#mahadev

393 posts
  • tooli_singh 3d

    तुम सामने लाकर रख दो ज़न्नत भी अगर,
    हम फ़िर भी अस्सी घाट का सुकून ही चुनेंगे।
    ©tooli_singh

  • anita_d 1w

    शिव

    नशा करना है तो इश्क़ का कर
    मयखाने में क्या रक्खा है
    और इश्क़ करना है तो शिव से कर
    ज़माने में क्या रक्खा है
    हर हर महादेव
    ©anita_d

  • ammy21 2w

    Hey MAHADEV sadda dhyan raakhi
    Is duniya vich bade jhuthe farebi si
    Asi tode vich hi sukoon paaya si
    ©ammy21

  • ajayamitabh7 4w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv #Rudra अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि शिव जी के जल्दी प्रसन्न होने की प्रवृति का भान होने पर वो उनको प्रसन्न करने को अग्रसर हुआ । परंतु प्रयास करने के लिए मात्र रात्रि भर का हीं समय बचा हुआ था। अब प्रश्न ये था कि इतने अल्प समय में शिवजी को प्रसन्न किया जाए भी तो कैसे?

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     दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-30

    वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ ,
    शिलाधिस्त हो तृणालंबित लक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ। 
    एक पाद का  दृढ़ालंबन   ना  कल्पों  हो  सकता था ,
    नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी  होना  हो  सकता था। 

    ना सुयोग   था ऐसा  अर्जुन जैसा मैं   पुरुषार्थ रचाता,
    भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता। 
    अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे  लाता?
    मंत्रोच्चारित  यज्ञ रचाकर  मन चाहा   वर को  पाता? 

    इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु  की बाहों  में,
    अस्त्र  शस्त्र  प्रचंड  अति   होते  प्रकटित  निगाहों  में।
    निज बाहू गांडीव पार्थ  धर सज्जित  होकर आ जाता,  
    निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता।

    भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं,
    धर्म राज और  सहदेव  से  था कतिपय अनजान नहीं। 
    एक रात्रि  हीं पहर  बची थी  उसी  पहर का रोना था ,
    शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था।

    अगर  रात्रि  से  पहले मैने  महाकाल  ना  तुष्ट  किया,
    वचन  नहीं पूरा होने को  समझो बस  अवयुष्ट किया।
    महादेव  को उस  हीं पल  में मन का मर्म  बताना था,
    जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 6w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv #Rudra

    महाकाल क्रुद्ध होने पर कामदेव को भस्म करने में एक क्षण भी नहीं लगाते तो वहीं पर तुष्ट होने पर भस्मासुर को ऐसा वर प्रदान कर देते हैं जिस कारण उनको अपनी जान बचाने के लिए भागना भी पड़ा। ऐसे महादेव के समक्ष अश्वत्थामा सोच विचार में तल्लीन था।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-29

    कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया,
    भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया।
    अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ,
    आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ।

    भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता,
    वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता।
    एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा,
    नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा।

    सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी,
    भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी।
    उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया?
    पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया?

    कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है
    जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है।
    पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था,
    कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था।

    विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे,
    अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे।
    बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था,
    यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 8w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv #Rudra जब अश्वत्थामा ने अपने अंतर्मन की सलाह मान बाहुबल के स्थान पर स्वविवेक के उपयोग करने का निश्चय किया, उसको महादेव के सुलभ तुष्ट होने की प्रवृत्ति का भान तत्क्षण हीं हो गया। तो क्या अश्वत्थामा अहंकार भाव वशीभूत होकर हीं इस तथ्य के प्रति अबतक उदासीन रहा था?

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:28
    तीव्र  वेग  से  वह्नि  आती  क्या  तुम तनकर रहते  हो?
    तो  भूतेश  से  अश्वत्थामा  क्यों  ठनकर यूँ  रहते  हो?
    क्यों  युक्ति ऐसे  रचते जिससे अति दुष्कर  होता ध्येय,
    तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय?

    जो विपक्ष को आन खड़े  है तुम  भैरव  निज पक्ष करो।
    और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष  करो।
    निष्प्रयोजन लड़कर इनसे  लक्ष्य रुष्ट  क्यों करते  हो?
    विरुपाक्ष  भोले शंकर  भी  तुष्ट  नहीं क्यों  करते  हो?

    और  विदित  हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी,
    रूद्रपति  का  अंश  है तुझमे  तुम अनश्वर अविनाशी।
    ध्यान करो जो अशुतोष  हैं हर्षित  होते  अति  सत्वर,
    वो  तेरे चित्त को उत्कंठित  दान नहीं  क्यों  करते  वर?

    जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं,
    वक्त पड़े तो झुक जाने  में ना  खोता स्वाभिमान कहीं।
    अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ,
    महादेव  परितुष्ट  करो  और  मनचाहा  तुम वर  पाओ।

    तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना ,
    स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना।
    निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व  बाहु  अभिमान  रहा,
    पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ।
    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • sirfsadharan 8w

    Preet

    Laagi tere sang mann ki preet
    Udd gaye sare bhrm ke panchi
    Rahe ab labo pr tera nam .
    Har Har mahadev
    ©sirfsadharan

  • sana_1992 9w

    ❤️

    भोला बस इतना करम कर दे कि,
    थाम उसका हाथ तेरे दर केदारनाथ आ सकूं।
    ©sana_1992
    सना गुप्ता ️️

  • ajayamitabh7 11w

    शिवजी के समक्ष हताश अश्वत्थामा को उसके चित्त ने जब बल के स्थान पर स्वविवेक के प्रति जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित किया, तब अश्वत्थामा में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उसने शिव जी समक्ष बल के स्थान पर अपनी बुद्धि के इस्तेमाल का निश्चय किया । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सताईसवाँ भाग।

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv #Rudra

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग27


    एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार?
    मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ?
    जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है?
    एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है?

    जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं,
    गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं।
    इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं ,
    कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं।

    अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं,
    विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं।
    दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है,
    स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है।

    जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे ,
    उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे?
    जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की,
    उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी।

    पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है,
    साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है।
    व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है,
    द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है?

    लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है ,
    अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है।
    सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में ,
    किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • chahat_samrat 13w



    जब जब मेरा यकीन मुझसे ही जुदा होता है
    महसूस होता है मुझे ,मेरे साथ खुदा होता है
    ©chahat_samrat

  • chahat_samrat 13w



    दुवाएं जाती हैं वहां तक बशर्ते दिल से दुवाएं दिया करो
    किसी पर नहीं चाहत, तो उस पर भरोसा किया करो
    ©chahat_samrat

  • ajayamitabh7 13w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv

    विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की प्रतीति हुई कि शिव जी अपराजेय है, तब हताश तो वो भी हुए थे। परंतु इन भीषण परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर मन में झाँका तो निज चित्त द्वारा सुझाए गए मार्ग पर समाधान दृष्टि गोचित होने लगा । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का छब्बीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:26
    शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ?
    आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ,
    महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से,
    वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से?

    ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला,
    चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला।
    ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा,
    नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा।

    अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला,
    मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला।
    हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था ,
    नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था?

    मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का,
    पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का।
    जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे?
    महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे?

    विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था,
    हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था।
    निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी ,
    उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी।

    कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया ,
    निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया।
    युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई ,
    विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • lala_gook_shah 14w

    द्वेष में तू क्रोध में
    क्या अपनो से लड़ जाएगा
    काली के स्वरूप को
    क्या अपना वैर बताएगा
    जिसने विष्णु को चक्र दिया है
    ब्रह्मा का घमंड चूर किया है
    देवों के उन देव से
    क्या खुद की रक्षा कर पाएगा ।

    अंत तेरा अवश्य होगा
    जट्टा से जब वीरभद्र उत्पन होगा
    संसार करेगा शोक सती का इस कदर
    सर झुकाए हर प्राणी बोलेगा
    जय वीरभद्र हर हर वीरभद्र ।।
    ©lala_gook_shah

  • ajayamitabh7 14w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv
    हिमालय पर्वत के बारे में सुनकर या पढ़कर उसके बारे में जानकरी प्राप्त करना एक बात है और हिमालय पर्वत के हिम आच्छादित तुंग शिखर पर चढ़कर साक्षात अनुभूति करना और बात । शिवजी की असीमित शक्ति के बारे में अश्वत्थामा ने सुन तो रखा था परंतु उनकी ताकत का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब उसने जो भी अस्त्र शिव जी पर चलाये सारे के सारे उनमें ही विलुप्त हो गए। ये बात उसकी समझ मे आ हीं गई थी कि महादेव से पार पाना असम्भव था। अब मुद्दा ये था कि इस बात की प्रतीति होने के बाद क्या हो? आईये देखते हैं दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का पच्चीसवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:25
    किससे लड़ने चला द्रोण पुत्र थोड़ा तो था अंदेशा,
    तन पे भस्म विभूति जिनके मृत्युमूर्त रूप संदेशा।
    कृपिपुत्र को मालूम तो था मृत्युंजय गणपतिधारी,
    वामदेव विरुपाक्ष भूत पति विष्णु वल्लभ त्रिपुरारी।

    चिर वैरागी योगनिष्ठ हिमशैल कैलाश के निवासी,
    हाथों में रुद्राक्ष की माला महाकाल है अविनाशी।
    डमरूधारी के डम डम पर सृष्टि का व्यवहार फले,
    और कृपा हो इनकी जीवन नैया भव के पार चले।

    सृष्टि रचयिता सकल जीव प्राणी जंतु के सर्वेश्वर,
    प्रभु राम की बाधा हरकर कहलाये थे रामेश्वर।
    तन पे मृग का चर्म चढाते भूतों के हैं नाथ कहाते,
    चंद्र सुशोभित मस्तक पर जो पर्वत ध्यान लगाते।

    जिनकी सोच के हीं कारण गोचित ये संसार फला,
    त्रिनेत्र जग जाए जब भी तांडव का व्यापार फला।
    अमृत मंथन में कंठों को विष का पान कराए थे,
    तभी देवों के देव महादेव नीलकंठ कहलाए थे।

    वो पर्वत पर रहने वाले हैं सिद्धेश्वर सुखकर्ता,
    किंतु दुष्टों के मान हरण करते रहते जीवन हर्ता।
    त्रिभुवनपति त्रिनेत्री त्रिशूल सुशोभित जिनके हाथ,
    काल मुठ्ठी में धरते जो प्रातिपक्ष खड़े थे गौरीनाथ।

    हो समक्ष सागर तब लड़कर रहना ना उपाय भला,
    लहरों के संग जो बहता है होता ना निरुपाय भला।
    महाकाल से यूँ भिड़ने का ना कोई भी अर्थ रहा,
    प्राप्त हुआ था ये अनुभव शिवसे लड़ना व्यर्थ रहा।

  • _pikachuu 16w

    महादेव❤️✨

    करण दो बुराई लोगां ने।
    हम किसे हैं यो तो
    भोले बाबा ने ही बेरा हैं।

  • _pikachuu 17w

    महादेव❤️✨

    ढूंढोगे तो कमियां मिल ही जायेगी
    महादेव के बन्दे है
    महादेव थोड़ी है।

  • ajayamitabh7 19w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
    कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का बीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20
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    क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
    प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
    नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
    मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?
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    सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
    दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
    कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
    कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।
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    सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
    समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
    अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
    निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।
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    और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
    कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
    संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
    छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।
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    उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
    होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
    मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
    शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।
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    मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
    किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
    किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
    अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 20w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav

    कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19
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    विकट विघ्न जब भी आता या तो संबल आ जाता है ,
    या जो सुप्त रहा मानव में ओज प्रबल हो आता है।   
    भयाक्रांत संतप्त धूमिल होने लगते मानव के स्वर ,
    या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते डग कुछ ऐसे होते नर ।   
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    विकट विघ्न अनुताप जला हो क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
    अति दरिद्रता का जो मारा कितने हीं आवेग सहा हो ।   
    जिसकी माता श्वेत रंग के आंटे में भर देती पानी,
    दूध समझकर जो पी जाता कैसी करता था नादानी ।   
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    गुरु द्रोण का पुत्र वही जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
    दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं जीवन यापन लगता जैसे।
    पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के देख देखकर जीवन गाथा,
    अश्वत्थामा जान गया था कैसी कमती जीवन व्यथा।
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    यही जानकर सुदर्शन हर लेगा ये अपलक्षण रखता ,
    सक्षम न था तन उसका पर मन में तो आकर्षण रखता ।
    गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या विघ्न बाधा से डर जाता ,
    दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा क्या भय से फिर भर जाता ?
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    थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर हौले दुर्योधन से बोले ,
    अश्वत्थामा के नयनों में दहक रहे अग्नि के शोले ।
    घोर विघ्न को किंचित हीं पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
    अश्वत्थामा द्रोण  पुत्र ले चला शरासन तत्तपर ताने।   
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 21w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
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    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा ने देखा कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे हैं तब उनके मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने की आशंका होने लगी। कविता के वर्तमान भाग अर्थात अठारहवें भाग में देखिए इन विषम परिस्थितियों में भी अश्वत्थामा ने हार नहीं मानी और निरूत्साहित पड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का अठारहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:18
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    अगर धर्म के अर्थ करें तो बात समझ ये आती है,
    फिर मन के अंतरतम में कोई दुविधा रह ना पाती है।
    भान हमें ना लक्ष्य हमारे कोई पुण्य विधायक ध्येय,
    पर अधर्म की राह नहीं हम भी ना मन में है संदेह।
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    बात सत्य है अटल तथ्य ये बाधा अतिशय भीषण है ,
    दर्प होता योद्धा को जिस बल का पर एक परीक्षण है ।
    यही समय है हे कृतवर्मा निज भुज बल के चित्रण का,
    कैसी शिक्षा मिली हुई क्या असर हुआ है शिक्षण का।
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    लक्ष्य समक्ष हो विकट विध्न तो झुक जाते हैं नर अक्सर,
    है स्वयं सिद्ध करने को योद्धा चूको ना स्वर्णिम अवसर।
    आजीवन जो भुज बल का जिह्वा से मात्र पदर्शन करते,
    उचित सर्वथा भू अम्बर भी कुछ तो इनका दर्शन करते।
    ============================
    भय करने का समय नहीं ना विकट विघ्न गुणगान का,
    आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का।
    वचन दिया था जो हमने क्या महा देव से डर जाए?
    रुद्रपति अवरोध बने हो तो क्या डर कर मर जाए?
    ============================
    महाकाल के अति सुलभ दर्शन नर को ना ऐसे होते ,
    जन्मों की हो अटल तपस्या तब जाकर अवसर मिलते।
    डर कर मरने से श्रेयकर है टिक पाए हम इक क्षण को,
    दाग नहीं लग पायेगा ना प्रति बद्ध थे निज प्रण को।
    ============================
    जो भी वचन दिया मित्र को आमरण प्रयास किया,
    लोग नहीं कह पाएंगे खुद पे नाहक विश्वास किया।
    और शिव के हाथों मरकर भी क्या हम मर पाएंगे?
    महाकाल के हाथों मर अमरत्व पूण्य वर पाएंगे।
    ============================
    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • patne_98 21w

    वक्त, वाकई मे मुश्किल है,
    दुनिया का मालिक “", आज खुद चार दिवारों मे कैद है |



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