#khwahishaan

172 posts
  • khwahishaan 59w

    जल और जीवन पर सुंदर कविता

    काश ये जीवन मेरा
    जल के जैसा हो जाए
    जिस के संग रहे
    उस में ही ये ढल जाए

    सब में समा कर के
    पहचान अपनी भुलाता है
    खुद को मिटा कर के
        औऱ़ो को बनाता है

    जब जब दूध को पकाया है
    पानी ने खुद को जलाया है
    दूध का गुणगान हुआ
    पानी को सब ने भुलाया है

    जलती ज्वाला ये बुझा दे
    सब को ये शीतल बना दे
    कभी रुको ना तुम जीवन में
    पानी सब को गतिशील बना दे

    खुद मिटता रहा सदियों से
    या मिटा रहे है हम सब मिलकर
    कुछ तो विचार करो इस पर
    ये बहता रहे सदा झरझर

    जल बिन क्या हम जी पाएंगे
    अपने बच्चों की विरासत
    को हम क्या नहीं बचाएंगे
    धन दौलत रखी रह जाएगी
    जल बिन सूनी दुनिया हो जाएगी।

    बचा लो इसको
    इसका कुछ तो ख्याल करो
    अपना नहीं तो अपने बच्चों
    का विचार करो। ।
    ©नीलम गुप्ता

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    जल और जीवन

  • khwahishaan 62w

    GHAZAL
    दीवारों पर घास उगी है कमरा कमरा जंगल है
    जंगल तो बाहर होता है अन्दर कैसा जंगल है
    कोई बताए कहाँ बसाऊं इन्सानों की बस्ती मैं
    कहाँ से काटूं कितना काटूं पूरी दुनिया जंगल है
    यहाँ वहाँ से कट जाता हूँ मैं भी जंगल कटने से
    मैं जंगल में रहता हूँ या मुझमें रहता जंगल है
    पन्छी अपने आप में गुम हैं हवा भी चुप सन्नाटा भी
    भरा पुरा जंगल है लेकिन कितना तन्हा जंगल है
    कहीं परिन्दे कहीं जानवर कहीं पे तितली कहीं पे फूल
    बच्चों के सामान के जैसा बिखरा बिखरा जंगल है
    वही है रंगत वही है साया वही है पतझड़ वही बहार
    दुनिया झूटी हो गई लेकिन आज भी सच्चा जंगल है
    मैं ने पिक्चर में देखा था आदम बाबा रहते थे
    तब से अब तक सोच रहा हूँ कितना बूढ़ा जंगल है
    - शकील आज़मी ( बनवास )

    دیواروں پر گھاس اگی ہے کمرا کمرا جنگل ہے
    جنگل تو باہر ہوتا ہے اندر کیسا جنگل ہے
    کوئی بتائے کہاں بساؤں انسانوں کی بستی میں
    کہاں سے کاٹوں کتنا کاٹوں پوری دنیا جنگل ہے
    یہاں وہاں سے کٹ جاتا ہوں میں بھی جنگل کٹنے سے
    میں جنگل میں رہتا ہوں یا مجھ میں رہتا جنگل ہے
    پنچھی اپنے آپ میں گم ہیں ہوا بھی چپ سناٹا بھی
    بھرا پرا جنگل ہے لیکن کتنا تنہا جنگل ہے
    کہیں پرندے کہیں جانور کہیں پہ تتلی کہیں پہ پھول
    بچوں کے سامان کے جیسا بکھرا بکھرا جنگل ہے
    وہی ہے رنگت وہی ہے سایہ وہی ہے پتجھڑ وہی بہار
    دنیا جھوٹی ہو گئی لیکن آج بھی سچا جنگل ہے
    میں نے پکچر میں دیکھا تھا آدم بابا رہتے تھے
    تب سے اب تک سوچ رہا ہوں کتنا بوڑھا جنگل ہے
    شکیل اعظمی ( بنواس )


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  • khwahishaan 62w

    या तो दरिया में वो उतर जाएँ
    या वो बेचैनियों से मर जाएँ ,

    जिनको ख़ल्वत में भी सुकून नहीं
    वो परिंदे भला किधर जाएँ !
    ©रीत

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  • khwahishaan 63w

    मैं कभी नहीं देखता
    क्या किया गया है,
    मैं केवल ये देखता हूं कि
    क्या करना बाकी है।
    ©गौतम बुद्ध

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    Pic. Credit _ hreetu pandey

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  • khwahishaan 63w

    Happy Brother's Day #2021

    सदा तुम नफरत करते हो ,पर तुमको मुझसे प्यार हैं
    मेरा प्रेम हैं हल्का फुल्का , पर ये नफरत तुम पर ही भार हैं |

    जो नफरत बन फुट पड़ी हैं , बस वही प्यार का सार हैं
    चाहे जितनी शिद्दत कर लो , मुझको यह स्वीकार हैं ,

    भैया तुम क्या जानो कितना प्यार मुझसे करते हो
    अपने दिल के हाथों तुम , इतना क्यों बेजार हो

    तेरे दर पर जब आउंगी क्या दूर खड़े ही पाओगे
    निश्चल जड़ बन खड़े रहोगे , आँख में भर ना पाओगे |

    मामा कह जब वे दौड़ेंगे ,क्या उन्हें गोद में न ले पाओगे
    बच्चों की मुस्कान देख तुम , क्या निष्ठुर रह पाओगे

    जब शादी होगी तेरी तो क्या जीजू से द्वेष मनाओगे
    बहने करती हैं जो रश्मे ,वो किस्से करवाओगे

    कोन करेगा टिका तेरा , हल्दी किससे लगवाओगे
    बहन से होगी इतनी नफरत तो, गैरो से खाक निभाओगे

    प्यार में ज्यादा शक्ति हैं या नफरत में हैं बताओगे
    मैं तुम्हे चुनोती देती हैं , तुम नफरत करके दिखलाओगे

    तुम गुस्से को मत शांत करो ,और नफरत मुझेसे करते रहना
    स्नेह की अग्नि पावन हैं , तुम ही पिघलोगे ये कहती बहना
    ©विजय सैनी

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  • khwahishaan 63w

    बचपन में कछुए को देखती
    तो सोचती थी
    क्या देखता होगा
    इस तरह हाथ-पैर बाहर निकाल कर
    खुले आकाश को
    या उस दौड़ को
    जिसमें जीता था
    कभी उसका पुरखा।

    समय के साथ जानने लगी
    खतरा न हो तो ही
    निकलता है कछुआ
     खोल से बाहर।
    फिर वो भी हो गई कछुआ
    पड़ी रही एक कोने में
    कि किसी की निगाह न जाए उस पर
    आने-जाने वाले
    उसे भी मान लें एक पत्थर।

    एक दिन
    जाने क्यों
    उसे लगा
    वो पूरी तरह सुरक्षित है
    निकली वो बाहर
    बहुत दिनों बाद देखा आसमान
    जी भर के ली साँस।

    तभी उसे सुनाई देने लगी
    खतरों की आहटें
    पर
    जीने की लालसा में
    वो भूल गयी
    मरने का भय।

    उसे हुआ था पहली बार अहसास
    कछुआ नहीं
    लड़की है वो
    और तभी वो समझ गई यह भी
    कि सुरक्षित नहीं है वो
    फिर सिमट गई अपने खोल में।
    ©स्वरांगी साने

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  • khwahishaan 63w

    बचपन में कछुए को देखती
    तो सोचती थी
    क्या देखता होगा
    इस तरह हाथ-पैर बाहर निकाल कर
    खुले आकाश को
    या उस दौड़ को
    जिसमें जीता था
    कभी उसका पुरखा।

    समय के साथ जानने लगी
    खतरा न हो तो ही
    निकलता है कछुआ
     खोल से बाहर।
    फिर वो भी हो गई कछुआ
    पड़ी रही एक कोने में
    कि किसी की निगाह न जाए उस पर
    आने-जाने वाले
    उसे भी मान लें एक पत्थर।

    एक दिन
    जाने क्यों
    उसे लगा
    वो पूरी तरह सुरक्षित है
    निकली वो बाहर
    बहुत दिनों बाद देखा आसमान
    जी भर के ली साँस।

    तभी उसे सुनाई देने लगी
    खतरों की आहटें
    पर
    जीने की लालसा में
    वो भूल गयी
    मरने का भय।

    उसे हुआ था पहली बार अहसास
    कछुआ नहीं
    लड़की है वो
    और तभी वो समझ गई यह भी
    कि सुरक्षित नहीं है वो
    फिर सिमट गई अपने खोल में।
    ©स्वरांगी साने

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  • khwahishaan 63w

    Happy International Tea Day #2021

    मुआ रामू है हरजाई

    अज्ज कैसी चाय बनाई 

    पत्ती डालना भूल गया

    लगता है भांग मिलाई

    नाक सिकोड़ा ननदी ने

    श्वसुर ने ली जम्हाई

    सास ने तेवर कड़े किए

    बहुरानी पे चिल्लाई

    देवर छोटा रूठ गया

    उलाहना दे भौजाई

    बालम उठ गए दफ़्तर को

    बिना ही रोटी खाई

    पूरा घर ही उलट गया

    चाय ने जो चोट लगाई

    नासमझे इस रामू को

    अक्ल कभी न आई

    सुबह की चाय जो बिगड़ी

    दिवस बिगाड़े भाई
    ©अज्ञात

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  • khwahishaan 64w

    अनजान चेहरों मे हमदर्दी के रिश्ते भेजे हैं,
    सांसें देने वाले ने,सांस बचाने के लिए फरिश्ते भेजे हैं।
    ©सुमेधा सिंह

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  • khwahishaan 64w

    बेवजह घर से निकलने की जरूरत क्या है |
    मौत से आँख मिलाने की जरूरत क्या है ||

    सबको मालूम है बाहर की हवा है कातिल |
    फिर कातिल से उलझने की जरूरत क्या है ||

    जिन्दगी हजार नियामत है, संभाल कर रखे |
    फिर कब्रगाहो को सजाने की जरूरत क्या है ||

    दिल को बहलाने के लिये, घर में वजह काफी है |
    फिर गलियों में बेवजह भटकने की जरूरत क्या है
    ©गुलजार

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  • khwahishaan 65w

    खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
    सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको
    ©नज़ीर बाक़री

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  • khwahishaan 65w

    खूब ज़ुल्म हुए, पर अज़ान की सदा होती रही
    गोलियाँ चलती रही, नमाज़ें अदा होती रही

    मासूमों पर सितम का, बदला कुछ यूँ हुआ
    चीख निकलती रही, और वबा होती रही

    हमारे हाथ में पत्थर दिखे, उनके पर बम नहीं
    कुछ चुप्पी से, पूरी इंसानियत को सज़ा होती रही

    मोमिन की शहादत में, जो जश्न ढूंढ रहे
    सुनो, ज़ुल्म की भी उम्र सदा होती नहीं

    कुछ ना हो पास उनके, ईमान की ताकत है बहुत
    छीना जो भी, बरकत उसी की ज़्यादा होती रही

    तोड़ने को हौसला जब बच्चों को कत्ल किया
    वहीं मासूमो की बहादुरी फिर गवाह होती रही

    झुकेंगे नहीं वो सर बेशक सजदों में कट जाएंगे
    फिक्र तुम्हारी, नफ़रत की क्योंकि दवा होती नहीं

    वो जो हाकिम बनें रहनुमाई का जिन्हें इल्म नहीं
    बेकसूर क़त्ल होते रहे, कुर्सियां रुसवा होती रही
    #Palestine

    ©मार्टिन फैसल

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  • khwahishaan 65w

    ना रुकेंगे कभी हार के
    झूठी चमकती तलवार से
    तू था फ़कीर तब खड़ा
    भले लैस खंजर हथियार से
    ना मिट सका ना लिख सका
    तेरा मुकद्दर था बीमार से
    दुआओं में भरी मेरे रहबरी
    तू तोड़ेगा क्या तलवार से?
    यहाँ है फकीर बन खड़ा
    क्या जीतेगा मेरी हार से?
    ©ऋतु

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  • khwahishaan 67w

    पग बँधे घुँघरू मेरे,मन में उठे तरंग।
    और कहीं ना नचूँगी, सिवा साँवरे संग।।
    ©शोभा ढींगरा

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  • khwahishaan 67w

    चांदनी-धुला, अंजन सा, विद्युतमुस्कान बिछाता,
    सुरभित समीर पंखों से उड़ जो नभ में घिर आता,
    वह वारिद तुम आना बन!
    ज्यों श्रान्त पथिक पर रजनी छाया सी आ मुस्काती,
    भारी पलकों में धीरे निद्रा का मधु ढुलकाती,
    त्यों करना बेसुध जीवन!
    अज्ञातलोक से छिप छिप ज्यों उतर रश्मियां आती,
    मधु पीकर प्यास बुझाने फूलों के उर खुलवातीं,
    छिप आना तुम छायातन!
    कितनी करुणाओं का मधु कितनी सुषमा की लाली,
    पुतली में छान धरी है मैने जीवन की प्याली,
    पी कर लेना शीतल मन!
    हिम से जड़ नीला अपना निस्पन्द हृदय ले आना,
    मेरा जीवनदीपक धर उसको सस्पन्द बनाना,
    हिम होने देना यह मन!
    कितने युग बीत गए इन निधियों का करते संचय,
    तुम थोड़े से आँसू दे इन सबको कर लेना क्रय,
    अब हो व्यापार-विसर्जन!
    है अन्तहीन लय यह जग पल पल है मधुमय कम्पन,
    तुम इसकी स्वरलहरी में धोना अपने श्रम के कण,
    मधु से भरना सूनापन!
    पाहुन से आते जाते कितने सुख के दुख के दल,
    वे जीवन के क्षण क्षण में भरते असीम कोलाहल,
    तुम बन आना नीरव क्षण!
    तेरी छाया में दिव को हँसता है गर्वीला जग,
    तू एक अतिथि जिसका पथ है देख रहे अगणित दृग,
    सांसों में घड़ियाँ गिन गिन।
    ©महादेवी वर्मा

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  • khwahishaan 67w

    सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है
    चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी
    ©जलील मानिकपूरी

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    ..

  • khwahishaan 67w

    मुझे रात में रोज़
    देर से नींद आती है
    और मुझे इस घटना का
    कारण नहीं पता

    मैंने मन में
    मन से पूछा
    मैंने मन से
    एक क्षैतिज प्रश्न पूछा

    उसने मुझे ऊर्ध्वाधर उत्तर दिया
    क्रम से सारणी में उत्तर दिया
    नींद न आने के कारण -
    उत्सुकता कल की
    दोपहर में सोना
    चंचलता और अस्थिर दिमाग
    दिनभर की पुनः गणना
    और न जाने क्या - क्या ! कितना !

    मुझे ये नहीं पता था कि
    ये मन मेरी सारी बातें जानता है
    और देखो तो अब
    कितनी चालाकी से तुम्हें भी बता रहा है

    ये हर बार ऐसा ही करता है
    क्षैतिज प्रश्न पूछने पर
    सदैव ऊर्ध्वाधर ही उत्तर देता है
    हरबार ऐसे ही मुझे
    असमंजस में डाल
    अकेला छोड़ देता है
    और फिर देर रात में
    देर रात तक , बड़ी देर तक
    तेज - तेज बोलता है ।
    ©आदित्य वर्मा

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  • khwahishaan 68w

    पृथ्वी दिवस इसलिए मनाया जाता है
    क्योंकि वर्तमान में मानव द्वारा बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलाया जा रहा है, जिसके कारण पृथ्वी पर जीवन नष्ट होने की संभावना है

    इसलिए सभी लोगों में जागृति फैलाने के लिए Earth Day मनाया जाता है, ताकि कम से कम लोग एक दिन तो कम प्रदूषण करें और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं तथा जागरूक बने

    पृथ्वी के अमूल्य खनिज पदार्थों का भी कम से कम उपयोग करें क्योंकि यह सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है  अगर इनका अत्यधिक उपयोग किया गया तो भविष्य में इनकी कमी आ सकती है.....
    जागरूक बने
    जागरूक बनाए ����

    रंग बिरंगी धरती

    सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी
    रंग बिरंगी धरती,
    पहन चुनरिया रंगो वाली
    दुल्हन जैसी लगती ।

    नीला-नीला आसमान है
    बादल काले-काले,
    लाल, गुलाबी, नीले, पीले
    फूल बड़े मतवाले ।

    हरियाली की फ़ैली चादर
    सब के मन को हरती,
    सुंदर सुंदर प्यारी प्यारी
    रंग बिरंगी धरती ।

    काला कौवा, काली कोयल
    भालू भी हैं काला,
    कूकड़ू-कू करता है मुर्गा
    लाल कलंगी वाला ।

    सुबह-सुबह को भूरी चिड़िया
    चीं-चीं चीं-चीं करती,
    सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी
    रंग बिरंगी धरती ।

    सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी
    रंग बिरंगी धरती,
    पहन चुनरिया रंगो वाली
    दुल्हन जैसी लगती ।

    ©प्रमोद भंडारी ‘पार्थ’

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  • khwahishaan 68w

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  • khwahishaan 68w

    शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया
    क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया

    ता-उम्र ढूंढ़ता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
    अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र ले के आ गयाॉ

    नश्तर है मेरे हाथ में कांधों पे मय-कदा
    लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर ले के आ गया

    'फ़ाकिर' सनम-कदे में न आता मैं लौट कर
    इक ज़ख़्म भर गया था इधर ले के आ गया
    ©सुदर्शन फ़ाकिर

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