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  • anshuman_mishra 3d

    यहां से बहुत दूर.. गलत और सही के पार, एक मैदान है...

    2122 2122 2122. (वाचिक)

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    रश्मियों के पार

    रश्मियों के पार मैं तुम से मिलूँगा!

    अब यहाँ पर कुछ नहीं आधार मेरा,
    मात्र यह एकांत है संसार मेरा,
    देखता हूंँ दृग-युगल भींगे तुम्हारे,
    पोंछने का भी नहीं अधिकार मेरा!
    मैं यहां वंचित रहा, वंचन सहूंँगा!
    रश्मियों के पार मैं तुम से मिलूँगा!

    अंशुमाली अंशु निर्मित पथ बनाता,
    भोर में जो वृक्षदल-‌उर चीर आता,
    दो जगत के मध्य का ही मार्ग है वह!
    देह निज तजकर मनुज उस ओर जाता,
    तुम इधर हो, पर उधर मैं जा चुका हूंँ!
    मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षारत रहूंँगा!
    रश्मियों के पार मैं तुम से मिलूँगा!

    रश्मियों के पार नव सूरज निकलता,
    है जहांँ पर एक नव संसार पलता,
    है नहीं आबंध कोई भी जहांँ पर,
    है जहांँ पर प्रेम का स्वातंत्र्य चलता!
    मैं वहीं सब अनकहा, तुमसे कहूँगा!
    रश्मियों के पार मैं तुम से मिलूँगा!

    रश्मियों के पार मैं तुम से मिलूँगा!

    - अंशुमान मिश्र

  • anshuman_mishra 1w

    कुछ चीजें.. अधूरी ही बेहतर हैं..
    खैर..

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    फकत दो चार पन्ने छोड़ दो खाली किताबों के,
    ज़रूरी है मुकम्मल हो तभी किस्सा मुकम्मल हो?

    ‌_अंशुमान__

  • anshuman_mishra 2w

    कल्ब - heart

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    मरा अंदर कहीं कुछ पर, हमारी लाश ज़िंदा थी,
    हमारा कल्ब घायल था, हमारी आस ज़िंदा थी,

    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 3w

    कहकशाँ - आकाशगंगा (milkyway)
    सफ़ीना - नाव

    1222 1222 1222 1222

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    ग़ज़ल

    कि देखो कहकशां का खून बहता आसमानी है,
    यहां पर मौत बनकर, रोज़ आती जिंदगानी है!

    यहां आबो-हवा भी हर कदम पर रुख बदलती है,
    कहीं बारात सजती है, कहीं अरथी सजानी है!

    सफ़ीना बे’सहारा है, नहीं दिखता किनारा है,
    हमें तूफ़ान की ही ले मदद, कश्ती बचानी है!

    न जाने कितने चेहरों के, न जाने कितने चेहरे हैं,
    यहां हर एक चेहरे की अलग अपनी कहानी है!

    फकत खाई कसम हमने किसी के साथ थी मिलकर,
    किसी को तोड़ जानी थी, हमें मरकर निभानी है!


    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 4w

    1222 1222 1222 1222

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    ये दिन का शोरगुल, ख़ामोश उन रातों से है बेहतर!
    कि सच्ची नफरतें, उन झूठ जज़्बातों से हैं बेहतर!
    कि मेरी ज़िन्दगी के हर कदम पर साथ देती है,
    मेरी तो बदनसीबी भी कई नातों से है बेहतर!

    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 5w

    मात्राभार - 16
    क्षुधा - भूख शर - तीर

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    तुम मुझको कितना तोड़ोगे?

    की क्षुधा पूर्ति मेरी सदैव,
    बाधा ने ठोकर खिला मुझे!
    नित क्रूर भाग्य से छला गया,
    विषकुंभ पयोमुख मिला मुझे!
    पर मैंने की हुंकार पुनः!
    रवि ने चीरा अँधियार पुनः!
    मैं सबका प्रत्युत्तर दूँगा,
    कब तक विपदा-शर छोड़ोगे?
    तुम मुझको कितना तोड़ोगे?


    कस दो थोड़ी और बेड़ियाँ,
    चाहे और कष्ट दो मुझको,
    चाहे और बेध दो तन-मन,
    या कर पूर्ण नष्ट दो मुझको,
    मैं फिर से उठ खड़ा रहूँगा!
    निज प्रश्नों पर अड़ा रहूंँगा!
    मेरे प्रश्नों से छिपकर तुम,
    कब तक अपना मुख मोड़ोगे?
    तुम मुझको कितना तोड़ोगे?

    तुम मुझको कितना तोड़ोगे?


    _-अंशुमान मिश्र_

  • anshuman_mishra 5w

    1222 1222 1222 1222

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    चमक में चांद की, जब रात ये लोरी सुनाती है,
    कोई शादाब होता है, कहीं मुस्कान जाती है,
    कि हम रोते, तड़पते और मरते हैं किसी खातिर,
    किसी का खेल होता है, हमारी जान जाती है,

    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 5w

    रोक कर तूफां खड़े थे, हम यहां जिसके लिए,
    फूंककर वो आस की शम्मा बुझाकर चल दिए..

    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 5w

    1222 1222 1222 1222

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    दिसंबर

    अभी भी हर सुबह जब पत्तियों से ओस झरती है,
    नज़र ताज़ा गुलों की क्यारियों पर जा ठहरती है,
    कि करता हूं मैं तुमको भूलने के झूठ दावे, पर..
    दिसंबर की महज इक शाम पर्दाफाश करती है..

    _अंशुमान__

  • anshuman_mishra 6w

    |3.12.21|

    वज़्न - 1222 1222 1222 1222

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    क्या किया जाए!

    लुटी कश्ती, नहीं कोई किनारा.. क्या किया जाए!
    हमारा था जो कल, अब है तुम्हारा, क्या किया जाए!

    इधर थी प्यास काफी, और उधर थी ज़हर की बोतल,
    था मरना हर तरफ से तय हमारा.. क्या किया जाए!

    मगर हमको नहीं लगता मुनासिब... बद्दुआ देना,
    कि जिसने जान ली, था जां से प्यारा, क्या किया जाए!

    अभी कल तक हरी थीं, आज ये जो सूख आईं हैं,
    कि बेलें मर चुकीं हो बे’सहारा, क्या किया जाए!

    कि जिन हाथों ने सींचा कल तलक था प्यार से इसको
    उन्हीं हाथों, शज़र कटता बेचारा, क्या किया जाए!

    कि वो नज़रें भी हैं पहचानने से अब मना करतीं,
    जिन्होंने था कभी जी भर निहारा, क्या किया जाए!

    सभी मशरूफ थे, उस चांद की तारीफ करने में,
    किसी को ना दिखा रोता सितारा, क्या किया जाए!

    क्या किया जाए..

    _अंशुमान मिश्र___