#lordkrishna

130 posts
  • stutipatel 2w

    He

    My tears always ask Him
    Why every time
    He puts me in a dark dim
    I always gradually lose mine ones
    And then I cry infront Him for months Everything gets out from my heart
    Why only He does this in my part
    Just because beyond His decision
    I believe it is His intention,

    To free my eyes by watery ripple
    And wants me to serve as His disciple Without any oracles His miracles
    Are awaiting for me. I can hear, I can see. Through my heart I can feel
    My dear is very near to me.
    ©stutipatel

  • arti_20 23w

    || श्री कृष्ण ||

    प्रेम की प्राप्ति तो श्री कृष्ण को भी ना हो पाई थी |
    श्री कृष्ण ने भी वियोग सहा था अपने प्रेम के बिछरने का |
    हम तो फिर भी एक आम मनुष्‍य है |
    ©arti_20

  • yashashwani 32w

    भज़ गोविंदम, भज़ गोविंदम मूढ़ मते।

    भगवान कृष्ण की शरण ग्रहण करो,

    वही उद्धार करेंगे ।

  • angel_sneha 34w

    साँवरिया……..
    अगर मिलो किसी मोड़ पे,
    मुझे देखकर आँखे ना चुरा लेना।
    बस तुझे देखा है कहीं,
    ऐसा कहकर गले लगा लेना।
    अगर अनसुनी हो कोई बात।
    तो आंचल खींच कर रुंकवालेना।
    हाथ थामे कसमें खा लेना।
    कदमों की धुंल को।
    माथें से लगाने देना।
    बस प्रेम की भाषा बोल।
    गले से लगा लेना।
    बांसुरी की मनमोहन धुंन।
    कानों में पिघला देना।

    राधे राधे _______ �� _______ �� _______

    #jaishreekrishna #krishna #love #radheyradhey #lordkrishna #devotional #art

    @they_call_me_umran
    @little_hopes2
    @priya_sandilya
    @pritty_sandilya
    @mamtapoet

    Made by :- sneha chourasia ....... ����

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    ©angel_sneha

  • yashashwani 34w

    I just wanted to destroy my desire on my own,
    But its slowly destroying itself.
    Lord Shiva its your miracle,
    let just free me form Death and birth
    circle of life.
    ©yashashwani

  • yashashwani 35w

    Lord shiva and lord krishna

  • yashashwani 35w

    Lord shiva and lord krishna

  • yashashwani 35w

    जीवन का रहस्य तुम्हे मिल सकेगा,
    अगर नमन के द्वार से तुम गए,
    अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की,
    तो तुम प्रेम के केंद्र तक पहुँच पाओगे ।
    परमात्मा को रिझाना करीब करीब एक स्त्री को रिझाने जैसा है, उसके पास अति प्रेम, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय होना चाहिए ।.......................

    ©ओशो

  • yashashwani 35w

    ॐ नमः शिवाय

    अच्युतम केशवम कृष्णा दामोदरम, राम नारायणम जानकी वल्लभम
    ©yashashwani

  • yashashwani 35w

    वसुधैव कुटुम्बकम् सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है[1] जो महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध है। इसका अर्थ है- धरती ही परिवार है (वसुधा एव कुटुम्बकम्)। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।

    अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ४, श्‍लोक ७१)
    अर्थ - यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

    Source of matter - wikipedia
    Picture credit- Pinterest

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    वसुधैव कुटुंबकम ।

  • yashashwani 35w

    गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
    यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ (२३)

    भावार्थ : प्रकृति के गुणों से मुक्त हुआ तथा ब्रह्म-ज्ञान में पूर्ण रूप से स्थित और अच्छी प्रकार से कर्म का आचरण करने वाले मनुष्य के सभी कर्म ज्ञान रूप ब्रह्म में पूर्ण रूप से विलीन हो जाते हैं। (२३)

    दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
    ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ (२५)

    भावार्थ : कुछ मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञों द्वारा देवताओं की भली-भाँति पूजा करते हैं और इस प्रकार कुछ मनुष्य परमात्मा रूपी अग्नि में ध्यान-रूपी यज्ञ द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। (२५)

    श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
    शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ (२६)

    भावार्थ : कुछ मनुष्य सभी ज्ञान-इन्द्रियों के विषयों को संयम-रूपी अग्नि में हवन करते हैं और कुछ मनुष्य इन्द्रियों के विषयों को इन्द्रिय-रूपी अग्नि में हवन करते हैं। (२६)



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    Krishna

  • yashashwani 35w

    एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
    कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ (१५)

    भावार्थ : पूर्व समय में भी सभी प्रकार के कर्म-बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरी इस दिव्य प्रकृति को समझकर कर्तव्य-कर्म करके मोक्ष की प्राप्ति की, इसलिए तू भी उन्ही का अनुसरण करके अपने कर्तव्य का पालन कर। (१५)


    किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
    तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ (१६)

    भावार्थ : कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बडे से बडे बुद्धिमान मनुष्य भी मोहग्रस्त रहते हैं, इसलिए उन कर्म को मैं तुझे भली-भाँति समझा कर कहूँगा, जिसे जानकर तू संसार के कर्म-बंधन से मुक्त हो सकेगा। (१६)


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    Krishna

  • yashashwani 35w

    चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
    तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥ (१३)

    भावार्थ : प्रकृति के तीन गुणों (सत, रज, तम) के आधार पर कर्म को चार विभागों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार मानव समाज की कभी न बदलने वाली व्यवस्था का कर्ता होने पर भी तू मुझे अकर्ता ही समझ। (१३)

    न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
    इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ (१४)

    भावार्थ : कर्म के फल में मेरी आसक्ति न होने के कारण कर्म मेरे लिये बन्धन उत्पन्न नहीं कर पाते हैं, इस प्रकार से जो मुझे जान लेता है, उस मनुष्य के कर्म भी उसके लिये कभी बन्धन उत्पन्न नही करते हैं। (१४)


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    Krishna

  • yashashwani 35w

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
    त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (९)

    भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। (९)

    वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
    बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ (१०)

    भावार्थ : आसक्ति, भय तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त होकर, अनन्य-भाव (शुद्द भक्ति-भाव) से मेरी शरणागत होकर बहुत से मनुष्य मेरे इस ज्ञान से पवित्र होकर तप द्वारा मुझे अपने-भाव से मेरे-भाव को प्राप्त कर चुके हैं। (१०)

    ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ (११)

    भावार्थ : हे पृथापुत्र! जो मनुष्य जिस भाव से मेरी शरण ग्रहण करता हैं, मैं भी उसी भाव के अनुरुप उनको फ़ल देता हूँ, प्रत्येक मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही पथ का अनुगमन करते हैं। (११)

    काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
    क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ (१२)

    भावार्थ : इस संसार में मनुष्य फल की इच्छा से (सकाम-कर्म) यज्ञ करते है और फ़ल की प्राप्ति के लिये वह देवताओं की पूजा करते हैं, उन मनुष्यों को उन कर्मों का फ़ल इसी संसार में निश्चित रूप से शीघ्र प्राप्त हो जाता है। (१२)




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    Krishna

  • yashashwani 35w

    अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ ।
    प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ (६)

    भावार्थ : यधपि मैं अजन्मा और अविनाशी समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर (स्वामी) होते हुए भी अपनी अपरा-प्रकृति (महा-माया) को अधीन करके अपनी परा-प्रकृति (योग-माया) से प्रकट होता हूँ। (६)


    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ (७)

    भावार्थ : हे भारत! जब भी और जहाँ भी धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने स्वरूप को प्रकट करता हूँ। (७)


    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ (८)

    भावार्थ : भक्तों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का सम्पूर्ण विनाश करने के लिए तथा धर्म की फ़िर से स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ। (८)

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
    त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (९)

    भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। (९)


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    Krishna

  • yashashwani 35w

    अर्जुन उवाच
    अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
    कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ (४)

    भावार्थ : अर्जुन ने कहा - सूर्य देव का जन्म तो सृष्टि के प्रारम्भ हुआ है और आपका जन्म तो अब हुआ है, तो फ़िर मैं कैसे समूझँ कि सृष्टि के आरम्भ में आपने ही इस योग का उपदेश दिया था? (४)

    श्रीभगवानुवाच
    बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
    तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ (५)

    भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, मुझे तो वह सभी जन्म याद है लेकिन तुझे कुछ भी याद नही है। (५)

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    Krishna

    Krishna

  • yashashwani 35w

    इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।
    विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१)

    भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया। (१)

    स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
    भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ॥ (३)

    भावार्थ : आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग (आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान) तुझसे कहा जा रहा है क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय मित्र भी है, अत: तू ही इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है। (३)



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    Krishna

  • yashashwani 38w

    Supreme Lord,Today
    I came to know why Gopis were mad at cute little musical krishna.
    ©yashashwani

  • amiravana 41w

    मैं कोई प्रेमी नहीं
    फिर भी
    इश्क़ सा हूँ
    गाता नहीं अच्छा
    फिर भी
    कृष्ण का हूँ
    ...
    #radheradhe
    @amiravanaLips of #krishna #radhe #radhekrishna #classic350 #blogger #signals
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    फिर भी

    मैं कोई प्रेमी नहीं
    फिर भी
    इश्क़ सा हूँ
    गाता नहीं अच्छा
    फिर भी
    कृष्ण का हूँ
    ...
    #radheradhe
    @amiravana
    ©amiravana

  • amiravana 41w

    वो दीवानी थी श्याम की
    इतना शुद्ध था उनका प्रेम
    की जुदा होने पर भी
    श्याम से
    श्याम का नाम जप्ती थीं
    प्रेम से बोलो ♥️ राधे - राधे ♥️
    @amiravana
    .
    ���� जय श्री कृष्णा ����
    .
    Pic Credit - @vishvammm
    ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
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    #krishnajanmashtami
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    राधे

    वो दीवानी थी श्याम की
    इतना शुद्ध था उनका प्रेम
    की जुदा होने पर भी
    श्याम से
    श्याम का नाम जप्ती थीं
    प्रेम से बोलो ♥️ राधे - राधे ♥️
    @amiravana
    .
    जय श्री कृष्णा
    ©amiravana