#arjuna

14 posts
  • _dollysingh_ 62w

    Krishna asked Arjuna give up old thinking as new things in new time need dynamized thinking
    ©_dollysingh_

  • ajayamitabh7 62w

    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-7
    राजसभा में जिस दुर्योधन ने सबका अपमान किया,
    वो ही वक्त के पड़ने पर गिरिधर  की ओर प्रस्थान किया।
    था किशन कन्हैया की शक्ति का दुर्योधन को भान कहीं,
    इसीलिए याचक बनकर पहुंचा तज के अभिमान वही।

    अर्जुन ईक्छुक मित्र लाभ को माधव कृपा जरूरी थी,
    पर दुर्योधन याचक बन पहुँचा था क्या मजबूरी  थी?
    शायद केशव को जान रहा तभी तो वो याचन करता था,
    एक तरफ जब पार्थ खड़े थे दुर्योधन भी झुकता था।

    हाँहाँ दुर्योधन ब्रजवल्लभ माधव कृपा काअभिलाषी ,
    जान चुका उनका वैभव यदुनन्दन केशव अविनाशी। 
    पर गोविन्द भी ऐसे ना जो मिल जाए आडम्बर  से,
    किसी झील की काली मिट्टी छुप सकती क्या अम्बर से।

    दुर्योधन के कुकर्मों का किंचित केशव को भान रहा,
    भरी सभा में पांचाली संग कैसा वो दुष्काम रहा।
    ब्रजवल्लभ को याद रहा कैसा उसने  आदेश  दिया,
    प्रज्ञा लुप्त हुई उसकी कैसा उसने निर्देश  दिया।

    शायद प्रस्फुटित होवे अबतक प्रेमबीज जो गुप्त रहा,
    कृष्ण संधि हेतु हीं आये थे पर दुर्योधन तो सुप्त  रहा।
    वो  दुर्बुद्धि भी कैसा था कि दूत  धर्म का ज्ञान नहीं, 
    अविवेक  जड़ बुद्धि का बस देता रहा  प्रमाण कहीं।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • amiravana 71w

    मैं कोई प्रेमी नहीं
    फिर भी
    इश्क़ सा हूँ
    गाता नहीं अच्छा
    फिर भी
    कृष्ण का हूँ
    ...
    #radheradhe
    @amiravanaLips of #krishna #radhe #radhekrishna #classic350 #blogger #signals
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    #harekrishna #krishna #lordkrishna #krsna #mahabharata #arjuna #jaishreekrishna #narayana #aum #god #haribol #iskcon #srilaprabhupada #krishnaconciousness #meditation #govinda #radhamadhav #radheshyam #hinduism #karmayoga #bhakti #krishnabhakti #yogi #selfrealization #krishnamurti #shriram #hanuman #siya #radhakrishna

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    फिर भी

    मैं कोई प्रेमी नहीं
    फिर भी
    इश्क़ सा हूँ
    गाता नहीं अच्छा
    फिर भी
    कृष्ण का हूँ
    ...
    #radheradhe
    @amiravana
    ©amiravana

  • assassin_blade 84w

    अंतिम युद्ध...

    हो चले थे सत्रह दिन, कुरुक्षेत्र की उस रणभूमि में,
    एक एक कर सब भाई समाए थे,उस खून की प्यासी बजरी में।

    विचलित न था दुर्योधन, हश्र देख अपनी सेना का,
    क्योंकि था संभाला राधेय ने, जिम्मा सर-सेनापति का।

    अब तक तो खेला है मैंने सिर्फ खेल, हे अर्जुन!, असली युद्ध तो अब होगा,
    क्योंकि अब मेरे बाणों का लक्ष्य,केवल तुम्हारा मस्तक होगा।

    देख कर्ण का अटल पराक्रम,टूटा हौसला धनंजय का,
    संजय सुनाए वृत्तांत बोले हे महाराज ये कर्ण नहीं ये रौद्र रूप है शंकर का।

    कांप उठी रणभूमि,अंगराज के प्रहारों से,
    न था अर्जुन पर कोई जवाब,सिवाय पूछने माधव से।

    सूर्य तेज़ सा प्रचंड पराक्रम,प्रखर वेग जटायु का,
    संजय बस यही दोहराए ये कर्ण नहीं ये रौद्र रूप है शंकर का।

    नकुल सहदेव हो या हो वृगोदर,जो आया कर्ण के समक्ष,
    देखा उसने राधेय का, कालभैरव सा रूप प्रत्यक्ष।

    विद्युत गति से हो रहा था,पांडव सेना का संहार,
    कर्ण को रोकने को भरी अर्जुन ने,एक अंतिम हुंकार।

    करा अर्जुन ने भरपूर प्रयास,पर रोक न सका उस परम वीर को,
    हरि भी थे चिंतित,देख अंगराज के विकराल रूप को।

    परन्तु तभी हुआ कुछ ऐसा,जिससे बदल जाना इतिहास था,
    कर्ण के दिग्विजय रथ का पहिया,मिट्टी में जा धंसा था।

    मंद-मंद मुस्काए हरि,कहा पार्थ यही वो समय है,
    अगर पहिया रथ का निकल गया,तो हार हमारी निश्चित है।

    वार करो हे अर्जुन, अभिमन्यु भी निहत्था था,
    अगर धनुष उठा लिया फिर उसने,तो रोक कोई इसे न सकता था।

    हरि को एकटक देखता रहा,था खड़ा मूक वह शूरवीर,
    मिला अपमान जीवन भर,और अंत में लगा छल का तीर।

    मृत्यु शय्या पर लेटे अग्रज के घावों को अर्जुन ने कुछ सहलाया,
    इसी महा छल के कारण, वह कभी न ' कर्ण-जीत ' कहलाया।

    न था कवच न थे कुंडल,हुआ विद्या का विस्मरण था,
    फिर भी न सीधे युद्ध में कोई हरा सका,इसीलिए वह मृत्युंजय कर्ण था।
    ©assassin_blade

  • kuhelika 106w

    Lord Krishna to Arjuna

    When inertia is predominant;
    Ignorance, inactivity, carelessness and
    delusion arise.
    ©kuhelika

  • arvk10 118w

    Yeh Dosti Hum Nahin Todenge

    Episodes 93-94.

    Lot of users on twitter finding inspiration from Duryodhan and Karna’s friendship; many calling it the greatest friendship from the Epic, given the fact that the friendship was built upon hate, vengeance and ego. Had Karna not been a direct competition to Arjun I even doubt if Duryodhan and Karna would have ended up being friends.

    On the other hand we have Krishn and Arjun, Shri Krishna and Arjun’s bonding has to be one of the greatest friendship tales ever. No other friendship from our ancient past was as celebrated as the friendship between Krishna and Arjuna. The portrait of them in a single chariot is firmly implanted in people’s mind since generations and will continue to do so for generations. They are Winners in any given situation. They faced all the challenges thrown at Them and came out triumphant every time.

    Vedavyasa offered many instances that depict the unparalleled bonding between the awesome duo, which was amazingly captured by BR Chopra in his Mahabharat. Special mention, Nitish Bharadwaj and Firoz Khan who played Krishna and Arjun has left a long lasting impression, such that most people tend to picturise them if they were asked to imagine Krishna and Arjun.

    In short these two whenever they come together was a breath of fresh air into the proceedings. They weave magic into the otherwise traumatic parts of the epic, case in point when Pandavas suffer in the forest or on 14th day when Arjuna had to kill Jayathratha before Sunset.

    Krishna confesses to Daruka

    (EXCERPT)

    My kingdom, my kinsmen, my relatives, non amongst these is dearer to me than Arjuna. O Daruka, I shall not be able to cast my eyes, even for a single moment, on the earth bereft of Arjuna. I tell thee, the earth shall not be reft to Arjuna. Myself vanquishing them all with their steeds and elephants by putting forth my strength for the sake of Arjuna, I will slay them with Karna and Suyodhana. Let the three worlds tomorrow behold my prowess in great battle, when I put forth my valour, O Daruka, for Dhananjaya's (Arjun) sake.

    Krishna became Arjun’s personal charioteer to be with his friend at all times and save him from any harm during the Holy War. Krishna became the friend, philosopher, brother, guide and what not to Arjuna. He became God to him when the time was right and ended up delivering the Gita to him, that benefitted not only Arjun but mankind in general.

    Krishna kept his word, He said He can not look at a world devoid of Arjuna. So He left first leaving his Parth to do the rites for him.

    Even Arjun knew the importance of Krishna, he never disobeyed Krishna at any point during the epic, he obeyed Him blindly. When Arjun had the option to choose between Krishna’s Army and Krishna himself he chose the latter. Arjun had chosen Krishna within a split second, he had set his priority, he was sure he didn’t need the Naryani Sena when he had Narayan Himself.

    Many quotes are there in the Mahabharat that validated the unparalalled friendship. Many in Mahabharat claimed the friendship as unique. They were acknowledged as inseparable by almost all characters and the best one was ironically by Duryodhan and he says “atmaa hi Krishnah Parthasya Krishnasyatma Dhananjayah”. Which translates into ‘Krishna is Partha’s soul. Krishna’s soul is Dhananjaya.’

    To sum it all up, “Paapaannivarayi yojayate hitaaya, guhyam niguhayati gunaan prakatikaroti aapadgatancha najahati dadati kaale sanmitralakshanamidam pravadanti santaha”

    "A true friend is one who prevents you from committing sins (bad actions). He plans for your welfare (and executes those action plans). He keeps your secrets as secrets. He spreads your virtues. He does not desert you in times of trouble. He also gives (money and resources) in times of need. The wise say these are the six qualities of a good friend"; the above six qualities were honored by Krishna and Arjun and dishonored time and again by Duryodhan and Karn.
    ©arvk10

  • conscience_ 135w

    हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |
    तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: ||

  • writer_varsha 143w

    आग से जन्मी वो
    इसलिए याज्ञसेनी कहलाई।
    रूप से मोहिनी वो
    इसलिए कृष्णा कहलाई।
    पांचाल की राजकुमारी वो
    इसलिए पांचाली कहलाई।
    पवित्र स्त्रियों में से एक वो
    इसलिए पावन सती "द्रौपदी" कहलाई।

    पाँचाल नरेश द्रुपद की पुत्री वो
    इसलिए द्रुपद कन्या कहलाई।
    हरि ने सकंटों से उभारा उसे
    इसलिए श्रीकृष्ण की सखी कहलाई।
    प्रेम धर्नुधारी अर्जुन से किया उसने
    लेकिन पाँच पांडवों में बँटी वो
    इसलिए उनकी पत्नी कहलाई।

    धर्म के नाम पर दाव पे लगी वो
    इसलिए अधर्मियों से अपमानित हुई वो।
    द्यूतसभा में चलने से मना किया उसने
    इसलिए बालों से घसीटते हुए लाई गई वो।
    दासी बनना स्वीकार्य ना था उसे
    क्योंकि घमंडी नहीं स्वाभिमानी थी वो।
    त्याग और समर्पण से पूरा जीवन जीया उसने
    इसलिए द्यूतसभा में वैश्या कही गई वो।

    अबला समझ उसे
    भरी सभा में नग्न किया जा रहा था।
    शर्मनाक दृश्य चीरहरण का
    सबका शीश झुका रहा था।
    सभा मौन थी बस
    कोई कुछ बोल ना रहा था।
    अपनी लाज बचाने को
    लगाई उसने अपने सखा
    गोविंद को पुकार।

    स्त्री की मर्यादा को भंंग
    करने का प्रयास हुआ था।
    इसलिए महाभारत का
    भयानक युद्ध हुआ था।

    ©writer_varsha

    pic source: google
    content credit: @writer.varsha


    #draupadi
    #writervarsha
    #mahabharat #yagyseni #krishna #panchal #panchali #shreekrishn #pandav #arjuna #dharma #govinda #hari #cheerharan #shameful #girlpower #naarishakti #writers #feelings #thoughts

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    "द्रौपदी"

    आग से जन्मी वो
    इसलिए याज्ञसेनी कहलाई।
    रूप से मोहिनी वो
    इसलिए कृष्णा कहलाई।
    पांचाल की राजकुमारी वो
    इसलिए पांचाली कहलाई।
    पवित्र स्त्रियों में से एक वो
    इसलिए पावन सती "द्रौपदी" कहलाई।

    (Read full caption)

    ©writer_varsha

  • ani_sk 204w

    Be a warrior who
    Petrifies his enemy.

    ©anushyaani

  • gomal_sivaraam 206w

    Real Companionship is being Krishna in some Arjuna's life.
    ©gomal_sivaraam

  • ani_sk 209w

    Arjuna

    He never complained anyone for his life.
    Nor blamed anyone for his situation.
    That is the reason why no one could see his pain and sufferings.
    That is the reason why everyone think his life was a bed of roses...

    ©anushyaani

  • narayan_shukla 223w

    गीता- ३

    सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
    प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति।।
    श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।

    All people wise or not act according to the nature they have acquired in this world. How then will it be of any help to suppress one's true nature?
    One should act according to one's own nature. Even if this appears faulty, this is better than doing duties of others. It is better to die engaged in duties that are according to our nature because other's duties only brings evil and danger.

    @shrimad bhagavad gita
    Ch. 3:33-35

  • narayan_shukla 223w

    गीता- २

    आपूर्यमाणचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
    तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।

    Just as many rivers entering the ocean cannot stir it or disturb it's stillness similarly the mind of a person who is unmoved by desires remains still and attains peace. The one who hankers after such desires doesn't attain peace.

    @shrimad bhagavad gita
    Ch.2:70

  • narayan_shukla 223w

    गीता-१

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
    सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते।।
    क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
    स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।


    Thinking about sense objects brings an attachment towards them. Attachment breeds desire, and desire leads to frustration, which in turn leads to delusion.
    When you are deluded, you lose your memory and with the lose of memory, the power of discrimination is destroyed; with the destruction of discrimination, your self itself is lost!

    @shrimad bhagavad gita
    Ch.2:62-63