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  • purnimaindra 10w

    दो जोड़ी हाथ
    ************

    जेल की सीखचों के पीछे
    अपराधिनी सी खड़ी
    सलाखों पर
    अपने एक जोड़ी हाथों से
    टटोलती रही
    "अपने एक जोड़ी हाथों को"
    जिनकी मुट्ठी में शायद--
    मेरे अपने ही सपने
    अपना सारा आकाश
    मेरी अपनी ही आकांक्षाएं
    मेरी अपनी पूरी जीवन लीला बंद थी।
    ठीक एक दुनियां में आए
    नवागन्तुक शिशु की तरह
    जो भाग्य बंद किए थी
    मुट्ठी में।
    और टटोल-टटोल कर
    उन रेखाओं में अपना जीवन-दर्शन
    खोज रही थी।
    और मैं भी--
    सलाखों के उस पार के
    एक जोड़ी हाथों को
    जो पृथक संवेदना के थे,
    टटोलती रही,रोती रही,
    अपनी व्यथा सुनाती रही।
    जल्दी पास बुलाने की
    मिन्नतें करती रही।
    लेकिन साथ ही
    सलाखें थे कि
    दो जोड़ी हाथों के बीच
    दीवार बन कर खड़े हो गये थे।
    जो मुझे और उसे
    आपस में देखने तो देती थीं,
    पर आलिंगन में बंधने को
    तीखी नज़र से देखती थीं
    शायद इसकी ईर्ष्या ही थी यह
    या फिर शायद-
    ये सींखचे भी सौतेलेपन का
    रूप प्रस्तुत करते रहे।
    मैं उसकी उंगलियों में
    वह मेरी उंगलियों में
    उंगलियां फंसाए--
    आलिंगनबद्ध होने को आतुर
    सारा दुखड़ा,बीती यादें,आने वाले पल
    सारा प्रेम,सारा आह्लाद, विषाद
    एक साथ परस्पर
    बिखेरने को आतुर
    एक दूसरे को निरीह सा ताकते रहे,
    आंसुओं की ज़ुबान से सब कुछ कहते रहे।
    और बार- बार इसी तरह
    मेरे व उसके दो जोड़ी हाथ
    सलाखों के आर-पार
    मिलते रहे।
    अनकही बातें कहते रहे।
    अपनी इच्छाओं को
    इन्हीं दो जोड़ी हाथों से कुचलते रहे।
    और चार वर्षों की
    अवधि खत्म होने की
    प्रतीक्षा करते रहे।
    ©️®️ purnima Indra



    ©purnimaindra

  • purnimaindra 14w

    मील का पत्थर
    **************
    सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर की तरह हूं मैं,
    जो अपनी चिर स्थिर जगह पर विराजमान है।
    जो प्रतीक्षा में रत है आते जाते राहगीरों के लिए,
    शायद उसकी दयनीय निष्प्राण स्थिति पर दृष्टि डाले कोई।
    पर हाय! नहीं कोई मूल्य है मेरे शांत,मूक अस्तित्व का,
    केवल एक प्रतीक बन के रह गया है उनके मार्गदर्शन का।
    मेरे अस्तित्व के खोल पर कोई छायादार वृक्ष भी नहीं,
    क्यों कि मैं मील का पत्थर हूं न कठोर प्रस्तर,
    यही तो दुनियां समझती आ रही है पर कैसे कहूं कि,
    प्रस्तर हूं तो क्या? आख़िर एक अस्तित्व मेरा भी तो है।
    हां कभी कभी वर्ष में एक बार मेरे रंग रूप को चमकाने के लिए,
    कोई व्यक्ति रंग और तूलिका लिए आ बैठता है,
    अपनी गुनगुनाते हुए वह मगन हो मुझ पर नया आवरण चढ़ाता है।
    पर मैं उससे,अपना दोस्त समझकर बोलना चाहता हूं,
    तो उसकी गुनगुनाहट में मेरी आवाज़ गुम हो जाती है।
    आया हुआ व्यक्ति अपना काम निपटाकर चल देता है।
    फिर मैं अकेला तन्हा रह जाता हूं अपने चिर परिचित स्थान पर,
    सोंचता हूं आवरण तो सुंदर चढ गया पर ,
    मेरे अंदर की टूटन और घुटन वैसे की वैसी ही है,
    कुछ भी तो नहीं बदला,हां-बदला तो एक नया अहसास।
    जीवन के क्षणों में निरंतर, नये अहसासों को पाते हुए,
    टूटते-टूटते जीवन की अंतिम घड़ी तक पहुंचना चाहता हूं।
    पर क्या करूं?ठहरा प्रस्तर स्थिर हूं निरंतर,
    हां, कभी कभी उस वाहन की प्रतीक्षा करता हूं,
    जो टकरा जाए मुझसे और मुक्त हो जाऊं मैं,
    अपने मील के प्रस्तर के आवरण से,
    मुक्त हो जाऊं मैं अपनी चिर स्थिरता से,
    पहनूं नये जीवन का चोला जो परिवर्तन की ओर उन्मुख हो।
    फिर मैं अपने नये जीवन में प्रवेश करके नये अहसासों का भागी बनूं,
    और नये आवरण में नये अस्तित्व का निर्माण करूं।
    स्वरचित और मौलिक-
    ©️®️ purnima Indra
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 14w

    आख़िरी किनारा
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    तनहाई का आलम ही अब सहारा है,
    किश्ती डूबी है कोई न अब किनारा है।

    राह में बहुत थक गये थे चलते चलते,
    मिली न कोई छांव न ही कोई आसरा है।

    भूली बिसरी मचलती यादों के जंगल में,
    न ही कोई डगर है न ही कोई उजियारा है।

    ढूंढता फिरता हूं कितने सारे अपनों को,
    कितना पागल दिल है कितना मतवारा है।

    दफ़न होती गयी हैं उम्मीदें और ख्वाहिशें,
    न ही कोई लख्त़े ज़िगर है न ही कोई प्यारा है।

    सबकी नादानियां भुला दी हैं मैंने मेरे यारों,
    दिल बस ढूंढता इक आख़िरी किनारा है।
    स्वरचित एवं मौलिक--
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 20w

    दूर होने के तुमने बहाने बना लिए
    याद आई तो हमने अश्क बहा लिए
    भुला ही देना था तुमको तो यारा
    क्यों हमसे यूं दिल लगा लिए।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 48w

    जाओ करोना बिदा हो जाओ,
    दु:स्वप्न सा सब भूल जाओ ।
    स्वागत करो सब नव-वर्ष का,
    धुंध ,अंधेरा मिटे सारे जग का।
    आओ हर्षोल्लास में सब गाएं,
    बुराइयों का दहन कर जाएं।
    मित्र,बंधु-बांधव सब मिल गाओ,
    नूतन-वर्ष का मंगल गीत गाओ।
    हिल -मिल सब खुशियां मनाओ,
    भुला दो ग़म सब दर्द भूल जाओ।
    प्रभु!कर जोड़ कर रहे तेरा वंदन,
    नूतन-वर्ष तेरा हो नया अभिनंदन।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 48w

    शर्माकर यूं तुझसे दिलदार मेरे,
    नैन कजरारे,गेसू हैं कांधे पे मेरे।
    सुन आजा ओ प्यारे परदेसी मेरे,
    मेंहदी शरमाई है हाथों में मेरे।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 55w

    मेरी उदासियां,
    मेरी तन्हाईयां,
    मेरी खामोशियां,
    मुझसे पूछा करती हैं..
    तुम कैसी हो??
    मैं... मैं...
    अपनी जीवन यात्रा में,
    अपनों के साथ
    अनवरत, चलायमान
    कलकल बहती
    नदी की भांति,
    अपने सीनें पर
    मौसम के थपेड़ों
    को सहती
    जा रही हूं बहती...
    नवचेतना का
    संचार लिए,
    आंदोलनों का
    व्यवहार लिए,
    विचारों का उद्गार लिए,
    अपने गंतव्य की ओर
    जानें को आतुर,
    मिल जानें को
    समन्दर में..
    अपनी उत्कंठा लिए,,
    प्रतीक्षा है
    उस लोक में
    समाहित हो जानें
    के लिए....
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 122w

    आँसू

    जैसे आसमान के पहलू में बादल के कतरे दिख ही जाते हैं,
    और तड़प-तड़प कर मचल-मचल कर तपन में बरस ही पड़ते है।
    वैसे ही मेरे ये शबनमी कतरे मौका पाकर आँखों में अपना आशियाँ बना लेते हैं,
    फिर कुछ तपन पाकर मौके की न चाहते हुए भी ढलक जाते हैं।
    पर किसी के सामने नहीं आते क्यूँ कि ये उनसे पर्दा करते हैं,
    ये अपनी परेशानियों, उलझनों से दूसरों को नहीं तड़पाते हैं।
    खुद अपनी ही बात खुद से समझाते सहलाते रह जाते हैं,
    अपने आप को छिपाकर खुद ही ज़माने की राहों में भटकने चले जाते हैं।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 122w

    रहबर

    मेरी शोखियों,अदाओं पर न जा ओ रहबर,
    बड़ी सारी चोटें खाई है मैंने अपने दिल पर।
    ©purnimaindra

  • goyaldivya 125w

    विडंबना

    गैरों से क्या शिकवा करना
    जब जख्म हरे अपनों से हो...
    जग में किसी से क्या खुलना
    जब मन के तार बंधे हुए हो...
    दुनिया की कभी ना परवाह थी
    मैं पंख फैलाए उड़ती थी
    कटे हुए उन पंखों से
    अब रक्त कहां बहता है...
    क्यों पत्थर के अंश सहेजना
    जब दीमक घर पर बैठी हो...
    गैरों से क्या शिकवा करना
    जब जख्म हरे अपनों से हो...
    ©goyaldivya

  • purnimaindra 142w

    प्यार, इश्क,मुहब्बत, ऐ दिल ये तेरी तिलस्मी अदाएँ हैं,
    कभी ये हँसाये,कभी ये रुलाए, कभी ये कसमसाए हैं।
    ©purnimaindra