#secondchild

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  • secondchild 22w

    Khat

    Zehanseeb ,
    Kin inayaton ki aayat me reh guzar hai tera,ya tu sirf meri hi ibaadat hai. Main harfi chaand tak hi pahuncha hun tujhko manzil samjh kr ,
    tu hai bhi ki nahi ya sirf meri wafat main hi teri mulaqaat Tasneef hai!
    Us hisaab se ye haq bhi nahi mujhe ki is chandini ko rehnuma samjhun sirf ek raat k liye bhi .
    Jo Noor tujhme hai wo usme hai bhi ki nahi ..tu hi hai wo ya sirf mere liye hi nahi ...

    Paiagaam kya dun tujhko apni sarfaroshi ka aaj fir mehfil me faramish teri hi hai.
    ek gazal hai purani jo tere hi zikr se bismillah hai par sochta hun ab har nazm me tujhko qaid kar dun.
    Jaane kaun se jazbaat ,shabd banke un sabhi sarhadon se sauda kar lein jo is darmiyaan hai abhi tak.. aur tum bhi ho... .bas mere pass nahi ..ya tum ho hi nahi aur ye mere jazbaat bhi nahi .

    Sab sahi hi dikhta hai jab kuch sahi nahi hota,ab main rota bhi nahi hun kismat pe ,
    ye soch bhi lun ki zindagi k kuch hi to panne the jo waqt ke juyein me haar gya ...
    Par ye kaise bhula dun ki kis kashish se maine har mulaqaat ko likha tha ...zaroor muh tak na aayi ho ..par maine har baat ko likha tha ...
    shayad padh leta kabhi unhi panno ko..
    par padhne ki ab chah hi nahi.. fir dhal jaun ishq me aise halat bhi nahi .
    waqt me dabe wo Alfaaz bhi nahi ...aur shayad is kalam me ab wo baat bhi nahi...
    ©secondchild

  • secondchild 61w

    A Mistaken Identity

    A mistaken identity survived a million eye and fainted for its own good.A famous poetry with impression of delusion still rhetorical in reference. Drowned in many outer perceptions and engulfed with lust and passion to perceive the rhapsody of nature till the last scene of the final play of life .
    The mistaken identity that has layers of drape to protect the very exquisite personality.The crave of acceptance and the fear of responsibilities that stands behind the door.
    This identity is subjected to the entropy that inhale fumes of melody and exudes the lyrics through unintentional body postures that ripples with the tune so to free the bird of emotions from the aviary of insecurities and terrors.

    Its an art to exist with a mistaken identity which is a momentary escape to the garden of imagination where mind is at peace with the surroundings.
    ©secondchild

  • secondchild 62w

    मन का कौतुहल

    कुछ लिखूँ या दिन गिनते रह जाऊँ,
    आज फिर साँस पूछे मुझसे कि-
    "तुझको आऊँ तो क्यों आऊँ?"

    छटपटाहट में सुलगती रेत पर चल रहा हूँ,
    मैं शहर में हूँ,फिर भी हर वक़्त पिघल रहा हूँ।

    कौतुहल भीतर भी है और बाहर भी,
    अगर जीवन ही जीत है तो हर दिन कई हार भी।
    उन हार से ज़िन्दगी न हारे ये भी अलग लड़ाई है,
    तुमको क्या लगा ! सबने सिर्फ कोरोना से जान गवाई है ।

    मंज़ूर तो किसी को नहीं पर तय है-कि ये ज़ख्म सबको सहना है,
    आज खुशियों का मतलब सिर्फ ज़िंदा रहना है।

    तालों में बंद महफ़ूज़ हैं, पर कब तक?


    आज पिंजरों का रुतबा बढ़ गया।
    बंदिशों का भक्षक भी अब उन्ही बंदिशों का अर्थ समझ गया ।
    पर ज़िद्द पर क़ाबू और भी बेताब कर देता है,
    भला चार दीवारों में अपने यौवन को कौन सज़ा देता है।

    कभी कभी होंसला कहता है कि-
    "घुटन को पी कर,कर यक़ीन,
    कि ये आशियाँ तेरा खूबसूरत है,
    जो कभी चुभती थी आंखों में आज
    तुझे उसी रोशनी की ज़रूरत है ।"


    पर ज़िंदगी की तरह ये होंसला भी क्षण भंगुर है।

    कब शोर सिसकियों में दब गया खुद ही यह समझ कर कि कल फिर आंसुओं की ज़रूरत पड़ेगी,
    और कल आंसुओं को रोक दिया किसी ने ये बोलकर कि- " संभाल खुद को,वरना अगली चिता तुम्हारी जलेगी।"

    सब मकड़जाल में फसे हैं, अपनी बारी के इंतज़ार में ,अपनो से पहले बस इसी दरकार में,
    क्यूंकि हमने कभी खुद के लिए जीना सीखा ही नहीं।
    अपनों के बिना दुनिया कैसी होगी,ये सोचा ही नहीं।
    और यही सच है।

    "कुछ कम ही सही ये ज़िन्दगी अब तक लड़ी तो,
    कभी अपने लिए,कभी अपनो के लिए।"

    पर क्या यही अंत है?
    ©secondchild

  • secondchild 91w

    मुर्दे की आत्मकथा

    #secondchild

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    मैं शांत अंधेरों का मुसाफिर हूँ
    लाश हूँ ,अंधेरों में ही औचित्य है मेरा।
    किसी पत्थर की आहट से बाहर आऊँ कब्र से तो सिर्फ सन्नाटे दिखते है,क्या सब लाश है ज़माने में?
    और वो पत्थर किसका है?

    मैं कभी कभी यूँ ही सैर पर निकलता हूँ, जीवों से छुप कर पर होता कोई भी नहीं।
    देखता हूँ हर उस अनहोनी को जिसे शायद कोई और न देख पाता हो। आखिर मैं कर भी क्या सकता हूँ,मुर्दा हूँ , मेरे लिए क्या होनी क्या अनहोनी।
    ढूंढता ज़रूर हूँ उस पत्थरबाज़ को जो मुर्दे जगा रहा ,पर सवेरा मुझे रास नहीं,लालिमा के छिटकने से पहले ही कब्र खींच लेती है मुझको।

    मैंने कभी कोई लाश नहीं देखी ,हाँ और कब्र ज़रूर है चारों तरफ।शायद कोई पहचान ही नहीं हमारी ,सिर्फ रहने को ज़मीन है।
    या फिर ज़मीन ही पहचान है हमारी ।

    हाँ कभी अपनी कब्र पर फूल देख के लगता है की मैं अकेला तो नहीं हूँ। पर उन फूलों का मुरझाना और फिर एक दिन बदल जाना,कभी यूँ ही पड़े रहना कई मौसम ।
    काश थोड़ा एहसास बाकी होता तो मैं समझ पाता इन क्रियाओं को,पर चलो फूल आतें है यही काफी है।


    एक बार खुद पर नज़र पड़ी तो पता चला कि धीरे धीरे ये मांस की पर्त मेरे शरीर के कई अंगों से हटती जा रही और हड्डी का आकार स्पष्ट होता जा रहा।
    अजीब बात है,मैं रोज़ खुद को खो रहा बिना कुछ महसूस किये।क्या ये पहले भी हुआ था ?

    आज ये ख्याल भी आया कि अगर जल जाता तो कहाँ होता।
    होता जहां भी राख होता,
    धूल बनके हवा हो जाता या पानी में घुल जाता कहीं ।
    अब भी क्या अलग है,आखिर में होना धूल ही है।


    जब दृष्टि की जाने की बारी आई तो सोचा कि आज पत्थर का जवाब दे ही दूँ, उस रोशनी को भी चुनौती दूँ जिससे कई ज़माने से रूबरू न हुआ।
    पहले लालिमा आयी फिर धूप पूरे ज़ोर पर थी,
    आज किसी तरह मैने रोशनी पर फतेह पा ही ली।
    पर इतना काफी नही था,अचानक मेरी दृष्टि चली गयी,
    मेरी कब्र फिर मुझे खींचने लगी। कौन खड़ा होता मेरे लिए, मैने पत्थर भी मारे औरों की कब्र पे पर कोई भी न आया ।आखिर सब थे तो मुर्दा ही।अंत में हमेशा के लिए मैं उसी अंधेरें में दफ़्न हो गया।

    पर पत्थर आज भी आतें है।


    ©secondchild

  • secondchild 95w

    ज़िद्दी

    इन लम्हों से जुदा और भी कहाँ सिर्फ तेरी बाहों में ,
    एक गुज़र गयी वो याद बरसात बनके और भी कहाँ , सिर्फ तेरी बाहों में ,
    बेखबर सांसों को आज भी गुमान है तेरी खुशबू का,
    बेपर्दा इश्क़ को आज भी इंतज़ार है तेरी जस्तजू का,
    मैं संभल कर भी तड़प रहा हूँ इन राहों में,ऐसे ही
    एक दिन और बीत गया बिना तेरी बाहों के।

    रुख हवा का आज भी है मेरी ओर,
    सिर्फ मोहब्बत में डूबी कशिश है उनमें ।
    मैं सजदे करता हूँ उन मद्धम झोकों का
    जो इश्क़ से है,पर इश्क़ नहीं ।

    लाल रंग सा गाढ़ा इश्क़ मेरा रक्त है जो ,
    वो तेरा सिंदूर भी हो सकता था।
    ये फितूर मेरी सजनी का कुछ कम भी हो सकता था।

    पर ऐसा ही था मेरा प्यार , जो नसों में बहता था मेरे,
    मैं रहूँ कल में फिर इश्क़ के लिए इस बात का ख्याल था इश्क़ को मेरे ।

    पल में लिपट कर आंधी सा बेकाबू था,
    पर उस पल में लगाम लगा दे इतना कहाँ उसमें जादू था।

    करवटों सा रातों में सिसक रहा था इश्क़,
    हौले ही सही एहसास को अग्नि दे रहा था इश्क़।

    की आज तू समझ ले तेरी औकात पे सवाल है,
    बेमिसाल ना समझ बेइंतहा जज़्बात को
    जिसको नसीब सिर्फ मिट्टी है,
    ये मंज़िल है तेरी काफ़िर ,
    ये वक़्त तुझसे ज़्यादा ज़िद्दी है।
    ©secondchild

  • secondchild 98w

    Purity

    Purity and love are Biological twins
    The intimacy with innocence,the war of lust and affection,the shadow in the corner when the Broken soul weeps and the paranormal nights of delusion where the mirage of our love dominates our sleep .
    We care in our very conscious state and do what love needs and show what it means.
    But is consciousness necessary to portray the best art of affection and love ?
    The algorithm to be the best artist of the non fiction play of relationship guides us in every step to decorate the work of Cupid and give it the best turn that it deserves .
    But is the script too weak to understand the purity of the art which was present in the classical form of its origin.
    Love is a methodical act of representing affection in every possible way where unconsciously we display our best performance on the stage of life.
    There is no need to remember the algorithm or your dialogues but the impromptu portrayal of feelings shows the true essence of what you possess in a very pure state.
    There is a lot to understand on the way ,but the feel of affection should remain pure as long as you stay.
    ©secondchild

  • secondchild 98w

    स्वभाव

    एक स्वभाव से जग- जग विजय,एक स्वभाव से दर- दर पतन।

    कहीं बंदिशें हैं बेड़ियों सी ,कहीं सभ्यता की नींव है ,
    जहां जीवन है दृष्टि में वहीं ज़िंदा भी निर्जीव है
    बेसब्री में ठिठुरता ये मानव भी अजीब है
    एक सत्य में विलीन है ,एक सत्य से गंभीर है।

    एक बाज़ वो जो अशिष्ट है और एक वो जो मापे क्षण में गगन,
    एक साँप कपटी मित्र भी,एक साँप जो घर -घर नमन
    एक भेद है आकार का , एक निश्चयात्मकता विचार की,
    एक कलंक है समाज का,एक परंपरा इतिहास की।

    एक बात वो जो अनकही ,एक बात वो जो क्यों कहें ,
    एक पुस्तक जो अनिवार्य है,और एक वो भी जो हम क्यों पढ़ें!
    एक भय है अंजाम का,एक घमंड का प्रवाह है,
    एक आस्था है धर्म की , एक अज्ञानता की राह है।

    कहीं गर्व सम्पन्न एहसास में ,कहीं गर्व में अपना वतन।
    एक स्वभाव से जग- जग विजय,एक स्वभाव से दर- दर पतन।
    ©secondchild

  • secondchild 102w

    आज

    आज अदृशय सी तबाही हर रोज़ है,
    पर 'हम सही हैं' , इसी में सबकी मौज है,
    सिर्फ सरहदों पर नहीं , आज हर पक्ष की अपनी फ़ौज है।
    खुद की कला पर शंका और अपने आगे एक नेता की खोज है,
    उदारवादी कमज़ोर ही है दोनों पक्षों में,
    और उग्रवादी बुलंद अफ़रोज़ हैं ।

    आज जो भी सोचूं मैं,
    कल की सोच कुछ और ही कहती है।
    किससे पूछूँ कि क्या है सही,
    सच की सियाही भी अब बाजार में बिकती है,
    एक रंग आजमां लूँ, पर एक से सच्चाई कहाँ दिखती है,
    हाँ पर उस सियाही से आज भी मन शांत होता है, जिससे मेरी माँ लिखती है।
    ©secondchild

  • secondchild 105w

    Darr

    Pal pal guzar rha hai..
    Darr ki baatein kar kar ke

    Ki
    Jahan jo Manzar nagawar tha aankhon ko,
    wahan saanson ki sarfaroshi bhi khatak rhi hai
    Aur jo apna hi hai zamaane se,
    uske dar par bhi ab manzil bhatak rhi hai..

    Aaj us ghutan me ghar bas gya jahan
    abru ko jagah aur
    maut ko zroori marz nahi..
    Aur us dhadkan ko bhi karZdaar bna diya jissey dhadkane me kabhi koi harz nahi..
    ©secondchild

  • secondchild 108w

    First Rap

    (chorus)

    Huye phaansle ...
    Khoye jo ye raaste
    Kahan dhundhun wo silsile
    Ki jab hm tmse mile!

    Bekhabar the
    Teri un fitraton se
    Aur
    Ye kya hua mujhe..
    Khudi ko khone lage!!

    (Rap )

    In phaanslo ne raakh kr di yaad teri
    Tha mera pyaar saccha aur jhuthi har baat teri
    Aaj khaankh karun teri unhi baaton ko
    Aaja sunaun toote Dil ke alfaazon ko

    ‌Ghamand kre kataar me khade hai sab jo sad gaye,
    patan karun samaj ka jo apne hi nigal gye,
    Ye bulbule se gulgule jo ek baap ke nahi wo beimaan kaale naag bemisaal ban gaye
    Misaal tu bhi ban gyi jab raaste badal gaye
    Tujhe paccha nahi ki,hui maat par sambhal gye
    ‌Pehchaan thi to uth gya
    naye raaston se jud gya,
    wo raah hi galat thi jisme tjhko paake mud gya!

    kalam me jo awaaz hai wo sun ke fir na lautana,
    na modna wo waqt na jazbaat fir se kholna
    Par bolana wo sab jo maine na kra ho pyaar me ,
    ji han main bhi sunun ki kya kami rhi izhaar me
    ‌Kirdaar me , aaj bhi sunun khuda aae khaas ki ,jo aaj fir rula dun kisi baat pe na chaukna .


    ‌Bhadak gya ..main to inteqaam me
    Behak gya ...aur madhosh hua jaam me

    Rasam,kasam me dhoondhta ajab sitam wo ab nahi ,
    sahi galat bhi kuch kahan
    khushi hasi jhulas gyi,
    Rhi wahi hairaniyan kahaniyan jo thi suni ..
    tha parvaton Sa aashiyan .. dhuan dhuan ab har kahin
    ‌Tu sun abhi khatam karun main rishte jo the beech ke
    Tu rakh sabhi jo kuch banaya khoon mera seench ke
    ‌Libaaz ab na odh chah to mit gyi Zameer se
    Tha tehra tere ishq me aur tu bik gyi raqeeb se

    Ae khuda dikha jahaan in nafraton se aage ka
    Ye ghaanth khol dun abhi na choodun hissa dhaage ka
    Adrishya sa jo har ghadi do aatma ko baandhe tha
    Na daal ab Naseeb me ye ishq aur abhaage ka!

    Abhaage ka
    ©secondchild

  • secondchild 112w

    Bigade halaton me khaalipan ke beech ,kuch shikayaten yaad aa gyi...

    Us shaam ko main phir kamrein se bahar nhi aaya ,socha ki sab samjh lenge ki ab main nahi hun,chhota tha samjh bhi choti thi. Laga ki sirf main hi hoon jahan me... aur fir bhi sab. Mere viprit .
    Khud ke nishaan mita rha tha.ki kuch waqt alakh me reh lun to na main rahunga na meri yaadein ,par fir ek awaaz ne is safar ko wahin rok diya. Shikayat hai mujhe apne bhai se ,ki tumne kabhi mere bachpan k akelepan ke iraadon ko manzil na milne di.


    Ek din main yuhin bina bataye chup gya bistar ke neeche,ghar bhi apna na tha ,log bhi door ke the,wahin soch rha tha ki itne log hai duniya me agr main na hun to kya farak padega ,sab khush to lag rhe the,Meri kya zroorat is duniya ko!
    kab aankh lag gayi inhi khyalon me pta hi na chala.
    Agle hi pal harbaraht me aankh khuli to maa mujhe seene se lagayi thi ! Shikayat unse bhi hai meri ,ki aapne un khyalon se mera naata tod diya!

    Fir yaad aayi ek alag hi ghatna ki, jab mere khwaabon ne dum tod diya,haar gya tha main ,
    sab bahot aage nazar aa rhe the .aur main shoonya sa laga kabhi dauda hi nhi ,kami tab dikhti jab khud ki pehchaan hoti ,ab pehchaan bhi samundar me namak ki bhaati ho gyi thi.
    Bojh ban gya itna khud ki hi akankshaon ka ki khud ke astitva pe sharm aa rhi thi!
    Fir kaise aaj itne saal ho gye us din ko gye.
    Shikayat hai mujhe apne papa se,ki mere har bhojh ko apne kandhe diye ,bhojh na samjh k ,aur aaj tak khud ki nazron me mujhe girne na diya!


    Inhi shikayaton me ek raat aur guzar gyi.
    Ye to bachpan tha par ab main yuva hun!
    Par kuch cheezein kabhi nahi badalti
    Sab aaj bhi waisa hi hai jaisa pehle tha
    Main kal bhi ghar ka chota tha ,aaj bhi. Chota hi hun .aur aaj bhi meri shikayaten khatam nahi hoti! Mauka laga to fir btaunga!

    Dhanyawaad

    #secondchild

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    Shikaytein

    Ki jab farak alag kar dete hai jeene ke tareeke
    Aur parayon me apno ko dhundha jaata hai
    Tab thodi shikayatein kar leni chahiye apno ki ,
    Kya hai ki
    Ussey thoda dil halka ho jaata hai
    Aur apne aur Kareeb!!
    ©secondchild

  • secondchild 114w

    Mirror

    I look into the mirror with the belief to get a reflection of what I am today
    I look at others with a belief to find significance of me in them.
    But am I the same ,where is my originality ? Or I could buy whatever and live wherever my existence find its solace!!
    Is it what that concern us when we experience the unexpected that our past could never allow us ! Or is that something we did mock about in conversation of what we would be!
    Do we know the practical definition of wrong or its just the prescribed version that decides the conclusion .
    The moral of the beginning becomes the superstition of our obnoxious mind that refracts everything on the surface,
    And still we end up being fire and water at two different stops of our life!
    We dont want to accept the multi-personality. We aren't rigid though. But what we see in the mirror is still,which is not an illusion of an eye, but the one created by our attitude.
    Its not a disorder,its who you are ,and it is nothing to be ashamed about!
    ©secondchild

  • secondchild 116w

    मन में

    एक ख्याल मेरे मन मे भी है
    की ये रीत है अलबेली
    है अजब सी पहेली
    सुबह की मौज अलग
    अलग है हर शाम की ग़ज़ल
    अडिग है आज भी मदमस्त ये हवा और
    इस वक़्त के आज भी वही नखरे है।
    संतुष्ट नही आज भी ये मन
    है सवाल पर सारे बिखरे है
    की आज जो खुद को जान लिया
    तो कल में आज को ढूंढूंगा
    और जो आज से अनजान रहा
    कल की पहचान को
    तो आज को आज ही खोदूँगा।




    पर रुकना नहीं ना झुकना है
    जब तक सांस है
    और लहुँ बाकी है तन में

    बस आज यही ख्याल आया मेरे मन में।
    ©secondchild

  • secondchild 117w

    FIR...

    FIR akele ho gye char diwaron me
    Majboori bhi nahi... Manzoori bhi nahi
    Aur
    Aaj FIR kisi ne dastak na di.
    Majboori hi sahi... Manzoori to rahi!


    Koi tha bhi pass mere ..
    Mughalte me the.. Ya the khud hi faraebi..kya mijaaz the mere
    Sab shoonya sa ho gya dheere dheere.. Aur ehsaas ek pal ka hua..

    Han..
    Marz tha ek..jo ghul gya tha yaadon me aur zehr ban zindagi ka dum ghot rha tha..
    Par bekarari se bekhyali tk yuhi kaante ghumte rhe,Ki kuch mehsoos hi na hua..


    Par aaj fir kal ka intezaar nahi bas shaam dhalne ko baithe hai...
    Ki aaj FIR zindagi ka khwaab dekhenge... Kal fanaah hone ke liye!
    ©secondchild

  • secondchild 118w

    Do it

    How do we want to plan our death?
    Laying on a hospital bed, feeding on some antiseptics to neutralise what's killing us, but its too late!
    Do you really want to die like that!
    When did you felt alive last time?
    Is it when you ate your favourite food that your Mom cooked, or when you cuddled with the one you saw your future with?
    Or the song that kept you on the track with the noise of the world.
    For me it was the Breeze I felt when my foot grooved to the tunes . I wish the end should be the same, where I could feel my nerves and myself dancing with the death and the mortality, where either could survive but there would be no regret.
    So there is a tomorrow, but today could be the last chance, so hold your breath and ask your self what you really want, its the time when you could chose your end. Just make it happen. Do it
    ©secondchild

  • secondchild 119w

    Accept it

    You know you are not perfect,
    Entitled to Live with your drawbacks, that is not your fault, may be you are different like every other creature . You are one species of human yet to be discovered.
    Those bruises that is Lost in your daily routine of finding the reason of your existence, will never heal till you get all the answers.
    Life is unpredictable, not like those movies that shows love as a supernatural phenomenon where everything ends up on a positive note. That's not your life. You should accept what's not yours, or could never be.
    Few moments of attachments integrates your fear of revealing your loose end and you know this will initiate the end of this beautiful dream.
    But you need to Wake up! Yes you are not worthy, accept it! Do something you are worthy of, meet someone who accept you with your worth and doesn't expect more or helps you to become more worthy.
    You are not a soldier,no one would fill the gap, they are not sent to do so, you need to fill it, or accept what is written with it. But even if you don't, there is still life that may seems lonely, but its your destiny
    Just remember,its not always possible that you achieve what you Sweat for! But if you learn to accept and move on! Life would be easy!
    ©secondchild

  • secondchild 119w

    Till the end

    Its never too late,
    Or it is for the drowning soul.
    We know what is eating our mind and why we are freak! And then we meet angels from this world who Show us our purpose!
    And then we become lifeguards for the one's drowning. This cycle never ends, but we do.
    We walk into the Wind with the spirit to wander each and every destination that put us back together. The seasons we are afraid of , bother no more. The drop of Tear that turns into crystal as it floats through the cheek symbolises the acceptance of the pain that is no more painful.
    Memories are often painful but for sometime.
    If memories needs to be burried, why inside ? Throw them into the Infinity. But we always end up in the Infinity surrounded by all of them, that is when we go blank.
    Everything is heavy but something or someone's touch could help you to carry it all along the little path left.And in every step lies the reason why this world is Growing better and brighter than before.
    In the midst of unravelling truth, we often find Peace with the mess that makes our life happening, where our fear becomes the next goal to conquer. So We Live the truth, we always craved for, not the one told to us.
    Little minds with irregularities and diversity of becoming anything and yet we chose to be normal which is not at all normal to us!
    May we rest where our Peace is so when we woke up again there is no regret of yesterday.
    And yes its true - its never too late, not even for the drowning soul, cause your life Guard would save you.
    But make it sure that the effort should not go waste.
    So Live till the end!
    ©secondchild

  • secondchild 123w

    Inayat

    inayat ko waqt to do... Kuch kadiyan jodne ka..
    Ki libaaz jo Tm odh k itraa gye... Wo mere sanskaar nahi... Ya hum jis baat pe muskra gye wo tumhare alfaaz nahi...
    Par jo jhuk gyi ibaadat me wo nazrein to wahi thi..jo ruk gyi anjaane me.. Na jaane kaun si rut nayi thi...
    Ki jo ashq mere.. Naam ban ke tera chalak gye....ishq ki kashti ke musafir kis dariya bhatak gye... Ki aaj dub jaayein ya FIR sajda krein suraj ka... Yaa arrzu ke dum pe jee lein... Ya marjaayein rafta rafta!
    ©secondchild

  • secondchild 127w

    Zaruri baatein?

    Ye jang hai baqa ki
    Teri mehnat hi tera hathiyaar hai
    Karthoos ye iraade tere
    Jeena hi tera SAmman hai!


    Fakeer tha tu rooh ka, mat soch kya gawaya hai
    Is zindagi ki daud me
    Tune har saans ko kamaaya hai


    Rehmat samajh khuda ki
    Jo khada hai tu maidan me
    Haraam me jo bik gya
    To befizool teri har saans hai!


    Sahi waqt ki talaash me
    Na waqt ko tu kho kabhi
    Tu aaj ka hi waqt hai
    Kal me rahe na kya pata!


    Tu Shafeer ban kalam ka
    Phir panno me jaan bhar de
    Tu kaam kar gazab ka
    Duniya me naam kar de!
    ©secondchild

  • secondchild 129w

    Weird thoughts

    The least Curious We are, more dominant would be our insecurities.
    This chamber of Incubation that will turn us into something alive with Special abilities will also give birth to the destiny that our present cannot recognize.
    The end that is irelevent now is the reason for what tommorow is bringing upon us.
    The best right now is uncertain but enough to stop the thirst of becoming better.
    The success of today could become the regret of an entire life.
    How this prophecy of us being the Special one is making our life a battleground, where our own power becomes our worst enemy.
    Just in case this perfect life is not as perfect as what imperfection can bring,
    We are just misguided by our abilities that make us different and powerful.
    ©secondchild