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"To write or not to write? That is the question" ~ कहानीवाला

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  • anonymously_onymous 8w

    कुत्ते की कहानी

    काश मैं उस बूढ़े कुत्ते सा होता!
    पूरे दिन वो बस सुस्ताता रहता।
    मैं उसे रोज़ देखता हूं।
    उसके बगल से ही आते जाते गुज़रता हूं।

    सड़क किनारे वो हमेशा पड़ा मिलता,
    जैसे कोई जिंदा लाश।
    कभी धूप सेकता ठंडी में,
    तो कभी छांव टटोलता।

    गाड़ियों की आवाजाही से एक दो बार इधर उधर खिसकता,
    फिर सुस्ताते सुस्ताते पुरानी जगह में लेट जाता।
    मैं उसे रोज़ देखता हूं।
    उसके बगल से ही आते जाते गुज़रता हूं।

    आज अचानक देखा कि बंदा खड़ा था!
    फिर इतने दिन किस मायूसी में पड़ा था?
    लो! वापिस लेट गया।
    शायद अपने ख्यालों में समेट गया।

    वो इंतजार में बैठा लगता है।
    मृत्यु का...
    आंखों में अजीब सी बैचेनी लिए,
    पर बदन पे वो बेचैनी महसूस करने ना देता।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 9w

    কলম

    তোকে না খুঁজে পাওয়াতে লুকিয়ে লুকিয়ে হারিয়েছি অনেক কিছুই।
    তুই যে ছিলিস আমার পালানোর ঠিকানা...
    পরিশ্রান্ত রাতের বিছানা।

    পলাতক হয়ে ঘুরে বেড়াতাম তোর সঙ্গে।
    সুনাম হতো আমার খেলতাম যখন তোর ছন্দে ছন্দে।

    কিন্তু সেই নামডাক থেকে বেশি মূল্যবান কী জানিস?
    তোর আশ্রয় এসে লুকোনো আমার।
    তুই যে ছিলিস আমার পালানোর ঠিকানা...
    পরিশ্রান্ত রাতের বিছানা।

    আজকাল দেখা দিসনা কেনো রে?
    নিতে যে আশীষনা আমায়?
    আয়! মনটা ভরে যাক আবার দক্ষিণ হাওয়ায়।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 14w

    Writer's Block

    मुझे नहीं पता कि इस शब्द को किसी दूसरी भाषा में क्या कहते है। पर जितनी बार इस ब्लॉक से गुज़रा हूं तब कहीं न कहीं महसूस किया हूं...
    " क्या मेरे लेखन ने मेरा साथ छोड़ दिया है?"
    लेकिन बिछड़े हुए यार कैसे हर वक्त वो फिर से मुझसे मिलने आया है।

    * आप चाहें तो 'आई है' भी मान सकते है। यह लिखते समय मुझे कोई gender neutral शब्द नही सूजा। *

    पर दोस्त तो दोस्त है, अब वो 'आया' हो या 'आई' हो।
    वो जब भी मुझसे दूर जाता है एक अजीब सा डर बैठता है...
    " कहीं यही ना मेरी और उसकी अंतिम विदाई हो!"

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 24w

    মেঘে ঢাকা তারা

    করে কাতর রাতের চাদর,
    আশা নিয়ে ভোরের আদর।
    ভোরের আলোর মিষ্টি হাসি,
    না বললেও চায় সে রোজ।

    পথ হারানো পাখি ও গো!
    সে কি পাবে নবনীড়?
    আপন করে বাতাস বিদেশি,
    পাতার গায়ে ঠান্ডা শিশির।

    আজ এক ইপসার হয়...
    হলো সে হৃদয়হারা।
    লুকিয়ে রাখা নজরবন্দি ভাষা,
    যেনো নবীন রূপে পায়ে ছাড়া।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 27w

    Fluff piece of the mind

    #hindi #mirakee #musings

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    पुराना डर

    मैं किस दलदल से गुज़रा हू तुम्हे क्या पता!
    इश्क मुकम्मल होने के इंतज़ार का दर्द मुझे है पता।
    हम तो फिर भी दो कदम चल लेते यारों,
    पर मंजिल न मिल पाने का डर मुझे है पता।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 29w

    निवाले की तलाश

    पूछता है नाम तू।
    आऊंगा तेरे काम क्या?
    पूछता है ज़ात तू।
    पड़ेगी मुझे लात क्या?

    नाम से हूं मज़दूर
    और ज़ात से मजबूर।
    कौड़ियों के दाम बिकता हूं,
    रहता हूं घर से दूर।

    मेरे मरने का तुझे खेद तो नही...
    बल्कि मेरा अस्तित्व तेरा बोझ है।
    मेरे पसीने से सींची तेरी इमारतें
    मेरे जैसों की उत्तरजीविता की खोज है।

    हड्डियां जो टूटी मेरी
    तुझे क्या कोई ग़म है?
    आंसू अगर बहे मेरे
    तुझे क्या शर्म है!

    नाम से हूं मज़दूर
    और ज़ात से मजबूर।
    कौड़ियों के दाम बिकता हूं,
    रहता हूं घर से दूर।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 32w

    समझदार की नासमझी

    बैठे रहे हम आपकी फिक्र लिए,
    करते रहे आपका इंतजार।
    शायद हमारी मोहब्बत में ही खामी थी कही आपको समझने में...
    इसलिए आप हो गए बेज़ार।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 32w

    सच

    कहीं न कहीं मुझे पता था... सच क्या है।
    बस वाकिफ होना बाकी था।

    कहीं न कहीं मुझे यकीं था... सच क्या है।
    बस उसके बयान का मिलना बाकी था।

    तेरी यारी के मिसाल से मेरे यादों के बगीचे खिले थे।
    आज अचानक ये गुलिस्तां सूख गया है।

    चाहे कितना भी इन पौधों को पानी दू,
    हक़ीक़त के दीदार से सब मुरझा चुके है।

    क्या मैने इन्हे अपने मिथ्या के छाया में रखा था?
    या फिर यह यहां कभी थे ही नहीं?

    सच के होते हुए भी मैं अंधा था।
    तेरा बेगाना होना मुझे मंज़ूर न था।

    क्या करू मैं अब इनका?
    इन्हे सच दिखाऊं या झूठ में पनपने दू?

    पर सच क्या है?

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 33w

    कस्तूरी

    ख़ुद के स्पर्श से खुदका विस्फोट कैसा होता है?
    मुझे ज्ञात न था।
    सदबुद खोकर अंदर के भारीपन का हल्का होना...
    मुझे एहसास न था।

    सोचता था मैं शायद अलग हूं...
    या फ़िर अजीब।
    आज तुम्हारी नाभि के उपर का जन्म-चिह्न बड़ा मोहित करता है मुझे,
    वो मासूम सा स्वेतचिह्न... करता है मेरे निर्जीव को सजीव।
    क्या तुम मेरी हिरण हो?
    क्या तुम्हारी कस्तूरी को ही मैं टटोलता हूं?
    मुझे नहीं पता।
    पर तुम्हारे ही दृश्य से मैं खुदको खो जाता हूं।
    ज़हन से जाता नही तुम्हारा आकार।
    कोमल, निर्मल, निर्विकार।
    मेरा विस्फोट मुझसे संभाला नही जाता...
    खुदको संभालना मुझे आकर भी नही आता।

    ख़ुद के स्पर्श से खुदका विस्फोट कैसा होता है?
    मुझे ज्ञात हुआ है अब।
    सदबुद खोकर अंदर के भारीपन का हल्का होना...
    मुझे एहसास है अब।

    ©anonymously_onymous

  • anonymously_onymous 33w

    चादर

    वो - रहने दो पुरानी चादरों को... उन्हें बिछाना छोड़ दो।
    मैं - क्यों?
    वो - नई वाली निकालो! देखो कितना खिलखिलाएगा कमरा।
    मैं - ठीक है। पर पुराने वालों का क्या करू?
    वो - फेंक दो। रखकर क्या फायदा?
    मैं - पर पुरानी चादरों में एक कोमलता है... इस में वो बात कहां?
    वो - अरे ये भी कुछ दिनों में कोमल हो जायेगी। थोड़ा वक्त दो।
    मैं - लेकिन पुरानी चादरें मुझसे वक्त का आवेदन नही करती।
    और उनकी महक जानी पहचानी सी है।
    वो - ठीक है। कभी कभार उनकी महक लेने उन्हें भी बिछा लेना।
    मैं - पर तुम्हे कोई आपत्ति नहीं होगी?
    वो - मैं आऊं तो बदल लेना।

    ©anonymously_onymous