#3rdapril_2019

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  • krati_sangeet_mandloi 146w

    भ्रूण-हत्या

    आज नारी ही नारी के अस्तित्व को नकार रही है,
    अपने रक्त से सींचकर जन्म देने वाली माँ,
    हद से गुजर के मातृत्व को शर्मसार कर,
    जन्म से पहले ही मासूम को गर्भ में मार रही है।

    बेटे के मोह में इंसानियत को भूल रही है,
    संस्कारो की बहुमूल्य पूंजी देने वाली,
    ममता की मूरत अब पत्थर दिल बनकर,
    बेटी से जन्म का अधिकार छीन रही है।

    कहीं हैवानियत घातक साजिश रच रही है,
    असमानता का बीज अंकुरण कर,
    निर्दयता की सीमा को लांघकर,
    बेबस माँ को कोख उजाड़ने पर मजबूर कर रही है।

    कहीं नन्ही सी जान को ज़िन्दगी तो मिल रही है,
    समाज की सच्चाई को आईना दिखाकर,
    असहाय को कूड़ेदान और झाड़ियों में फेंककर,
    दामन की घुटन में सांसे दम तोड़ रही है।

    घटती संख्या लड़की की नई चुनौती भर रही है,
    पारंपरिक मान्यताएं लड़के को उत्पादक,
    लड़की को उपभोक्ता मान,
    अपनी तुच्छ सोच को विकसित कर रही है।

    संभल जाओ,उस निर्दोष की चीत्कार गूँज रही है,
    जन्म-मरण मात्र ईश्वर के हाथ में,
    हक़ नहीं तुम्हें उसका जीवन छीनने का,
    अब अति अपने अंत की घड़ी सुनिश्चित कर रही है।

    कुप्रथा का शिकार वो ही क्यों बन रही है?
    स्वयं पहल करो और बदलो अपनी सोच को,
    भेदभाव को दूर करके, अपने कुल की लाज रखो,
    जो तुम्हारे सौभाग्य का दीप बन रही है।

    उजड़े गुलशन की वह माली बन रही है,
    नई रोशनी की मशाल लेकर चल रही है,
    प्रण करो हम यह पाप नहीं होने देंगे,
    जहाँ नारी से ही सृष्टि की कहानी आगे बढ़ रही है।

    ©Krati_Mandloi✍️
    (3-04-2019)