#hindirubaiyan

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  • purnimaindra 2d

    थोड़े ही है

    सामान थोड़ा बिखरा पड़ा रहने दो
    ये अपना घर है कोई होटल थोड़े ही है।

    बैठ लो ज़रा दादी नानी के पास किस्से कहानियां हैं अख़बार थोड़े ही है।

    खाओ चाहें पिज़्ज़ा बर्गर मोमोज़ कितने
    दही-भल्ले ,चाट,कांजी बड़े थोड़े ही है।

    पहनों कितनी ही जींस,प्लाज़ो ,लैगिंग ये भारतीय परिधान साड़ी थोड़े ही है।

    होंगे गगन में लाखों चांद सितारे कितने ही
    ये मेरे हिस्से का आसमान थोड़े ही है।

    मकानों में बन गये कमरे ,लॉबी
    वहां आंगन और दालान थोड़े ही है।

    भूल गये सब बाग-बगीचे, ताल-तलैया
    यहां उड़ती मिट्टी की सोंधी महक थोड़े ही है।

    रिश्ता अपनों से बना रहे या टूटे कभी
    दोस्तों तुम पर ये इल्ज़ाम थोड़े ही है।

    भटक रहे किस तरह इस दुनियां में हम
    ये जिंदगी का आखिरी मुक़ाम थोड़े ही है।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 21w

    मील का पत्थर
    **************
    सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर की तरह हूं मैं,
    जो अपनी चिर स्थिर जगह पर विराजमान है।
    जो प्रतीक्षा में रत है आते जाते राहगीरों के लिए,
    शायद उसकी दयनीय निष्प्राण स्थिति पर दृष्टि डाले कोई।
    पर हाय! नहीं कोई मूल्य है मेरे शांत,मूक अस्तित्व का,
    केवल एक प्रतीक बन के रह गया है उनके मार्गदर्शन का।
    मेरे अस्तित्व के खोल पर कोई छायादार वृक्ष भी नहीं,
    क्यों कि मैं मील का पत्थर हूं न कठोर प्रस्तर,
    यही तो दुनियां समझती आ रही है पर कैसे कहूं कि,
    प्रस्तर हूं तो क्या? आख़िर एक अस्तित्व मेरा भी तो है।
    हां कभी कभी वर्ष में एक बार मेरे रंग रूप को चमकाने के लिए,
    कोई व्यक्ति रंग और तूलिका लिए आ बैठता है,
    अपनी गुनगुनाते हुए वह मगन हो मुझ पर नया आवरण चढ़ाता है।
    पर मैं उससे,अपना दोस्त समझकर बोलना चाहता हूं,
    तो उसकी गुनगुनाहट में मेरी आवाज़ गुम हो जाती है।
    आया हुआ व्यक्ति अपना काम निपटाकर चल देता है।
    फिर मैं अकेला तन्हा रह जाता हूं अपने चिर परिचित स्थान पर,
    सोंचता हूं आवरण तो सुंदर चढ गया पर ,
    मेरे अंदर की टूटन और घुटन वैसे की वैसी ही है,
    कुछ भी तो नहीं बदला,हां-बदला तो एक नया अहसास।
    जीवन के क्षणों में निरंतर, नये अहसासों को पाते हुए,
    टूटते-टूटते जीवन की अंतिम घड़ी तक पहुंचना चाहता हूं।
    पर क्या करूं?ठहरा प्रस्तर स्थिर हूं निरंतर,
    हां, कभी कभी उस वाहन की प्रतीक्षा करता हूं,
    जो टकरा जाए मुझसे और मुक्त हो जाऊं मैं,
    अपने मील के प्रस्तर के आवरण से,
    मुक्त हो जाऊं मैं अपनी चिर स्थिरता से,
    पहनूं नये जीवन का चोला जो परिवर्तन की ओर उन्मुख हो।
    फिर मैं अपने नये जीवन में प्रवेश करके नये अहसासों का भागी बनूं,
    और नये आवरण में नये अस्तित्व का निर्माण करूं।
    स्वरचित और मौलिक-
    ©️®️ purnima Indra
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 55w

    शर्माकर यूं तुझसे दिलदार मेरे,
    नैन कजरारे,गेसू हैं कांधे पे मेरे।
    सुन आजा ओ प्यारे परदेसी मेरे,
    मेंहदी शरमाई है हाथों में मेरे।
    ©purnimaindra