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4708 posts
  • ehsaas_arav 20w

    मासूम सा चेहरा, गाल गुलाबी, हल्की सी मुस्कान लिए है,
    कोई और नहीं ये खूबी ओढ़े, ये तो मेरी वही प्रिये है,
    स्वभाव नरम तो कभी गरम है, चंचल वो मदमस्त पतंग है,
    वैसे वो है चांद सी शीतल, कभी वही हड़कंप द्वंद्व है।

    ~ehsaas_arav

  • ehsaas_arav 20w

    सपने में कल पापा का आना‌ हुआ,
    उन्हें देखकर रहा ना गया
    मेरा उन्हें कसकर गले लगाना हुआ,
    नये जीवन का जैसे आभास और आगाज हुआ,
    उन्हें मुस्कुराता देख जैसे मैं पुनः जीवंत हुआ,
    वक़्त बिताया बातें हुई, काफी हंसी ठिठोली भी चली,
    जैसे अधजली किताब के बचे पन्नों को
    पानी की बौछार मिली,
    पापा के स्नेह की छत्रछाया में
    मैं मंत्रमुग्ध हो गया था,
    जी ऐसे रहा था जैसे
    स्वप्न ही अब जीवन हो गया था।

    ~ehsaas_arav

  • rituchaudhry 20w

    हम जॉन नहीं तो क्या
    हादसों की कमी तो नहीं
    ©rituchaudhry

  • 73mishrasanju 29w

    बस यूँ ही
    तम तमी अँखियों में बीत गई ,
    तुम बेवज़ा फिर याद आ गई ।
    हम टूट गए थे बा वज़ तुम पर
    तुम तम सी बेवफ़ा यामिनी हो गई।

    बा वज़ / सभ्यता के साथ
    बेवज़ा/ बगैर बनावटी ढंग के

    ©73mishrasanju

    26 /10/2021 4:00 am

  • khanmt50 34w

    मोहब्बत की सज़ा

    मोहब्बत की सज़ा अब सरेआम दिया जाए,
    इल्जाम कोई भी रहे बस मेरा नाम लिया जाए।
    ©khanmt50

  • khanmt50 34w

    शक्स

    अजीब ये शक्स था जो कभी खुश मुझे रहने ना दिया,
    खुद खुश ना रहा और मुझे कभी कहने ना दिया।
    ©khanmt50

  • khanmt50 35w

    गुनाह

    गुनाह जब हद से गुज़रता है तो ख़िराज मांगता है,
    सज़ा भी अपने करीने से चल के आती है।
    ©khanmt50

  • 73mishrasanju 39w

    तकिया

    मैंने बदल दिया है
    वह तकिया जिस पर सर रखकर हम सोते थे
    सपने देखते थे
    बहुत दिनों तक मेरी नींद सोख लेता था वह तकिया
    सपने बुलबुले हो गए
    अपने जाने कहां खो गए
    धुल धुल कर भी ना गई तुम्हारी खुशबू
    उस तकिए से
    मेरा रतजगा बुलाती रही हर रात
    बिस्तर के हर तरफ से उतरता रहा, चढ़ता रहा पैर ,पेट ,कांधे सब सो गए ,सोते रहे
    सिवाय एक मन के ,
    जो प्रेत सा उड़ता रहा रात भर जागता रहा या पीता रहा अश्क ,मन मेरा ,अब
    मैंने वह तकिया बदल दिया है ।
    संजय मिश्रा
    15/8/2021

    ©73mishrasanju


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  • 73mishrasanju 50w

    जागृत स्वप्न

    दिनभर की थकन से पस्त हुआ
    बिस्तर पर आकर बैठा था
    आँखे बोझिल होती जाती थी
    जैसे तैसे सिरहाना सर को टिकाया था
    सरगोश नींद की हुई शुरू
    तभी शरारत करके अचानक
    मन ने सपनों को जगा दिया
    सोने पर तो सभी देखते
    तुम देखो जगती आँखों से ख़्वाब
    गहन नींद में गाहेबगाहे आये
    सपनों की तुलना से अधिक सजग होंगे
    नींद बेचारी अचकचाई सी
    ये गई कि वो गई
    देखने सपने शुरू किये
    बढ़ते ही गए बढ़ते ही गए
    कुछ छूटा कुछ पकड़ा
    कुछ बांधा कुछ छोड़ा
    कुछ लिया सहेज लिया सदा के लिए
    कुछ छोड़ दिए बस गिरह लगा
    ताना बाना भूली बिसरी
    खट्टी मीठी यादों की
    डोर पकड़ बढ़ता ही गया
    सपनों की विस्तृत ये चादर
    जितनी समेटी उतनी ही
    फैलती गई जिद्दन बच्ची सी
    कुछ रंग बिरंगे से सपने थे
    कुछ काले और सफेद भी थे
    कुछ स्वप्नों पर थी राख जमी
    कुछ दहके हुए लावे भी थे
    कुछ बर्फ से सर्द कठिन थे
    कुछ रंग बहारों के भी थे
    कुछ बीत चुके सपने भी थे
    कुछ नए सँजोये से भी थे
    सपनों की आपा धापी में
    गुजर तीसरा प्रहर गया
    नींद कहीं पथराई सी
    इंतजार करती होगी
    मैं सोच रहा आँखे खोले
    कल सुबह हकीकत क्या होगी
    सब प्यारे सपने पलकों में भर
    आँखों को कसकर भींच लिया
    अब नींद रूठ कर बैठी है
    आती भी नहीं बुलाने से

    संजय मिश्रा
    3/6/2021

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 55w

    जलती चिताओं की अनल अब ,
    दावानल वलय सी लगती है ।
    चमकती बेफिक्र ज़िंदगी अब ,
    धुँआ धुँआ , राख सी लगती है ।

    संजय मिश्रा - 1/5 / 2021

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 55w

    स्वप्नद्रष्टा

    मै एक अचेतन स्वप्नदृष्टा
    देखता हूँ अलस भोर में अँधकार से निकल भागने को आतुर सूर्य की छटपटाहट
    दोपहर को खुले आसमान में रार मचाते धरा को दह्काते सूर्य को
    और सांझ के साँवरे सलोने उच्च भाल पर बिंदी से जड़े शालीन सूर्य को
    मैं महसूस करता हूँ सुदूर प्रांतों से लंबा रास्ता
    तय करके आईं अद्भुत गुलाबी हवाओं को
    देखता हूँ मै विस्मय से मुंह खोले से नवपल्लवित नर्म पौधों को
    देख पाता हूँ चाँद के देर से आने पर भयभीत हिरणी सी बेसुध होती और खिल उठती चांदनी को
    हां मै हूँ एक अचेतन स्वप्नदृष्टा
    संजय मिश्रा 26/04/2019

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 64w

    जीवन बोध

    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं कुछ उजले कुछ धुंधले-धुंधले।
    जीवन के बीते क्षण भी अब कुछ लगते है बदले-बदले।

    जीवन की तो अबाध गति है, है इसमें अर्द्धविराम कहाँ
    हारा और थका निरीह जीव ले सके तनिक विश्राम जहाँ
    लगता है पूर्ण विराम किन्तु शाश्वत गति है वो आत्मा की
    ज्यों लहर उठी और शान्त हुई हम आज चले कुछ चल निकले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

    छिपते भोरहरी तारे का, सन्ध्या में दीप सहारे का
    फिर चित्र खींच लाया है मन, सरिता के शान्त किनारे का
    थी मनश्क्षितिज डूब रही, आवेगोत्पीड़ित उर नौका
    मोहक आँखों का जाल लिये, आये जब तुम पहले-पहले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

    मन की अतृप्त इच्छाओं में, यौवन की अभिलाषाओं में
    हम नीड़ बनाते फिरते थे, तारों में और उल्काओं में
    फिर आँधी एक चली ऐसी, प्रासाद हृदय का छिन्न हुआ
    अब उस अतीत के खंडहर में, फिरते हैं हम पगले-पगले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...
    अज्ञात



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  • shashiinderjeet 79w

    सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ
    आप सब के जीवन में खुशियों के पुष्प खिलाएँ
    शशिइन्द्रजीत

    #दीपावली

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    शुभ कामनाएँ....

    दीपावली
    माना कोरोना ने बदहवास किया
    फिर भी हम जी भर खिलखिलाएं गे

    भारतवासी मिल मिटटी के दीप जला
    अमावस में पूर्णिमा धरा पर लाएं गे

    रामराज्य समरसता की महक फैला
    सितारों सा भारत को जगमगाएं गे

    विजय पर्व से सीख ले धर्म विजय की
    उर को सत्य धर्म गुणों से सजाएं गे

    घृणा की विष सोच मिटा सब उर से
    एकता की पताका सभी लहराएं गे

    अपने सद गुणों से भर सब के उर
    विश्व को भी एकता अमृत पिलाएं गे

    जिस मानव में भरे नहीं हैं मानव गुण
    उनको मानवता का गुण सिखलाएं गे

    ©shashiinderjeet

  • shashiinderjeet 82w

    नवरात्र मर्यादा

    जिन घरों में संस्कारों को मान दिया जाता है ,
    माँ का , बहन का आदर करना सिखाया जाता है,
    वो ही बच्चे अनजान लड़कियों की इज्ज़त बचाने में
    अपने प्राणों की बलि दे देते हैं ।
    ऐसे लाखों उदाहरण मिलते हैं ।
    गंदे संस्कारों में पले नशे में ,
    अनेकों व्यसनों में लिप्त ,
    हर नारी में वेश्या देखने वाले
    अपनी माँ , बहन का अपमान करने वाले ही
    बलात्कार जैसे घृणित अपराध करते हैं ।
    किसी भी धार्मिक परिवार के बच्चों में
    मैने अपने जीवन में ऐसे कुकर्मी को कभी नहीं देखा ।
    कृप्या सभी धार्मिक लोगों से अनुरोध है
    कि वो ईश्वरी शक्ति को नारी के साथ जोड़ कर
    अपनी पोस्ट से गलत संदेश न दें ।
    सर्व प्रथम हिन्दू धर्म का स्वयं अच्छी तरह से ज्ञान अर्जित करें ,
    फिर उसे पोस्ट में डालें ।
    नवरात्र मर्यादा को भंग न करें ।
    धन्यवाद्


    ©shashiinderjeet

  • 73mishrasanju 82w

    ये दिल अपना न जाने क्यूँ
    यूँ ही बस टूट जाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    मेरी दीवानगी मुझको,
    कहाँ ले कर के जाएगी
    मेरी ख़्वाहिश किसी को भी,
    न शायद रास आएगी
    ये ग़म मेरा न जाने क्यूँ,
    मुझी पर मुस्कुराता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    खिज़ाओं में बसे थे हम,
    बहारें थीं मुहाने पर
    क़रीब आईं नहीं पल भर,
    मेरे इतना बुलाने पर
    ये 'सच' मेरा न जाने क्यूँ,
    मुझे बरबस रुलाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को,
    तो जग ये रूठ जाता है

    मेरी ख़ुशियाँ मेरे दिल से,
    यूँ ही तक़रार करती हैं
    ज़रा ख़ुश हम जो होते हैं,
    हमीं पर वार करती हैं
    मेरा हँसना, न जाने क्यूँ
    क़हर मुझ पर ही ढाता है
    मनाते हैं जो हम दिलको
    तो जग ये रूठ जाता है

    ये दिल अपना,न जाने क्यूँ
    यूँ ही बस टूट जाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    ©73mishrasanju

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    ©73mishrasanju

  • ehsaas_arav 83w

    .

  • 73mishrasanju 83w

    मेरा इश्क़ ही मेरी ज़िंदगी , इसको मिटायें किस तरह ,
    तेरी ज़ुस्तज़ू में जी रहे , तुझे भूल जायें किस तरह ।

    बीत जाये उम्र यूँ ही , नाम तेरे कर जो दी ,
    मेरी ज़िंदगी बेहिसाब है , इसका हिसाब दूँ किस तरह।

    हद से गुज़र जाये यूँ ही , ये तड़प जो मेरे दिल की है
    ये ईनाम हैं जो ज़ख्म हैं , उनको छिपायें किस तरह।

    दर पर तेरे झुक जाये यूँ ही , सज़दे को मेरी नज़र ,
    तू ख़ुदा है मेरा ख़फ़ा है क्यूँ , तुझको मनायें किस तरह।

    मेरी सांस रूक जाये यूँ ही , तेरी ख़ुशबू अब जुदा न हो ,
    धड़कन मेरी तेरे नाम हैं , तेरा नाम न लूँ किस तरह,

    करे जा सितम मुझ पर यूँ ही , तेरी हर सज़ा क़ुबूल है ,
    मुझे दर्द देना अदा तेरी , इसे न कुबूलूँ किस तरह ।

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 83w

    बैठ किनारे , देखता हुआ
    सरोवर में गिरती उन बूँदों को
    ओस की बूँदें , जो
    झिलमिलातीं, सपनों की रात सी ,
    परिणीति, तरंगें उत्पन्न करतीं ,
    आश्चर्य है ! मेरा हृदय भी शांत ,
    किन्तु कहीं-कहीं पर
    डूबती - उतराती
    वह यादें , जो ओस बन मेरी पलकों से झरीं थी कभी ।
    देखता हूँ मैं कि मेरे छूते ही ,
    वह पत्ता काँप उठता है,
    सह नहीं पाता क्या वह भी,
    तपती रेत की तरह मेरी आस को,
    जो चुनती है ,
    ओस ,
    और सुंदरतम अतीत के ,
    भाव विह्वल पल,
    जैसे कि मैं फिर पूछता हूँ तुमसे ,
    क्या मैं ,
    देख सकता हूँ तुम्हें ?
    अपने हाथों से ?
    तुम मुस्कुरा देती हो,
    अहसास करके मेरे हाथों की छुअन का ,
    वह स्पर्श , जो अधरों से किया , तुम्हारा ,
    मेरी अंगुलियों ने कभी ।
    आह ! नहीं है अंत इसका , यह सब कुछ,
    बनेगा - मिटेगा
    बस इसी तरह से,
    लहरें-तरंगें , आत्मसरोवर में उठेंगी किन्तु ?
    यह भी हलाहल है जो ,
    मजबूर कर रहा है , मुझे ,
    शिव बनने को ।
    बैठ किनारे ,
    सोचता हूँ मैं ,
    तुमसे है जीवन या तुमसे था कभी ?

    ©73mishrasanju

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  • rituchaudhry 89w

    सोचने भर से सुकून आता है दिल को
    क्या होगा कहो ग़र मिल जाओ तुम तो
    ©rituchaudhry

  • rituchaudhry 89w

    ....
    ©rituchaudhry