ayushsinghania

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  • ayushsinghania 15w

    अजीब वाकया हुआ है इंसान के साथ;
    जो और जिससे वो बना , उसीको (इंसानियत) को छोड़ दे रहा....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 17w

    दो जिस्म,
    इक दूसरे को समझते हुए,
    इक दूसरे की खुशबू को सोखते हुए,
    मानो दो फूल आपस में उलझे हो और हँस रहे हो;

    दस उंगलियों का जोड़ा,
    साथ रास्ता तलाशता हुआ,
    कमरे की हवा को ,
    बातों से गुदगुदाता हुआ,
    मानो रात अमावस की दोंनो को बहोत ग़ौर से सुन रही हो;

    दो नजरें हो जो साथ और दूर जाते हो,
    कभी जोर से , कभी धीमे से मुस्कुराते हो,
    कभी चुप्पी जैसे बहोत देर तक ओढें रहते हो,
    फ़िर लम्हों इक दूसरे को तकते रहते हो;
    मानो कोई बिछड़ा साथी बरसो बाद मिला हो;

    दो काश है ,जो आज हक़ीक़त हुए हो,
    जो क़िस्से थे मानो वो मुक़म्मल हुए हो,
    जिसे अंत कहती है दुनिया वो बस शुरुआत ही तो है;
    प्रेम मंजिल नही ,
    वक़्त की सड़क पर साथ की कहानी है,
    मानो इक किताब हो और बस पढ़ना शुरू हुआ हो;

    ******************************************

    अजीब बात है ना,
    न कोई लफ्ज़ , न कोई विवरण,
    फिर भी दोनो खो गए थे उस कारीगरी में;
    अजन्ता ने दोनों को मोह में कर लिया हो मानो,
    गुफ़ा पर उकेरे उस चित्र को कितने ग़ौर से देख रहे थे दोनो,
    दोनों इक पल को प्रेम को महसूस कर पा रहे थे मानो;
    कितना अजीब है ना,
    कला सबको अलग अलग तस्वीर दिखती है....!
    © ayushsinghania

    #mirakee #mirakeehindi

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    दो काश , जो मानो आज हक़ीक़त हुए हो.....
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 20w

    पुरूष किसी पतझड़ के दरख़्त जैसा होता है,
    धुंध की झिलमिल पृष्ठभूमि पर,
    लकड़ी का सख़्त लिबास लिए,
    मजबूत जड़ो वाला,
    छाल से लिपटा,
    नर्म अंतर्मन वाला,
    पौरुष की परिभाषा का भार ओढ़े,
    अकेला क्रंदन करने वाला;

    नही ऐसा नही की वो नही रोता,
    वो रोता है और शायद बहोत जोरों से;
    वो तथाकथित पौरुष की परिभाषा जिसमे पुरुष के न रोने को किसी शक्ति की एक प्रति के रूप में प्रदर्शित किया जाता रहा है, मेरे समझ से असत्य है;
    वो मात्र सामाजिक लिंग विभाजन की इक क्षणिक कोशिश है,
    जो सच्चाई से कोसों दूर है,
    ठीक वैसे ही ,
    जैसे स्त्री के प्रेम को , उसकी पसंद को आंशिक मानकर उसकी स्वीकृति को नकार दिया जाता हैं;
    सो मैं यह स्वीकार करता हूँ ,
    दोनों असत्य है;
    क्योंकि मैं(पुरुष) पुरुष तो हूँ ,
    पर साथ में एक बेटा , भाई , दोस्त , पति , पिता भी,
    जिसमें अपने जीवन मे स्त्रियों की भूमिका , उनके बलिदान , उनके क्रोध और उनके प्रेम की झलकियों को देखा है.....

    बहरहाल,
    बातचीत की सड़क पर , जिस मोड़ पर हम थे,
    वहाँ पुरुषों पर कुछ बातचीत हो रही थी;
    पौरुष महज़,
    कंधो की चौड़ाई , सीने की लंबाई,
    आवाज़ का क्रोध , ललकारता प्रेम या असीमित आकांक्षाओ का प्रदर्शन नही है,
    पौरुष , क्रंदन भी है;
    रोना इक हिम्मत है , साहस है ,
    बस फ़र्क शायद इतना है कि,
    पुरुष का रोना अकेला होता है या
    वो उस कंधे या गोद की राह तकता है,
    जहाँ वह बच्चा बनकर रो सके......!
    © ayushsinghania

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    पुरुष.....
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 21w

    दस उँगलियाँ,
    और अनगिनित लम्हों में बुना वो जाल,
    चश्में को भेदती रोशनी,
    धुंध में जुड़ा दोनों का हाथ,
    भीड़ की तेज़ी में,
    सांसों की धीमी सी वो चाल,
    मन की दौड़ को कैसे समझाए कोई,
    उस लम्हें का एकांत,
    जहाँ पाने की ज़िद वाली दुनिया में,
    होने भर का हो सुकून प्राप्त,
    मानो अप्रेषित , अनिश्चित , बिना किसी पते का लिफ़ाफ़ा सा हो बस,
    पर डाकिया और मंजिल दोनों सब्र धरा हुआ हो.....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 21w

    आवारा सड़क और इक हंसी,
    किसी किनारे खड़े फूस की झुग्गी से आती हुई,
    फ़िर वो filters फ़िके पड़ जाते है,
    जो आप , हम , रोज़मर्रा में इस्तेमाल कर
    ख़ुश होने का दिखावा कर लिया करते है ग़ायब से हो जाते है;

    आवारा सड़क और वो सब्र भरी बूढ़ी आँखें,
    जो रस्ते और लोगों के कौतूहल को देखकर बैचैन नही होती,
    जैसे हज़ार दरार हो मकां में मानो फ़िर भी सब्र भी सब्र से हो,
    फ़िर मेरी , तुम्हारी सबकी परेशानियां थोड़ी बेईमानी लगती है,
    उन आंखों को रोज़ देखकर एक हिम्मत आती है;

    आवारा सड़क और टमटम के घोड़े की वो लंबी सी दौड़,
    मानो वो हर मशीनी चीज़ को हरा देना चाहता हो
    (और हरा भी देता हूँ),
    तेज़ चलते हुए भी मानो धीमा होने को कहता हूँ,
    मैं और मेरा साथी जब उसे देखते है,
    तो अदब से सलाम करता है और फ़िर सफर को मशगूल हो जाता हो;


    आवारा सड़क और इक याद,
    काफ़ी है कहीं खो जाने को,
    फ़िर लोग नही बस जिस्म होते है इर्द-गिर्द,
    जिनके बीच आप कच्ची पक्की सड़को पर सफर तय करते हो;
    वो जुड़े हाथ ,शाम की ठंड में मशाल सी गर्माहट लिए,
    यादें बनाती उंगलियां एक दूसरे को गुदगुदाती,
    हल्की मुस्कराहट लिए , बिना बोले ,
    सफ़र तय करती हुई;

    आवारा सड़क और इक......
    ©ayushsinghania

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    आवारा सड़क और इक.....

  • ayushsinghania 22w

    getting this feeling that I wanna write but not been able to convey lately.
    So will try to propagate it through words by posting random stuffs/words/emotions/phrases.
    Hopefully it will make sense ��:)

    Hopefully you all would enjoy

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    वहम की किस्तें काफ़ी महँगी होती हैं;
    काश के कोई रुपया इसकी रकम चुका पाता....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 25w

    मैं कम्बल ओढ़े धुंध की शिकायतें करता रहा,
    सड़क किनारे वो नन्ही जान अपनो से लिपट मुस्कुराता सो गया;
    यक़ीन है मुझें,
    ठंड और बदन दोंनो के एक जैसे हैं,
    बस फ़र्क शायद,
    सहुलतो से मिले बहानो का है.....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 26w

    किसी यक़ीन का ऐतबार लगता हैं,
    उसे ख़ुदसे फिऱ से इश्क़ हो रहा है :)
    ©ayushsinghania

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    बहोत हक़ से उसने थामा इन हाथों को मेरे,
    लफ्ज़ बयाँ कर पाए वो एहसास कभी, ऐसा मुमकिन नही लगता....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 29w

    अजीब है,
    इक तरफ़,
    चारदीवारी के अंदर कोई अपनी पीठ पर गढ़े नाखूनों के निशान छुपाना में लगा है;
    कैसे वो कहेगी भी क्या,
    आखिर समाज जिस विवाह को संस्थान का दर्जा देता है,
    वही वो इस बात से मुँह भी मोड़ लेता की,
    "विवाह पश्चात ये सब आम है , क्योंकि वह पुरुष हैं",
    शायद इसीलिए भी वो,
    हर रोज़ साड़ी का पल्लू पीछे करते वक़्त वो चंद सेकंड पीठ पर उन उकेरी गई चीखों को सुन , दो आँसू गिरा ,
    कमरे से बाहर मुस्कुरा कर निकलती है...."

    और कही दूर , या शायद उसी मोहल्ले/इलाके/शहर में,
    दफ्तर को जाता पुरुष मन ही मन सोचता है,
    की क्या विवाह महज़ एक लेन देन है;
    चीजों का, सामानों का , पैसों का;
    क्या पुरुष होने का मतलब अपनी भावनाओं को पी लेना है,
    क्या रिश्ता सिर्फ़ एक पहिये की जिम्मेदारी है,
    क्या शादी या प्यार सिर्फ़ लोगो के सामने दिखावा है,
    क्या ये सिर्फ़ जलसे में तस्वीरों में झूठा मुस्कुराना भर हैं ?
    क्या इस संस्थान का मतलब,
    संवेदना और एक दूसरे को संभालना नही?
    क्या ये रुपयो, जरूरतों और दिखावे पर ख़त्म हो जाता है....?

    *************************************************
    अजीब हैं ना,
    एक ही जात(इंसानियत),
    एक ही शहर,
    पर अलग सोच ?
    ऐसे कितने ही पुरुष और स्त्रियां हर तरफ है,
    पहले भी थी/थे,
    आज भी है और शायद आगे भी रहेंगे/रहेंगी;
    दिक्कत ये है कि हम चश्मा और नज़रिया नही बदलना चाहते,
    या तो सिर्फ़ हुम् पुरुष या सिर्फ़ स्त्री को कटघरे में खड़ा कर देते है।
    जबकि,
    जरूरत ये समझने की है कि उस कटघरे में प्रश्न चिन्ह इंसानी जात पर है , न कि किसी रंग/जात/धर्म/लिंग/ पर

    प्रश्न इंसानियत का है , इंसानियत से.....
    ©ayushsinghania

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    इंसानी चश्मा
    © ayushsinghania

  • ayushsinghania 31w

    मेरे मन का उलझा गीठठा,
    रोज़ उलझता , रोज़ सुलझता;
    सोचो कितना ज़ोर का बांधा,
    तेज उलझता , धीमे खुलता;
    जैसे,
    खुला संमदर और अपनी कश्ती,
    दूर क्षितिज तलक सिर्फ़ अपनी बस्ती;
    थोड़ा थोड़ा रोज़ उलझते,
    थोड़ा थोड़ा रोज़ सुलझते....!
    ©ayushsinghania