप तो ऐसे बोल रही जैसे आप यहीं की हो?"

    "हाँ! हम कोलवड़ा के ही हैं। गंगानगर में हमारा घर है।" बहुत ही गर्व के साथ उसने अपना परिचय दिया।

    "कभी सुना नहीं"
    "कोई नहीं... आप इधर के हो नहीं न? यहाँ के सब लोगों को पता है"
    "और आप?"
    "वावोल"
    "अच्छा अच्छा।" उसने सिर हिलाया और हम मेन सड़क छोड़ कर एक पतली सड़क की तरफ मुड़ गए।
    "और आप....?
    'हाँ?' उसके बिना प्रश्न पूरा हुए ही मैं बीच में टपक पड़ा।

    "....आप क्या करते हैं?" उसने पूछा।

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 2w



    "सहमी सी आंखें P-2"

    बिना रुके उसने न जाने क्या क्या कह दिया। अभी सड़क पर सहम के चलने वाली लड़की को इतने कॉन्फिडेंस से बात करते सुन के आश्चर्य हो रहा था...।

    "लोकल हैं नहीं तो बताती इनको.... ज़ाहिल कहीं के" वो अपनी भड़ास निकालने में बिजी थी।

    "फ़िर जुबान भी खराब हो जाएगी" मैंने हंसते हुए कहा।
    "क्या?"
    "अरे! उनके बारे में बात करने से मुँह खराब हो रहा तो ...उन्हें दुकान के साथ पीने से जुबान ख़राब हो जाएगी।"

    उसने कुछ कहा नहीं, बस मुस्करा दिया।

    मुझे लगा कि मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है।

    मैंने हाथों के इशारे से पूछा कि किधर चलना है.... उसने भी हाथों से इशारा कर दिया।

    हम चलने लगे उसके घर की तरफ। एक जेंटलमैन की तरह मैंने उसे सड़क से दूर रखा और ख़ुद सड़क वाली साइड पे आ गया।

    'उम्म...आप यहाँ क्या करती हैं?"
    "मैं शिक्षिका हूँ। यहाँ से कोई दस बारह किलोमीटर दूर मेरा विद्यालय है।"
    "अच्छा! मेरी बहन भी शिक्षिका है... अभी उसे ही उसके रूम पर छोड़ के आया। "

    "अच्छा अच्छा! कहाँ पे पोस्टिंग है?"

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  • anonymous_143 2w



    "सहमी सी आंखें P-1"

    उन सहमी सी आंखों में मेरी नज़र यूँ ही नहीं पड़ी? ब्लू - मजेंटा सलवार सूट में वो धीरे धीरे चौराहे की एक सड़क पर आगे को बढ़ रही थी। गर्दन का स्टॉल एडजस्ट करते हुए।

    मुझे उसकी स्थिति को भांपने में ज़रा भी समय नहीं लगा।
    उस स्थिति से बचाने के लिए मैंने फल वाले को जल्दी जल्दी पैसे दिए। एक हल्की सी मुस्कान के साथ उस लड़की को देखा। फिर उसके पीछे खड़े कुछ आदमियों को। इंतज़ार था तो सिर्फ उसके नज़र मिलाने का।

    उसने भी देखा और हल्की सी मुस्काई। वजह शायद मेरा ड्रेसिंग हो सकता है। एक काली टीशर्ट जिसपे जगह जगह बहुत छोटे छोटे कैनेडा फ्लैग वाले पत्ते छपे हुए हैं...सफेद रंग में, लाइट ग्रे पैंट, भूरे रंग के लेदर शूज। आंखों पर लेंस वाला चश्मा जो कि न चाहते हुए भी आपको सिविल इंजीनियर वाला लुक दे देते हैं। वहाँ दूर वावोल जैसे गाँव में मैं बिल्कुल डिसेंट लग रहा था।

    उसने हाथों के इशारों से 'हाय' कहा और आगे को बढ़ गयी।
    मैंने भी हल्की सी मुस्कान भर दी।

    "लगता है उसका मजनू आ गया" पीछे खड़े चार बेहद फूहड़ आदमियों में से एक ने कहा और फिर उसके सारे साथी दाँत निपोर कर हँसने लगे।

    "जी तो करता है इनका मुँह फोड़ दूँ!... जाहिल!... गँवार!...। एक पैसे का सेंस नहीं है। रोज़ की आदत है।.... लड़की देखी नहीं की कमैंट्स शुरू।.... उमर भी नहीं देखते अपना।.... छि! मेरा तो मुँह भी खराब हो जाए इनकी बातें करने में।..... मेरा बस चले तो ये चाय की दुकान के साथ साथ इनको भी पी जाऊँ। घटिया लोग!"

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 3w

    ~DREAMS ARE EVERYTHING~

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    The fire you hide,
    As if you are died
    like a lost guide,
    is not going to give you pride.
    Nest is just for nurturing your wings,
    The rest is world to explore real swings
    And as far as you have heart,
    you don't need wings as art!
    Sky is high
    Ocean is dry
    But with heavy eye
    You have to fly!
    Rather than investing on the nest
    invest on your dreams to find best!
    Give-up is simply vicious
    But choices are really precious!

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 3w



    |‌| एग रोल ||

    हीरा बाज़ार की एक गली । कालूपुर रेलवे स्टेशन के बिलकुल पास । शाम को ऑफिस से आ रहा था । बहुत भूख लगी थी । एक दूकान पर कई लोग भीड़ लगा कर खड़े थे । पास गया तो पता चला कि एग रोल के लिए सब खड़े हैं। मैंने भी एक एग रोल आर्डर कर दिया । उसके बाद सबकी तरह मैं भी एग रोल का इंतज़ार करने लगा । दरअसल बारह से पंद्रह लोग होंगे जो दो झुण्ड में एग रोल का इंतज़ार कर रहे । काफी देर बाद मेरा नंबर आया । उसने पूछा पैक करना है क्या ? मैंने बोला - नही । फिर उसने रोल बना कर दे दिया । मैंने उसे पैसे दिए और रोल लेकर चल पड़ा । एक बाइट लिया और पहुँच गया ,दूर अपने अतीत में । कि कैसे स्कूल की छुट्टी होते ही हम सारे बच्चे बस्ता पीठ पर टाँगे हुए , हाथ में मोटी पटरी घूमते हुए पगडण्डी पर दौड़ते । गेंहू के खेतों में छूपते , एक दुसरे को छूते हुए बड़ी तेजी से ' हुर्री - हुर्री ' बोलते हुए ख़ुशी - ख़ुशी घर जाते थे । घर पहुँच कर मैंने दौड़ कर खूँटी पर बस्ता रखा । फिर रसोईं घर में पहुँच गया । जहाँ माँ अभी खाना बना रही थी । माँ कढ़ाई में तरी वाली आलू की सब्जी बना रही थी , जो की पंद्रह बीस मिनट बाद पकता । और साथ में रोटियां बेल रही थी । मैं घुस गया रसोईं में और माँ से बोला । ' माई ! बहुत भूख़ लगी है । कुछ दो न ' । उसके बाद माँ ने कढ़ाई में कलछल डाला और तरी वाली सब्जी से सिर्फ आलू निकाला और उसे रोटी पर रख दिया । फिर उसे फटाक से लपेटकर मुझे पकड़ा दिया । मैंने रोल की हुई रोटी पकड़ा और घर के बाहर चला गया । दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए । अचानक पीछे से कोई बाइक का हॉर्न बज रहा था । तो मैं वापस अपने आपको उस एग रोल वाली गली में पाता हूँ । हाथ में एग रोल अभी भी है । मैं सॉरी सॉरी बोल कर रास्ते से हटा । फिर एग रोल की एक और बाईट ली ,और हल्की मुस्कान के साथ मैं आगे बढ़ गया ।

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 4w

    आवाज़ लेके चलना!

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    अरमानो के अंजूमन साथ मलाल के मेले,
    संग सपनो की सफीना उस साहस के समंदर में,
    निकल तो गया बनजारा अनदेखी मंजिल की ओर,
    आँखें तो तब खुली जब आंधी बाजु में चैन से चिल्लाई,
    " जनाब, किस्मत तो लेके निकलते घर से! "

    ©anonymous_143

  • anonymous_143 5w



    है ख़बर पहुॅंचानी आज़ादी की सभी परिंदों को
    चलो कुछ परिंदों को फ़िर कैद करते हैं

    ©anonymous_143