#ekprashn

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  • ayush_tanharaahi 169w

    प्रश्न-

    हम सभी जानते हैं, सनातन धर्म विश्व का सबसे बड़ा और सबसे पुराना धर्म हैं। जिसका कालों के अनुसार दायरा बड़ता ही गया हैं और वह पन्थो मे विभाजित होता गया। आज भी सनातन धर्म कई पन्थो मे बँटा हुआ हैं, जिनके मूल पंथ तीन हैं , और वह पंथ कौनसे हैं?

    उत्तर-

    शैव
    वैष्णव और
    शाक्य...

    तीन पंथ, भक्ति के तीन मार्ग। जीवन को जीने की तीन अलग धारायें।

    शिव को सबकुछ मानने वाले शैव, जिन्हे व्यवस्था से नही आस्था से मतलब होता हैं, दिखावे से नही कर्म से जो अपने आपको साधते हैं। मान, सम्मान के आडम्बर और किसी भी प्रकार के भेद-भाव से जो परे हैं,असल मायनो मे वो ही शैव हैं।

    शक्ती के उपासक शाक्य, जिन्होने सबसे बढ़कर शक्ती को पृकृति को माना हैं। जिनके लियें शक्ती और भक्ति एक समान हैं। जिनके लिये अंत ही आरम्भ हैं। जिन्होने सबकुछ सिर्फ पृकृति को माना वो ही शाक्य हैं।

    व्यवस्था को मानने वाले, जिन्हें सबकुछ व्यवस्था मे रहकर , पाना होता हैं। जो नीयमों को मानते हैं, तथा उसी रूप मे उनका पालन करते हैं। जो समाज को जोडते हैं, समाज को संघठित कर रहना चाहते हैं। वही असल मायनो मे वैष्णव हैं।
    ----------------------------------------------------

    आज अगर देखा जायें तो कोई पंथ बचा ही कहाँ। लोगो ने अपने अनुसार सबकुछ तोड मरोडकर रख दिया। धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाने वालों ने ही धर्म को क्षतिग्रस्त कर दियां। कोई पंथ कोई धर्म किसी से बड़ा किसी से छोटा नही हैं, सभी के अपने अपने मायने हैं। और सभी मे कुछ ना कुछ तो अनोखा हैं। जो सत्य भी हैं। अगर हम लोगो ने लोगो का कहाँ सुनने और उनका दिखाया देखने की जगह , हमारे ग्रंथो को वेदों को पढ़ने और समझने की और ध्यान दिया होता तो समझ आता, हम क्या हैं, और किस व्यवस्था का हिस्सा हैं।
    पर इसे हमारा दुर्भाग्य कहें या इस भूमि का , की इसके अपनो ने ही इसके ज्ञान को खंडित कर दियां। औंर जो अब बचा वो उस ज्ञान का अंश मात्र भी नही जो असल मायनो मे ज्ञान था।
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    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

    #kuchaisehi #ayushpancholi #hindimerijaan #ayuspiritual #ekprashn

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    प्रश्न 7 - उत्तर

    शैव
    वैष्णव और
    शाक्य...

    तीन पंथ, भक्ति के तीन मार्ग। जीवन को जीने की तीन अलग धारायें।

    शिव को सबकुछ मानने वाले शैव, जिन्हे व्यवस्था से नही आस्था से मतलब होता हैं, दिखावे से नही कर्म से जो अपने आपको साधते हैं। मान, सम्मान के आडम्बर और किसी भी प्रकार के भेद-भाव से जो परे हैं,असल मायनो मे वो ही शैव हैं।

    शक्ती के उपासक शाक्य, जिन्होने सबसे बढ़कर शक्ती को पृकृति को माना हैं। जिनके लियें शक्ती और भक्ति एक समान हैं। जिनके लिये अंत ही आरम्भ हैं। जिन्होने सबकुछ सिर्फ पृकृति को माना वो ही शाक्य हैं।

    व्यवस्था को मानने वाले, जिन्हें सबकुछ व्यवस्था मे रहकर , पाना होता हैं। जो नीयमों को मानते हैं, तथा उसी रूप मे उनका पालन करते हैं। जो समाज को जोडते हैं, समाज को संघठित कर रहना चाहते हैं। वही असल मायनो मे वैष्णव हैं।
    ----------------------------------------------------

    इन तीन पंथ के अलावा एक पंथ और हैं जो नाथ पंथ कहलाता हैं। मगर नाथ पंथ गुरु गोरखनाथ से जुडा हैं। जो की इनके बाद अस्तित्व मे आया। नाथ पंथ मुख्य रूप से तंत्र साधना से जुड़ा पंथ हैं। नाथ पंथ महाकाली और काल भैरव और महाकाल को ही सबकुछ मानता हैं।
    ---------------------------------------------------------
    सभी पंथ कुछ विशेष सम्प्रदाय मे विभाजित हैं जैसे
    शैव और शाक्य पंथ- अघोर, भैरवपन्थी, नागा, कपाली आदि मे।
    वैष्णव पंथ- वल्लभ, रामाशय , राधा- वल्लभ, तत्पूरूष आदि मे।



    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 170w

    हम सभी जानते हैं, सनातन धर्म विश्व का सबसे बड़ा और सबसे पुराना धर्म हैं। जिसका कालों के अनुसार दायरा बड़ता ही गया हैं और वह पन्थो मे विभाजित होता गया। आज भी सनातन धर्म कई पन्थो मे बँटा हुआ हैं, जिनके मूल पंथ तीन हैं , और वह पंथ कौनसे हैं?


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    प्रश्न 7

  • ayush_tanharaahi 176w

    प्रश्न-

    रामायण मे अगर राम के बाद किसी का जिक्र आता हैं तो वो हैं रावण। रावण एक बहुत ही महान योद्धा, ब्राह्मण व शिव का परमभक्त था। जिसने नवग्रहो को कैद कर लिया था। फ़िर भी अपने जीवन काल मे दो काम ऐसे थे, जो वो कर सकता था, पर कर ना पाया, उसे करने के उसके सारे प्रयत्न और सारी ख्वाईशे उसके साथ ही चली गयी। वो कौन से ऐसे दो कार्य थे, जो आजतक भी कोई पुरे नही कर पाया?
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    उत्तर-

    ऐसे बहुत से कार्य हैं, जो रावण करना चाह्ता था मगर कर नही पाया। विज्ञान ने तरक्की तो की, उसके अधुरे चुठे कुछ कार्यो को आगे तो बडाया, मगर आज भी दो ऐसे कार्य हैं जो पुरे ना हुएँ, ना ही भविष्य मे उनके पुरे होने की कोई उम्मिद नजर आती हैं।
    वो दो कार्य हैं,

    1- स्वर्ग की सीढ़ी बनाना - रावण की ख्वाईश थी, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक सीढ़ी बनाना, ताकी हर कोई आसानी से स्वर्ग जा सके। खासकर राक्षस योनि मे जन्मे सभी असुर।

    2- सोने मे सुगंध डालना- रावण को स्वर्ण अत्यधिक प्रिय था, उसने अपनी लंका भी सोने मे बनवाई थी। उसका मानना था, अगर सोने मे महक डाल दी जायें तो उसका आकर्षण कई गुना बढ़ जायेगा।

    यह दो काम ऐसे थे, जो रावण करना चाहता था, मगर कभी कर ना पाया, और आज भी सपना ही बने हुएँ हैं।

    इनके अलावा, समुद्र का पानी मीठा करना भी उसकी ख्वाईश थी, जो आज कुछ तकनीको के माध्यम से हो रहा हैं, मगर बहुत छोटे स्तर पर।
    बिना धुएँ के आग भी बना ली गई हैं। जिसे लिक़विड गैसों के माध्यम से यूज किया जाता हैं।
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    प्रश्न 6- उत्तर

    ऐसे बहुत से कार्य हैं, जो रावण करना चाह्ता था मगर कर नही पाया। विज्ञान ने तरक्की तो की, उसके अधुरे चुठे कुछ कार्यो को आगे तो बडाया, मगर आज भी दो ऐसे कार्य हैं जो पुरे ना हुएँ, ना ही भविष्य मे उनके पुरे होने की कोई उम्मिद नजर आती हैं।
    वो दो कार्य हैं,

    1- स्वर्ग की सीढ़ी बनाना - रावण की ख्वाईश थी, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक सीढ़ी बनाना, ताकी हर कोई आसानी से स्वर्ग जा सके। खासकर राक्षस योनि मे जन्मे सभी असुर।

    2- सोने मे सुगंध डालना- रावण को स्वर्ण अत्यधिक प्रिय था, उसने अपनी लंका भी सोने मे बनवाई थी। उसका मानना था, अगर सोने मे महक डाल दी जायें तो उसका आकर्षण कई गुना बढ़ जायेगा।

    यह दो काम ऐसे थे, जो रावण करना चाहता था, मगर कभी कर ना पाया, और आज भी सपना ही बने हुएँ हैं।

    इनके अलावा, समुद्र का पानी मीठा करना भी उसकी ख्वाईश थी, जो आज कुछ तकनीको के माध्यम से हो रहा हैं, मगर बहुत छोटे स्तर पर।
    बिना धुएँ के आग भी बना ली गई हैं। जिसे लिक़विड गैसों के माध्यम से यूज किया जाता हैं।

  • ayush_tanharaahi 176w

    प्रश्न-

    रामायण मे अगर राम के बाद किसी का जिक्र आता हैं तो वो हैं रावण। रावण एक बहुत ही महान योद्धा, ब्राह्मण व शिव का परमभक्त था। जिसने नवग्रहो को कैद कर लिया था। फ़िर भी अपने जीवन काल मे दो काम ऐसे थे, जो वो कर सकता था, पर कर ना पाया, उसे करने के उसके सारे प्रयत्न और सारी ख्वाईशे उसके साथ ही चली गयी। वो कौन से ऐसे दो कार्य थे, जो आजतक भी कोई पुरे नही कर पाया?
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    प्रश्न 6

  • ayush_tanharaahi 176w

    प्रश्न -

    हमने बहुत जगह साधुओं को साधना मे लिप्त देखते हैं। पूछने पर वो बताते हैं, हम कुंडलिनी जागरण कर रहे हैं। कुंडलिनी जागरण के साथ चक्र होते हैं, जो की मूलाधार से सहस्त्राचार तक हैं। कोई कहता हैं, हम शिवत्व की प्राप्ती करना चाहते हैं। यह कुंडलिनी जागरण और शिवत्व मे क्या अन्तर हैं?
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    उत्तर-

    कुंडलिनी मनुष्य के भीतर स्थित सुक्ष्म देह अर्थात् आत्मा की देहिक शक्ती हैं। जिसे जागृत कर पाना उतना ही कठिन हैं, जितना ईश्वर को पा पाना। मगर कुंडलिनी जागरण, से व्यक्ति अपनी सारी इच्छाओं की पुर्ती कर सकता हैं, मगर मोक्ष नही पा सकता। कुंडलिनी जागरण, 7 चक्रों के माध्यम से होता हैं, जो मूलाधार से सहस्त्राचार तक होते हैं। हर चक्र के जागरण से व्यक्ति की एक शक्ती जागृत होती जाती हैं। और 7 चक्र पुर्ण रूप से जागृत हो जाने के पश्चात व्यक्ति इस लोक की लौकिक शक्तियों से परे हो जाता हैं, उसके लिये कोई काम असंभव नही रहता ।



    परन्तु शिवत्व अपने आप मे एक असाधारण तत्व की प्राप्ती हैं।
    शिवत्व अर्थात शिव तत्व की प्राप्ति,
    शिव आपके , मेरे ,सभी के,
    पन्चतत्वों के पिता....

    तत्त्व अर्थात पृथ्वी, जल,अग्नी,वायु और आकाश
    हामरी मूलभूत सुविधाओ के आधार स्तम्भ। पांच तत्व मनुष्य की पांच इन्द्रियों के परिचायक।

    शिवत्व की प्राप्ति, अर्थात सभी पांचो तत्वों का जागरण। आसन नही हैं, पर मुश्किल भी नही। अगर हम इस तथ्य को जानते हैं की जो हैं वो "ओंकार" का नाद हैं, उसके अलावा और कुछ नही अर्थात
    अ-र-म
    औं- से "म" नाद हैं।
    का- से "अ" नाद हैं।
    र- से "र" नाद हैं।

    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

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    प्रश्न 5 - उत्तर

    इन्हीं से बनता हैं , "राम" । यूं ही नही "शिव" ने "राम" को अपना इष्ट माना हैं, युं ही नही कहाँ जाता "कलयुग केवल नाम अधारा"। जो हैं , वो सब "र-अ-म" का नाद हैं। हर सजीव, निर्जीव वस्तु हर तत्व से उतपन्न नाद "ओंकर" का नाद हैं।

    तत्वों को जागृत करने के लिये पहले उनके नाद को समझना होगा। हर तत्व का एक नाद होता हैं,
    पृथ्वी का कंपन , जल की कल-कल, अग्नी की आंच,वायु के वैग और आकाश की ध्वनी मे उनका नाद हैं, "ओंकार" नाद हैं। कभी शांत चित्त, एकाग्र होकर मह्सूस किजीये इन तत्वों के नाद को। सब किसी ना किसी रूप मे उसी की भक्ति कर रहे हैं , जिससे वो हैं, उसके स्मरण से।

    सबसे पहले पृथ्वी, फिर जल, फिर अग्नी, फिर वायु,फिर आकाश की जागृति और अंत मे प्राप्ति होती हैं, "शिवत्व" की। बस एक आधार हैं , शिवत्व की प्राप्ति का, जो हैं "ओंकार" का नाद अर्थात वो नाम वो शब्द जिसमे-
    "अ-र-म" तीनो का एक साथ उच्चारण हो।

    कुण्डलिनी जागरण और तत्व जागरण दोनो अलग अलग होते हैं, इन्हे एक मत समझना। एक सागर के गहराई के समान हैं, तो दुसरा ब्रह्मांड के फैलाव के समान। एक इच्छापुर्ती का मार्ग हैं, तो एक मोक्ष का। एक आत्मा को सुख और शान्ती प्रदान करता हैं, तो एक उसे बिना किसी झमेले के उस परमात्मा मे विलीन जिससे उसका उदगम हुआ।

    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 177w

    प्रश्न -

    हमने बहुत जगह साधुओं को साधना मे लिप्त देखते हैं। पूछने पर वो बताते हैं, हम कुंडलिनी जागरण कर रहे हैं। कुंडलिनी जागरण के साथ चक्र होते हैं, जो की मूलाधार से सहस्त्राचार तक हैं। कोई कहता हैं, हम शिवत्व की प्राप्ती करना चाहते हैं। यह कुंडलिनी जागरण और शिवत्व मे क्या अन्तर हैं?
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    प्रश्न 5

  • ayush_tanharaahi 177w

    प्रश्न -

    भगवान ब्रह्मा के 5 शीश थे, शिव के उग्र रूप और रुद्र अवतार काल भैरव ने ब्रह्मा जी का एक शीश, अपने नाखून से काट दिया था। जिसके बाद उन्ह्र ब्रह्म हत्या का दोष लगा था। वो कौन मनुष्य था जिसने काल भैरव को ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति दिलाई थी?

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    उत्तर

    ब्रह्मा के 5 शीश थे । जिनमे से चार ,चार वेदो की वाणी हैं। ब्रह्मा का पांचवा शीश, अहंकार और दंभ का प्रतिक बन चुका था। जिसका अन्त शिव के रुद्र रूप काल भैरव ने किया। मान्यता हैं, की काल भैरव का जन्म शिव के रक्त कण से हुआ हैं, जो दो रूपों मे हैं। जिनका बाल रूप बटुक भैरव और युवा रूप काल भैरव हैं। काल भैरव अग्नि तत्व के देवता होने के साथ साथ, सनातन मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के भी स्वामी हैं।
    जब ब्रह्मा का चौथा शीश अहंकार वश, महादेव की अवहेलना कर उन्हे अपशब्द कहने लगा तो, महादेव ने क्रोधित हो, काल भैरव की उत्त्पत्ति कर उन्हें उस शीश का अन्त करने का आदेश दिया।
    महादेव की बात मानकर काल भैरव ने अपने नख मात्र से ब्रह्मा का पांचवा शीश उनके धड़ व बाकी चारो शीशो से अलग कर दिया।
    जिसके बाद महादेव के आदेश अनुसार वे ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिये, काशी के समीप गंगा तट पर, विराजमान हो गये, और काशी का कोतवाल कहलाने लगे।


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    प्रश्न 4-उत्तर

    लगभग हजारों वर्षो तक वह अवंतिका की पावन भूमि पर एक कठोर चट्टान के रूप मे वहीं तपस्या मे लीन थे। उस समय पृथ्वी पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का शासन चल रहा था। अगहन मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को काल भैरव का अवतार हुआ था। जिसे काल भैरवअष्टमी भी कहाँ जाता हैं। सम्राट विक्रमादित्य उस पावन पर्व को उस समय अपने बंधु-बांधवो के साथ मना रहे थे, मगर कुछ लोगो ने सम्राट को धौखा देते हुएँ काल भैरव के अभिषेक के दुग्ध मे मदिरा मिला दी थी। जिससे काल भैरव रुष्ट हो गये थे। जब सम्राट को यह और उन्होने अपना रुद्र रूप धारण कर अवंतिका की नगरी पर कहर ढ़ा दिया था। जब सम्राट विक्रमादित्य को यह बात पता चली तो उन्होनें, काल भैरव द्वारा ब्रह्मा के कटा शीश ढुँढ निकाला और, उसका विधि-विधान पूर्वक तर्पण कर, काल भैरव को ब्रह्म हत्या दोष से मुक्त कराया। जिससे काल भैरव उन पर प्रसन्न हो गये तथा, सदा अवंतिका मे रह वहां के कोतवाल के रूप मे वही विराजमान हो गये। इस सारे घटनाक्रम मे मदिरा का भी योगदान रहा था, इसलिये काल भैरव ने आशीर्वाद स्वरूप वरदान देते हुएँ कहाँ, जो भी मनुष्य श्रद्दा पूर्वक यहां मदिरा का प्रसाद चड़ायेगा, उसके घोर शत्रुओ का दमन होगा,व उसकी हर वांछित मनोकामना पुर्ण होगी।
    उस समय के बाद से आज तक अवंतिका अर्थात् उज्जैन मे काल भैरव की प्रतिमा लगातार मनुष्यों की बुराई को, उनके पापों को उनके द्वारा चडाई गई मदिरा के रूप मे गृहण करती जा रही हैं।
    यह पुरा विवरण ब्रह्म वैवर्त पुराण मे निहित हैं।
    ॐ काल भैरवाय नमः
    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 177w

    भगवान ब्रह्मा के पाँच शीश थे, शिव के उग्र रूप और रुद्र अवतार काल भैरव ने ब्रह्मा जी का एक शीश, अपने नाखून से काट दिया था। जिसके बाद उन्ह्र ब्रह्म हत्या का दोष लगा था। वो कौन मनुष्य था जिसने काल भैरव को ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति दिलाई थी?
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    प्रश्न 4

  • ayush_tanharaahi 177w

    प्रश्न-

    भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का वध कर उन्हें मोक्ष प्राप्ति किस शक्ती ने दिलाई। उस अवतार का क्या नाम था?

    #kuchaisehi #ayushpancholi #hindimerijaan #ekprashn #ayuspiritual

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    प्रश्न 3 - उत्तर

    भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार ले हिरन्कश्यपू का वध कर, अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी। भगवान का यह रूप नर, और शेर का मिश्रित रूप था। जिसमे सर शेर का व धड़ नर का था।
    हिरन्कश्यपू के वध के पश्चात नरसिंह भगवान अत्यधिक क्रोधित हो गये थे, जो भी उनके मार्ग मे आ रहा था, वे उस पर प्रहार कर रहे थे। यह उग्र रूप देख सभी लोग अत्यधिक भयभीत हो गये थे। तथा कोई भी उनके सामने आने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। तब सभी देवता मिलकर शिवजी के पास पहुचें ।
    तब शिवजी ने सर्वेश्वर अवतार धारण किया जो चील, मनुष्य और सिंह का एक मिश्रित रूप था। जब नरसिंह और सर्वेश्वर अवतार का युद्ध हुआ तो सर्वेश्वर अवतार ने नरसिंह अवतार को पराजित कर दिया। उसके बाद नरसिंह अवतार को अपनी भूल का आभास हुआ तो उन्होने सर्वेश्वर अवतार से विनती की हैं, महादेव आप मेरे इस अवतार को मुक्ति प्रदान कर, इसकी चर्म को अपने आसान के रूप मे धारण करें।
    महादेव मान गये। और उन्होने कहा, आपका नरसिंह और मेर सर्वेश्वर रूप एक ही समान एक ही शक्ती का संचालक हैं। और सदा रहेगा। इस प्रकार भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का वध शिवजी ने सर्वेश्वर अवतार धारण कर किया। और नरसिंह अवतार की चर्म को अपने आसान के रूप मे स्वीकार कर, उन्हे मोक्ष प्रदान किया।


    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 177w

    भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का वध कर उन्हें मोक्ष प्राप्ति किस शक्ती ने दिलाई। उस अवतार का क्या नाम था?

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    प्रश्न 3

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  • ayush_tanharaahi 177w

    प्रश्न-
    महाभारत मे युद्ध आरम्भ होने से पहले पंडवो ने अपने जिस पुत्र की बली दी युद्घदेवता को दी थी, उसका नाम क्या था। तथा वो पाण्डवो मे से किसका पुत्र था?


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    प्रश्न 2 - उत्तर

    महाभारत मे युद्ध शुरु होने के पहले युद्ध देवता को, पाण्डवो द्वारा अपने जिस पुत्र की बली दी गई थी। वह नाग कन्या उलुपी तथा श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन का पुत्र था। जिसका नाम इरावन था।
    इरावन के अलावा अर्जुन के दो पुत्र और थे जिनमे से अर्जुन को श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से अभिमन्यु तथा चित्रांग्दा से बभ्रुवाहन नामक पुत्र प्राप्त हुए थे।
    अभिमन्यु महाभारत युद्ध मे कौरवों द्वारा रचित चक्रव्यूह मे वीरगति को प्राप्त हुए और बभ्रुवाहन ने अर्जुन को पितृ हत्या के श्राप से मुक्त करा, महाराज चित्रांगद के बाद मणिपुर का राज सम्भाला । महाराज चित्रांगद बभ्रुवाहन के मामा थे।


    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 177w

    महाभारत मे युद्ध आरम्भ होने से पहले पंडवो ने अपने जिस पुत्र की बली दी युद्घदेवता को दी थी, उसका नाम क्या था। तथा वो पाण्डवो मे से किसका पुत्र था?

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    प्रश्न 2

  • ayush_tanharaahi 177w

    प्रश्न- रामायण और रामचरितमानस मे मूल अन्तर क्या हैं।

    आप सभी लोगो का प्रश्न का जवाब देने के लिये तहे दिल से धन्यवाद। ����


    @vishalprabtani
    रामायण सम्पुर्ण हैं, जबकी रामचरितमानस सिर्फ प्रभू श्री राम के बारे मे।

    @rangkarmi_anuj
    रामायण वाल्मिकी जी व रामचरितमानस तुलसीदास जी द्वारा रचित हैं। रामायण पुरा जीवन हैं, राम के जन्म से लेकर चीर सागर तक का वर्णन,और रामचरितमानस राम की पूरी जीवनी उनके आदर्श की कहानी ।

    @naushadtm
    रामायण संस्कृत मे हैं,तो रामचरितमानस अवधी मे। रामायण वाल्मिकी जी की सम्पूर्ण रचना हैं,जबकी रामचरितमानस तुलसीदास जी ने अवधी मे दोहराई हैं।

    @naimishawasthi
    रामचरामचरितमानस तुलसीदासजी द्वारा रचित हैं, जिसमे लवकुश कांड नही हैं। रामायण वाल्मिकी द्वारा रचित हैं,जो की संस्कृत मे हैं।

    @vineetapundhir
    रामचरितमानस अवधी भाषा मे हैं, जिसमे चौपाई के माध्यम से राम चारित्र का वर्णन हैं। रामायण संस्कृत मे हैं तथा उसमे सम्पुर्ण राम कथा का वर्णन हैं।

    @yenksingh
    रामायण की रचना वाल्मिकी जी ने ,जबकि रामचरितमानस की रचना तुलसीदास जी ने की हैं।

    @rajni_pant
    वाल्मिकी जी कृत रामायण संस्कृत भाषा मे, रामजन्म के पहले लिखी गई । गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण 15 वी शताब्दी मे राम जन्म के कई वर्षों बाद लिखी गई ।

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    #kuchaisehi #ayushpancholi #hindimerijaan #ekprashn #ayuspiritual

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    प्रश्न 1- उत्तर

    रामायण वाल्मिकी द्वारा संस्कृत भाषा मे रचित एक महाकाव्य हैं। जो की सम्पूर्ण हैं। राम के जन्म के पहले से, उनके सरयू मे विलिन होने तक उनके साथ व उनसे त्रैतायुग मे जुड़े सभी जीवों के चरित्र के वर्णन के साथ। जिसमे असुर और उनके पुर्व जन्म के कार्य तथा उन्हे जो मोक्षप्राप्ती हुई उसका उसका सम्पूर्ण वर्णन हैं ।जो की त्रैतायुग मे ही लिखा गया हैं, 8 काण्ड मे। रामायण के सभी कांडो की रचना वाल्मिकी जी ने अपने योग ज्ञान से ध्यान के माध्यम से प्राप्त कर,घटित होने से पहले ही करदी थी। अन्य कुछ विद्वानो के मतानुसार ऋषी वाल्मिकी दस्यू से ऋषी बने, और ज्ञान प्राप्ती के बाद उन्होने , रामायण की रचना की। जैसा की रामायण नाम से ही स्पष्ट हैं,
    राम+अयन (राम के जीवन वर्ष) ।

    रामचरितमानस तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा मे छन्द, सोरठा,दोहा, और चौपाई के माध्यम से लिखा गया, कलयुग का महाकाव्य हैं। जिसमे राम के चरित्र का वर्णन ही उसका मूल हैं। इसकी रचना सन 1630 से 1633 के समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने की। रामचरितमानस मे 7 सात कांड हैं, जिनमे लवकुश कांड को स्थान नही दिया गया हैं। रामचरित मानस मे वर्णित सुन्दरकांड , कलयुग मे पूजित रामचरितमानस का सबसे अहम भाग हैं। जिसमे हनुमान जी द्वारा लंका मे जाकर, सीता माता की खबर व उन्हे रामजी द्वारा दी गई भेंट प्रदान करने व, हनुमान जी द्वारा अक्षय कुमार वध का व लंका दहन का, बहुत सुन्दर वर्णन व चित्रण मिलता हैं।

    अगर देखा जायें तो यह कहाँ जा सकता हैं, की रामायण आधार हैं, तो रामचरितमानस उसका सार हैं।

    जय श्री राम
    हर हर महादेव

    आयुष पंचोली
    ©ayush_tanharaahi

  • ayush_tanharaahi 177w

    @rangkarmi_anuj भाई जी आपके कहे अनुसार आज से शुरु प्रश्न काल।





    रामायण और रामचरितमानस मे मूल अन्तर क्या हैं?


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    प्रश्न 1

  • ayush_tanharaahi 213w

    कितना खूबसुरत था वो नजारा, ना था दुनिया का गम , ना कोई दुश्मन हमारा।
    जब पहली बार मैने माँ के शरीर मे आराम पाया।
    कितने खुश थे, मेरे माता-पिता जब मे कोख मे एक भ्रूण था।
    कितनी खुशियाँ थी, माँ भी खुश, पापा भी खुश, सारा परिवार खुशी से झूम रहा था, और मैं धीरे धीरे आकार ले रही थी।
    मेरी माँ की खुशी का कोई ठिकाना ना था,
    पापा को दुखी होने का कोई बहाना ना था।

    पर किसे पता था, ऐसा भी एक दिन आयेगा। भगवान का वहीं दुसरा रूप अपने पेशे से भी गद्दारी कर जायेगा।
    जब पता चला जमाने को की, मैं एक लड़की हूँ, सारी खुशियां गम में बदल गई,
    पापा की हसीं भी जाने कहाँ खो गई,
    माँ भी मेरी गमों मे समा गई।
    आखिर में सबकी खुशी के आगे माँ को , मुझे त्यागना पड़ा।
    आज फिर इस बेदर्द जमाने के आगे, एक और लड़की को बिना जन्म लिये ही भागना पड़ा।

    क्या गलती थी मेरी? कि मैं एक लड़की थी, या मैं लड़का नही,
    क्या गलती थी उस माँ की ? जिसने मुझे कुछ महीने कोख में पाला,
    क्या गलती थी हमारी? की वो एक स्त्री होकर एक और स्त्री को इस दुनिया मे ला रही थी,
    आखिर क्या थी हमारी गलती?

    जो मेरी माँ के आँसु भी ना धो सँके ,और मुझे इस दुनिया मे आने से पहले ही कुछ अपनो ने धोखा दे दियां।
    पीठ मे नही, खंजर सीधे सीने में ही घोंप दिया।
    आज मैने एक लड़की होने की सज़ा पायी हैं,
    बिना धरती पर कदम रखे अपनी जान गवाई हैं।

    सोचा था मैने भी की मैं, अपने माँ-पापा की आँखों का तारा बनूंगी,
    पर मुझे मालुम ना था, मुझे तो अपनाया ही नही जायेगा,
    दुनिया मे कदम रखने से पहले ही मुझे मिटा दिया जायेगा।
    शायद यहीं हैं एक लड़की होने की सज़ा,
    इसलिये मुझे मिली बिना जन्मे ही, मौत की सज़ा ।
    इसलिये मुझे मिली बिना जन्मे ही मौत की सज़ा।

    (1/6/2015)कुछ पुराना लिखा।






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    ✍एक प्रश्न...✍

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    यह प्रश्न हैं , हर उस कन्या के भ्रूण का इस समाज के उन सभी दरिन्दो से जिन्होने उसे जन्म ही नही लेने दियां।
    1/6/2018
    10:30 A.M



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