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  • yashashwani 34w

    भज़ गोविंदम, भज़ गोविंदम मूढ़ मते।

    भगवान कृष्ण की शरण ग्रहण करो,

    वही उद्धार करेंगे ।

  • yashashwani 36w

    Lord shiva and lord krishna

  • yashashwani 36w

    Lord shiva and lord krishna

  • yashashwani 36w

    ॐ नमः शिवाय

    अच्युतम केशवम कृष्णा दामोदरम, राम नारायणम जानकी वल्लभम
    ©yashashwani

  • yashashwani 37w

    त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
    कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ (२०)

    भावार्थ : जो मनुष्य अपने सभी कर्म-फलों की आसक्ति का त्याग करके सदैव सन्तुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर कार्यों में पूर्ण व्यस्त होते हुए भी वह मनुष्य निश्चित रूप से कुछ भी नहीं करता है। (२०)

    निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
    शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ॥ (२१)

    भावार्थ : जिस मनुष्य ने सभी प्रकार के कर्म-फ़लों की आसक्ति और सभी प्रकार की सम्पत्ति के स्वामित्व का त्याग कर दिया है, ऎसा शुद्ध मन तथा स्थिर बुद्धि वाला, केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करता हुआ कभी पाप-रूपी फ़लों को प्राप्त नही होता है। (२१)

    यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
    समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ (२२)

    भावार्थ : जो मनुष्य स्वत: प्राप्त होने वाले लाभ से संतुष्ट रहता है, जो सभी द्वन्द्वो से मुक्त और किसी से ईर्ष्या नही करता है, जो सफ़लता और असफ़लता में स्थिर रहता है यधपि सभी प्रकार के कर्म करता हुआ कभी बँधता नही है। (२२)

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    Krishna

  • yashashwani 37w

    कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
    अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ (१७)

    भावार्थ : कर्म को भी समझना चाहिए तथा अकर्म को भी समझना चाहिए और विकर्म को भी समझना चाहिए क्योंकि कर्म की सूक्ष्मता को समझना अत्यन्त कठिन है। (१७)

    कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
    स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ॥ (१८)

    भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म (शरीर को कर्ता न समझकर आत्मा को कर्ता) देखता है और जो मनुष्य अकर्म में कर्म (आत्मा को कर्ता न समझकर प्रकृति को कर्ता) देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह मनुष्य समस्त कर्मों को करते हुये भी सांसारिक कर्मफ़लों से मुक्त रहता है। (१८)

    यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
    ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ (१९)

    भावार्थ : जिस मनुष्य के निश्चय किये हुए सभी कार्य बिना फ़ल की इच्छा के पूरी लगन से सम्पन्न होते हैं तथा जिसके सभी कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, बुद्धिमान लोग उस महापुरुष को पूर्ण-ज्ञानी कहते हैं। (१९)


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    Krishna

  • yashashwani 37w

    एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
    कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ (१५)

    भावार्थ : पूर्व समय में भी सभी प्रकार के कर्म-बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरी इस दिव्य प्रकृति को समझकर कर्तव्य-कर्म करके मोक्ष की प्राप्ति की, इसलिए तू भी उन्ही का अनुसरण करके अपने कर्तव्य का पालन कर। (१५)


    किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
    तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ (१६)

    भावार्थ : कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बडे से बडे बुद्धिमान मनुष्य भी मोहग्रस्त रहते हैं, इसलिए उन कर्म को मैं तुझे भली-भाँति समझा कर कहूँगा, जिसे जानकर तू संसार के कर्म-बंधन से मुक्त हो सकेगा। (१६)


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    Krishna

  • yashashwani 37w

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
    त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (९)

    भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। (९)

    वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
    बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ (१०)

    भावार्थ : आसक्ति, भय तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त होकर, अनन्य-भाव (शुद्द भक्ति-भाव) से मेरी शरणागत होकर बहुत से मनुष्य मेरे इस ज्ञान से पवित्र होकर तप द्वारा मुझे अपने-भाव से मेरे-भाव को प्राप्त कर चुके हैं। (१०)

    ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ (११)

    भावार्थ : हे पृथापुत्र! जो मनुष्य जिस भाव से मेरी शरण ग्रहण करता हैं, मैं भी उसी भाव के अनुरुप उनको फ़ल देता हूँ, प्रत्येक मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही पथ का अनुगमन करते हैं। (११)

    काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
    क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ (१२)

    भावार्थ : इस संसार में मनुष्य फल की इच्छा से (सकाम-कर्म) यज्ञ करते है और फ़ल की प्राप्ति के लिये वह देवताओं की पूजा करते हैं, उन मनुष्यों को उन कर्मों का फ़ल इसी संसार में निश्चित रूप से शीघ्र प्राप्त हो जाता है। (१२)




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    Krishna

  • yashashwani 37w

    अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ ।
    प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ (६)

    भावार्थ : यधपि मैं अजन्मा और अविनाशी समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर (स्वामी) होते हुए भी अपनी अपरा-प्रकृति (महा-माया) को अधीन करके अपनी परा-प्रकृति (योग-माया) से प्रकट होता हूँ। (६)


    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ (७)

    भावार्थ : हे भारत! जब भी और जहाँ भी धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने स्वरूप को प्रकट करता हूँ। (७)


    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ (८)

    भावार्थ : भक्तों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का सम्पूर्ण विनाश करने के लिए तथा धर्म की फ़िर से स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ। (८)

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
    त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (९)

    भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। (९)


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    Krishna

  • yashashwani 37w

    इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।
    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१)

    भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया। (१)

    स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
    भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ॥ (३)

    भावार्थ : आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग (आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान) तुझसे कहा जा रहा है क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय मित्र भी है, अत: तू ही इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है। (३)



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    Krishna

  • amritatiwari 107w

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    Krishna

    Aaj dil phir bechain hai tujhe dekhne ko, tujhe apna bnane ko....
    Lekin ek tera naam hi kaafi hai, es bechain dil ko sukun dene k liye...

  • khush4bharat 170w

    जय राम जय श्याम

    राम राम कहते रहो, राम नाम में राम।
    राम राम हो जाएगा, हरपल सबका राम।।

    मर्यादा की सीख तो, दे गए सबको राम।
    कर्म का अनुसरण करो, कह गए सबको श्याम।।

    सियावर राम जय जय राम राधे राधे राधेश्याम।
    हरे रामा हरे कृष्णा हरे कृष्णा हरे रामा

    महेन्द्र "खुश" मेरठी✍️
    लेखक-पटकथा, कहानी, गीत, कवि व हास्य- व्यंग्यकार।

    ©khush4bharat

  • way2way 181w

    Friend is need friend indeed is true
    Friendship day.


    ए सुदामा मुझे भी सिखा दें कोई हुनर तेरे जैसा…
    मुझे भी मिल जायेगा फिर कोई दोस्त कृष्ण जैसा…!!!Happy friendship day