#hindimushayra

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  • purnimaindra 22w

    मील का पत्थर
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    सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर की तरह हूं मैं,
    जो अपनी चिर स्थिर जगह पर विराजमान है।
    जो प्रतीक्षा में रत है आते जाते राहगीरों के लिए,
    शायद उसकी दयनीय निष्प्राण स्थिति पर दृष्टि डाले कोई।
    पर हाय! नहीं कोई मूल्य है मेरे शांत,मूक अस्तित्व का,
    केवल एक प्रतीक बन के रह गया है उनके मार्गदर्शन का।
    मेरे अस्तित्व के खोल पर कोई छायादार वृक्ष भी नहीं,
    क्यों कि मैं मील का पत्थर हूं न कठोर प्रस्तर,
    यही तो दुनियां समझती आ रही है पर कैसे कहूं कि,
    प्रस्तर हूं तो क्या? आख़िर एक अस्तित्व मेरा भी तो है।
    हां कभी कभी वर्ष में एक बार मेरे रंग रूप को चमकाने के लिए,
    कोई व्यक्ति रंग और तूलिका लिए आ बैठता है,
    अपनी गुनगुनाते हुए वह मगन हो मुझ पर नया आवरण चढ़ाता है।
    पर मैं उससे,अपना दोस्त समझकर बोलना चाहता हूं,
    तो उसकी गुनगुनाहट में मेरी आवाज़ गुम हो जाती है।
    आया हुआ व्यक्ति अपना काम निपटाकर चल देता है।
    फिर मैं अकेला तन्हा रह जाता हूं अपने चिर परिचित स्थान पर,
    सोंचता हूं आवरण तो सुंदर चढ गया पर ,
    मेरे अंदर की टूटन और घुटन वैसे की वैसी ही है,
    कुछ भी तो नहीं बदला,हां-बदला तो एक नया अहसास।
    जीवन के क्षणों में निरंतर, नये अहसासों को पाते हुए,
    टूटते-टूटते जीवन की अंतिम घड़ी तक पहुंचना चाहता हूं।
    पर क्या करूं?ठहरा प्रस्तर स्थिर हूं निरंतर,
    हां, कभी कभी उस वाहन की प्रतीक्षा करता हूं,
    जो टकरा जाए मुझसे और मुक्त हो जाऊं मैं,
    अपने मील के प्रस्तर के आवरण से,
    मुक्त हो जाऊं मैं अपनी चिर स्थिरता से,
    पहनूं नये जीवन का चोला जो परिवर्तन की ओर उन्मुख हो।
    फिर मैं अपने नये जीवन में प्रवेश करके नये अहसासों का भागी बनूं,
    और नये आवरण में नये अस्तित्व का निर्माण करूं।
    स्वरचित और मौलिक-
    ©️®️ purnima Indra
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 22w

    आख़िरी किनारा
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    तनहाई का आलम ही अब सहारा है,
    किश्ती डूबी है कोई न अब किनारा है।

    राह में बहुत थक गये थे चलते चलते,
    मिली न कोई छांव न ही कोई आसरा है।

    भूली बिसरी मचलती यादों के जंगल में,
    न ही कोई डगर है न ही कोई उजियारा है।

    ढूंढता फिरता हूं कितने सारे अपनों को,
    कितना पागल दिल है कितना मतवारा है।

    दफ़न होती गयी हैं उम्मीदें और ख्वाहिशें,
    न ही कोई लख्त़े ज़िगर है न ही कोई प्यारा है।

    सबकी नादानियां भुला दी हैं मैंने मेरे यारों,
    दिल बस ढूंढता इक आख़िरी किनारा है।
    स्वरचित एवं मौलिक--
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 27w

    दूर होने के तुमने बहाने बना लिए
    याद आई तो हमने अश्क बहा लिए
    भुला ही देना था तुमको तो यारा
    क्यों हमसे यूं दिल लगा लिए।
    ©purnimaindra