#succhiii

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  • drunken_heart 55w

    ग़ज़ल

    अभी‌ ख़ामोशी के ज़ल-ज़ले उठेंगे देखते रहना तुम
    बे-नूर है वो आस्माँ को झलकाएँगे देखते रहना तुम

    मुझे फ़िक्र नहीं निग़ह'बानों की जो बे-दस्त होगें याँ
    क़ाफ़िला ऐ जन्नत'सा वहीं लुटाएँगे देखते रहना तुम

    मंज़र-ए-आम फ़ज़ूल कह आएँगे शान-ओ-शौक़त
    इस्मत से जन'आज़ा मिरा उठाएँगे देखते रहना तुम

    मस'अला! मुसलसल मुस्तक़िल बनाएँगे बा'द मिरा
    नासूर-ए-दिल दीदा-ए-तर से हँसेंगे देखते रहना तुम

    बे-परवाही छुपाने अपनी आय्यारी रखेंगे सोहबत में
    नक़्क़ाब में छुपाए नक़्क़ाब बदलेंगे देखते रहना तुम

    अंजान क़ाँ उन्क़ी अदाकारी से ता-उम्र सफ़र में रहे
    दरिया-ए-ग़म देखते वाँ से गुज़रेंगे देखते रहना तुम

    आरज़ू-ओ-ख़्वाहिश ही क्या अंजानों की बस्ती में
    ख़्वाब-असर कोशिशें कर के टूटेंगे देखते रहना तुम

    तग़ाफ़ूल शुरुआती दौर-ए-वक़्त से ही था निग़ह में
    कैफ़-ए-निग़ह में 'विशू' सब मरेंगे देखते रहना तुम

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 55w

    ग़ज़ल

    जिस रोज़ ब-तसव्वुर दिल-ए-नादाँ सा हुआ
    उसी रोज़ ब-दस्त दस्तक भी जानाँ सा हुआ

    कम्बख़्त मऱज क्या है इश्क़-ओ-उल्फ़त का
    हलचल से इस दिल, गुल-गुलिस्ताँ सा हुआ

    प-ए-जन्नत की ख़ुली निग़ाह से काविश रही
    तो गोया दिल-ए-तन्हा भी आशियाँ सा हुआ

    अँधेरों से वा-बस्ता, रोज़ कर आते अब तो
    कुश्तगान-ए-पस-ओ-पेश, चराग़ाँ सा हुआ

    मौजूद-ओ-मयस्सर ख़्वाब-ओ-ख़्याल उन्के
    वस्ल ना हुआ तो दिल भी, रेग़िस्ताँ सा हुआ

    आलम-ए-बहर में ख़िल-ख़िलाता शज़र सा
    तो बिन उन्के दिल, क़ैद-ए-बाग़बाँ सा हुआ

    दर-ए-दुआ कर दिल, लौटता हरेक बार याँ
    'विशू' दिल तुम्हारा भी तो, रम्ज़-दाँ सा हुआ

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 55w

    ग़ज़ल

    ना-उम्मीद अब दस्तक-ए-दिल को मिलती रही
    हल-ए-उक़्दा-ए-आसाँ से भी रूह जलती रही

    तोबा! उन्से वा-बस्ता रहा आख़िर क्यूँ दिल से
    वक़्त-बे-वक़्त बात दर्द-ए-दिल को ख़लती रही

    आब-ए-आईना चश्म का चश्म में तसव्वुर देता
    हया-ए-रू-ए-निगारीं उन्की सिर्फ़ चमकती रही

    कह आते अलविदा यक़ दफ़ा उन्से हमी दिल
    शब-ए-ग़म सोहबत लिए आरज़ू ये ढ़लती रही

    फ़ख़्र-ए-मुनासिबत आसाँ तो था नहीं निभाना
    हयात-ए-नौ सरगोशियाँ भूल अब चलती रही

    मर्ग-ए-निशाँ तय था सर-ए-मरक़द सज़ा कर
    तामील-ए-वफ़ा के आग़ोश में अब तपती रही

    बा-ख़ुदा रूख़्सत-ए-अंदाज़-ए-रवानी हो जाए
    रूह-ए-'विशू' आब-ए-चश्म बनकर बहती रही

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 55w

    ग़ज़ल

    कई तो ग़लत हूँ ना मैं... तुम ज़रा बात बताना मुझे
    शोर बहुत है इस जगह...कई लेकर तुम जाना मुझे

    भूला हूँ चाबी मकाँ की, उसे घर मैं कहूँ तो भी कैसे
    ख़ाली चार दीवारों से चिपका, थोड़ा तो हटाना मुझे

    ऐ सुर्ख़ छत उस्की मेंहदी की याद दिलाती हर वक़्त
    ख़ामोशी अंदरूनी जो.. निकलेगी कम पिलाना मुझे

    क़दमों को आदत नहीं जो चलेंगे सिर्फ़ उसकी और
    रास्ते और भी है... इस जहाँ में इतना सिखाना मुझे

    मसरूफ़ कर दो.. मुश्किल पैदा कर मेरे हम-नफ़स
    मंज़र-ए-आम तमाशा कर, ना-लायक कराना मुझे

    हर सुबह नींद खोलना उसके जुल्फ़ों को आदत है
    करवटों में अब शब जाती थोड़ी नींद दिलाना मुझे

    तसल्ली मिले निगह को तो चराग़ बुझा कर जाना
    ख़ामख़ा क्यों जले वो उस जैसा कभी जलाना मुझे

    उसकी आह का अंदाज़ा कैसे लगाऊँ बता देना तू
    ऊँ निकाली न जिस दर्द से उतना ही तड़पाना मुझे

    बे-वजूद है 'विशू' उसके बिना जो अकड़ दिखाता है
    असलियत क्या है बिना उसके बस ऐ दिखाना मुझे

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    कुछ ख़्वाब... कुछ हक़िक़त.... बयाँ कर चला
    ख़ुद को कर जमीं... तुम्हें याँ आसमाँ कर चला

    ताहिर रहूँ इश्क़ में.... तासीर सिर्फ़ तुम्हारे लिए
    इस्मत हो मिरी... इसलिए.. तुम्हें मकाँ कर चला

    *******

    #nishabd #bal_ram_pandey #succhiii #vishu #parle_g #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    बे-नूर हूँ जान-ए-मन, क़ुबूल-ए-दिल-सादा करो
    आख़री ग़ैर-ए-वस्ल बा'द, न होगा ऐ वादा करो

    सोहबत-ए-शौक़ तुम्हारा, परवाह क्या और करूँ
    ग़र न तक़दीर-ए-इश्क़, फ़िर ख़ुदा बे-मुरादा करो

    सत्ह-ए-ख़्वाब जो, तुम्हारे दिल-ए-नादाँ ने जताई
    उम्मीद-ए-ख़्वाब उन्से, दिल अंदर ज़ियादा करो

    चैन-ओ-सुकूँ तसव्वुर-ए-ज़ुल्फ़-ओ-मिज़ा है तो
    सूरत-ए-ज़ेबा बे-पर्दा कर, इसे नुमू-आमादा करो

    क़ाबिल-ए-इश्क़ रहूँ, तुम्हारे अंदाज-ए-नज़र में
    दौर-ए-वक़्त देख, जान-ए-ज़िगर शहज़ादा करो

    ता-उम्र पियादा बन रहेगा 'विशू', गुल-एज़ार कर
    बे-फ़ना मुहब्बत का दिल से, तुम याँ इरादा करो

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    हालातों को जो बयाँ किया है.... शायद कोई मंज़र-ए-आम नहीं हुआ होगा... फ़िर भी ख़यालातों में जो उभरा... सादा-ए-पर्चा पर रूबरू.... मिरे हर्फ़-गह से.... ख़ुली निगह से उतारा है....
    ग़र यह ग़लत है तो ग़लत बता दिजिए....
    ग़लती के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ!

    #nishabd #vishu #bal_ram_pandey #succhiii #gazal #indiurdu
    मतलब:-

    अश्क-ए-ख़ूँ - reflection of blood
    सैल- flood
    इस्मत-ए-उन्वाने-हस्ती- protection
    क़ाँ -कहाँ
    रुख़- face
    याँ - यहाँ
    ना-पाक- dirty
    वालिद-ए-मुहतरम- respected father
    नस्ल-ए-शजर- family tree
    आलम-ए-दिल- world of heart
    सम्त- दिशा की और
    अहल-ए-दहर- man of world
    दाग़-ए-तर्क़-ए-मरासिम- spot of renunciation of relationship
    दर्स-ए-अमन - teaching
    ख़ूँ-ए-बशर- character
    अक्स- reflection
    तहज़ीब-ए-नौ- new culture
    मुल्क-ए-तहज़ीब - country of culture
    निगाह-ए-क़हर-परवर- look of fury
    दास्ताँ-ए-गिर्या- sob story
    तख़लीक़ी- creative
    नस्ल-ए-नौ- new generation
    दास्ताँ-ए-सफ़र- story of journey

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    ग़ज़ल

    अश्क-ए-ख़ूँ सैल में तब्दील होकर नहर रुख़ हुआ
    इस्मत-ए-उन्वाने-हस्ती फ़िर क़ाँ ऐ शहर रुख़ हुआ

    ना-पाक हरक़त हक़िक़त में जो छुपाएँ रख चले है
    वालिद-ए-मुहतरम कैसे ऐ नस्ल-ए-शजर रुख़ हुआ

    गंदगी ग़र रही पनपती अंदरूनी आलम-ए-दिल में
    हर सम्त नज़र-ए-नज़र में अहल-ए-दहर रुख़ हुआ

    ख़ामोश है दाग़-ए-तर्क़-ए-मरासिम से जो हुआ याँ
    दर्स-ए-अमन में ना-पाक याँ ख़ूँ-ए-बशर रुख़ हुआ

    अक्स बे-ईमानी तहज़ीब-ए-नौ के कदम लौ चली
    मुल्क-ए-तहज़ीब निगाह-ए-क़हर-परवर रुख़ हुआ

    किस अंदाज़े ज़ुबानी दास्ताँ-ए-गिर्या तख़लीक़ी देगा
    'विशू' नस्ल-ए-नौ क्यों यूँ दास्ताँ-ए-सफ़र रूख़ हुआ

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    ग़ज़ल

    जान-पहचान का हूँ तो... सख़्ती को रखना ना छोड़ना
    हूँ ग़र क़ुसूरवार तो.... बा-इज्जत यूँ खुला ना छोड़ना

    साबित होते ग़र जुर्म मेरे... तुम मुकर ना जाना उसे
    होगी ना सजा-ए-मौत तब तक.... पिछा ना छोड़ना

    सुना है कबूल-ए-मुराद होती है.. पास ख़ुदा के... तेरी
    मेरे हरेक गुनाह का... मिले सुराग.. हौसला ना छोड़ना

    दलीलें पेश करना... इस तरह बे-गुनाह ना दिखूँ.... मैं
    करना नफ़रत मुझसे... बीच में तुम फ़ासला ना छोड़ना

    अभी नासूर-ए-दिल... अंदर ज़िंदा है... समझौते के साथ
    कर यक़ीं बातों पर... उसके..... तुम यूँ वफ़ा ना छोड़ना

    ठोकर, दगा देकर... ज़लील कर जाएगा... बीच बाज़ार
    भूल जा 'विशू' को...पर तुम उसका..... पीछा ना छोड़ना

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    ग़ज़ल

    संभल रहा हूँ ख़ुद में साथ लिए पैमानों में
    गिनती और एक बढ़ गई, यार दीवानों में

    अक्सर मिलते रहे जिसे हम, ख्वाबों में
    वो आज रही पास यारा, उन अनजानों में

    सोच के भी न मुकम्मल, बात आगे बढ़ी
    सोचते ही रह गए ग़म, अब मय-ख़ानों में

    नफ़रत से रुख़सत अब वो ख़्वाबों की परी
    बसाए जहाँ अपना ही, अब परीबानों में

    आब-ए-चश्म से, न सूखे कभी मिरे इधर
    लूटा है मुझे देखो अब मेरे ही दिलदारों ने

    उल्फ़त से अब कभी, न गुज़र जाऊँ कई
    राह तकते है देखो, वो ताबूत कब्र स्थानों में

    हारी उल्फ़त कुछ ऐसे के बताएँ क्या 'विशू'
    भटक रही है यारा, यादों के रेगिस्तानों में

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    निशब्द रहता हूँ... जभी मंज़र-ए-आम यूँ हालातों को देखता हूँ...
    तो लगता है ख़ुदा... क्यों उनके नसीबी... ऐ प-ए-हू नहीं...
    जिसके लिए तड़पते है... तरसते है दिल... जिनके पास नूर-ए-हू होकर भी बे-परवाही करते है.... या-ख़ुदा रहमो करम फ़रमा उन्हीं पर... उनके दिल को तब्दील कर... नेक ख़्याल भर दे....
    बस यही दरख़्वास्त-ए-दिल तिरे दर-ब-दर करता है
    आमीन!!!

    #nishabd #vishu #succhiii #bal_ram_pandey #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    "माँ"

    इंतजार में रहती आंखों में कई दर्द देखे है
    आस लगाए बैठी उसके पास मर्ज़ देखे है

    भूला दिया सबने फिर भी फ़िक्र जिंदा रही
    बहते आब-ए-चश्म में मिलने के अर्ज़ देखे है

    बाद उनके ना था कोई इम्तिहान परवरिश की
    हरेक गुज़रे हुए लम्हों में उसके फ़र्ज़ देखे है

    जगह वो थी उसकी जिसे खुदाया घर कहा
    मिलता ना कहीं पास उसके वो गर्ज़ देखे है

    जिसके इंतजार में रोई शब-ए-गम में वो
    जान लिया तो ना जाने कितने कर्ज़ देखे है

    कौन करेगा बराबरी उस शख्सियत की
    दिया खुदाने ममता का ऐसे अल-कर्ज़ देखे है

    दफन अभी उन अलमारियों में पास उसके
    ना मिलने आऊंगा कभी जमाएं लेटर्ज़ देखे है

    इक जिंदा रही रूह इंतजार में साथ 'विशाल'
    उस माँ की आब-ए-चश्म से बहते दर्द देखे है!

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    यक़ साधी ग़ज़ल... जो दिले नादाँ से रूबरू हुई... कुछ एहसास बाँध रखे थे.... मुकम्मल... जो न हुए.... न ब-दस्त हुए... न बे-दस्त हुए... बस जलते रहे.... जलाते रही.... धीमी तपिश में... दर्द उठता रहा... मरहम-ए-इश्क़... न कोई.... ताकता रहा.... देखता रहा... यक़ अंजान बन... हर्फ़-गह से वऱक... फ़क़त... भरता रहा

    #nishabd #vishu #succhiii #gazal #hindiurdu #bal_ram_pandey

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    ग़ज़ल

    मेरा नाम कभी मेरी पहचान नहीं हुई
    जो हुई वो मुझ पर मेहरबान नहीं हुई

    कोई भी राह चली मैंने सच कहूँ तो
    कभी वो पेश मुझे आसान नहीं हुई

    तकलीफ़ और चुनौती तो कुछ ऐसे
    कुचल गए पर पूरी क़दरदान नहीं हुई

    जब भी अपनाया किसी को दिल से
    बस दूर हुई मुझसे मेरी जान नहीं हुई

    मैं डूबा रहा ख़्यालों में पाने के लिए
    मिलकर बिछड़ी पर अरमान नहीं हुई

    बार-बार चलता रहा तलाश में मंजिल के
    पाकर खोया जो मुकम्मल अंज़ाम नहीं हुई

    बस लगता रहा इल्ज़ाम मेरे ही चरित्र पर
    पाक कर दूँ पर मुझे भी आसान नहीं हुई

    अब खुद में दफ़न एक रूह सा बचा सिर्फ़
    जैसे देखूँ तो ज़िन्दगी की, कोई शाम नहीं हुई

    पर फिर भी एक रेग़िस्तान सी फ़ैली है
    'विशू' को ख़ाक करें ऐसी मेज़बान नहीं हुई

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    कैसे यक़ीं दूँ मैं... तुम काँ-काँ हो अंदरूनी आलम-ए-दिल में....
    मिरे ख़्वाबों ख़्यालों में... याँ तक उबलते ख़ूँ-ए-ज़िगर में....
    समझाऊँ कैसे के आख़िर कौन हो... दवा हो या... दुआ हो...
    सज़ा हो या... रह-ए-उल्फ़त में वफ़ा हो...
    मिरे इर्द-गर्द तो बस तुम ही तुम हो... फ़िर मिलता... ऐ हिज़्र कैसा...
    जो मुसलसल आता है.... मयस्सर रहता है....
    मिठे ज़हर कि तरह... जिस की आदत नहीं... बल्की लत लगी है...
    ख़ामोशियों में भी तुम हो.... ख़्वाहिशों में भी तुम हो
    तन्हाईयाँ भी तुमीं से जुड़ी.... वक़्त के हरेक क़तरे में समाती...
    तो बताओ... कैसे यक़ीं दूँ..... के तुम याँ हो ही नही.....

    #nishabd #vishu #succhiii #gazal #hindiurdu

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    कैसे यक़ीं दूँ..

    तुम्हारी अदाएँ.... सताएँ मुझे
    मेरी क्या ख़ता.... बताएँ मुझे
    हुस्न ऐ क़ातिल... बनाएँ मुझे
    अंजाने से दिल. अपनाएँ मुझे

    था जो भी मैं..... अब हूँ कहाँ
    ठिकाना ना मेरा. ना रहा जहाँ
    रहता है गुमनाम.. तुम है वहाँ
    ढूँढ़ता है अब. तुम्हारे ऐ निशाँ

    सिलवटों धीमी गिरी है बारिश
    नम आँखें छुपाने की है कोशिश
    लगाऊँ दिल दिल की है साजिश
    करता नहीं मै... कोई नुमाइश

    तुम से पर्दा.. तुम से जुदाओं मैं रहा
    तुम्हारे दर्द की. क्या दवाओं मैं रहा
    झुकी निग़ाहों में बता दुआओं मैं रहा
    गेसूओं को छुती उन हवाओं मैं रहा

    तुम इर्दगिर्द मेरे हर बातों में रही
    सर्द कभी गर्म गुज़री रातों में रही
    नीदों से दूर आती ख़्वाबों में रही
    कभी पन्नों में कभी किताबों में रही

    आलम ऐ सारा तुमसे मिलाता चला
    यादों को देकर फ़िर जलाता चला
    तन्हा हूँ तुम बिन मैं ऐ बताता चला
    तुमसे ही मोहब्बत हर पल कराता चला

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    "संध्या देखना इसने भी कुछ लिखा है", सहपाठी ने मेरे संध्या को आवाज़ देते हुए कहा!
    (संध्या एक होनहार एवं बहुत सुंदर स्वभाव की लड़की थी! जो हर किसी के साथ बातें एवं चाहिए वो सुझाव भी दिया करती थी। साथ में वो पाठशाला में एक ही लड़की थी जो कविताएँ बनाया करती थी।)
    संध्याने मेरी और देखते हुए कहा " दिखाओ! आख़िर क्या लिखा है?"
    और फिर आगे बढ़ते मेरे पास आ गई।
    पास में बैठे मंगेश ने बेंच पर पड़ी नोटबुक उसके हाथ में थमाते हुआ कहा " देख लेना ठिक से पहली बार इसने कुछ लिखने की कोशिश कि है, साथ में कहाँ गलतीयाँ हुई यह भी बताना!
    संध्याने नोटबुक देख पढ़ने लगी
    उसकी आँखों में कुछ अजीब हरकतों देख
    मैंने झट से नोटबुक ली
    तो उसने कहा " दिखाओ ना! अच्छा लिखा है!"
    संध्या मेरे हाथों में से नोटबुक लेते हुए कहा
    संध्या फिर से पढ़ने लगी
    २-३ मिनट बाद उसने मेरी नोटबुक देकर कहा
    कहाँ से सिखा इतना सुंदर लिखना
    हालांकि वह भी लिखती थी
    पर उसके‌ मुंह से यह बात सुनना मेरे लिए बहुत था
    चंद लम्हें खामोश रहने के बाद मैंने कहा
    यूँ ही मन में आया तो उतार दिया
    संध्याने नोटबुक फिर से लेकर जोर से पढ़ने लगी
    मैं उंगलियां मुंह में लेकर उसे देखते रहा एवं संपूर्ण कक्षा को
    कक्षा पुर्ण रूप से मेरी लिखी कविता सुन रहा था
    उस समय पहली बार मैं सातवे आसमान की सैर कर रहा था

    कुछ दिन बित जाने के बाद संध्याने वहीं कविता पाठशाला में सुनाई जब प्रार्थना का समय था
    सब शांतिपूर्ण उस लिखी कविता को सुन रहे थे
    कविता के खत्म हो जाने के बाद जब सबने संध्या को बधाई दी तब संध्याने सब के सामने मेरा नाम लेते हुए कहा के यह कविता मैंने लिखी है

    तब से मैंने लिखने की शुरुआत कि है

    आज करीब १९ साल बाद उन्हें यहाँ वापिस लिखने की कोशिश कर रहा हूँ शायद आप सब को मेरी कविताएँ पसंद आएगी

    #nishabd #vishu #succhiii #gazal #hindiurdu

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    झरोखे यादों के....

    तुम ही सूर तुम ही गीत हो
    तुम ही सनम मेरी मित हो
    तुम से ही सब कुछ है मेरा
    तुम ही शब्द तुम संगीत हो

    तुम आईना जो दिखाता है
    जीवन जो मुझे सिखाता है
    भटकने देता नहीं ख़ुदी से
    सोहबत में संग चलाता है

    तुम ही मंजिल तुम राह हो
    तुम दिल तुम ही निगाह हो
    देखूँ ना अगर तुम को तो
    लगता है किया गुनाह हो

    तुम ही इश्क़ तुम उल्फ़त हो
    तुम ही तो मेरी ज़रुरत हो
    तुम हो जो तो दुनिया मेरी
    वरना ख़ुदी से नफ़रत हो

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    दु-दिलों में बरक़रार रहती मुहब्बत दिखी है
    महज़बीयों को उनमें सब बग़ावत दिखी है

    बा-ख़ुदा गुनाह कैसा आलम-ए-बशर यहाँ
    पाक दिल में उबलती मैंने नफ़रत दिखी है

    #nishabd #succhiii #vishu #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    सख़्त हुआ हूँ यह गुनाह हुआ क्यों?
    इश्क़ की मुझे आखिर ये सजा क्यों?

    दु दिलों ने रस्मे मुहब्बत गर निभाई
    एक सहरा हुआ तो जन्नत दुजा क्यों?

    काँटों से ताल्लुकात कर चले सब है
    गुल पसंदीदा है तो फिर मैं बुरा क्यों?

    कटता नहीं था लम्हा ज़ीस्त गुजारी
    दिले नादाँ बता तिरी ऐ दुआ क्यों?

    छूट नहीं पाया आगोश से गर कभी
    दु दिल सरे आम लग रहे जुदा क्यों?

    ना पसंद है सूरते जेबां जो चाहते है
    अंजाने से वहीं इसी पर फिदा क्यों?

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    कुछ बे-मौसमी थे पल... यक़ अर्से पहले... जिनका वज़ूद अब न के बराबर है.... फ़िर भी वो वस्ल की यादें तब्दील सैलाबों से... आलमे दिल में मकाम बनाती है... खिंच लेती है वापिस उस तपिश में... जलने के लिए... यक़ चराग़ कि तरह... जिसे बुझना है... पर... बुझा न पा रहा है....

    #nishabd @vshu #succhiii #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    शुभकामनाएँ देकर भीगी बारिश लिए चला
    गैर होकर तुमसे तुम्हारी गुजारिश लिए चला

    हालांकि अब मुकद्दर में होगा नहीं दुबारा ऐ
    पर लकीरें बदलने की मैं साजिश लिए चला

    हार गया था सबकी नज़र में मालूम था तुम्हें
    आरजू मरी नहीं तो करने कोशिश लिए चला

    बग़ावत पर उतर आए थे लम्हें गुजारे जो भी
    करता भी क्या मन में अब रंजिश लिए चला

    समय रहते भूल जाएंगे तुम्हारे संग अपने भी
    ख़ुदी को ना भूल जाए तो कशिश लिए चला

    रोक पाया न शब्द तुम्हारे न तुम्हारी यादें सब
    समेट ख़्वाबों संग 'विशू' यक़ बंदिश लिए चला

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    ग़ज़ल

    रस्मे उल्फ़त अब हमें निभाई नहीं जाती
    चिंगारी भड़की तो वो बुझाई नहीं जाती

    मत आ जाना ख़्वाबों - ख़्यालों में कभी
    रहे उल्फ़त की सही जुदाई नहीं जाती

    दर्दे दिल सोहबत दर्दे ज़िगर हुए तो अब
    दिल ही दिल में रहती रुस्वाई नहीं जाती

    ताल्लुक रह गया हमेशा दिल का उनसे
    बातें वस्ले यार की भूलाई नहीं जाती

    हँसकर निकल जाता हूँ कूचे से हमेशा
    दर्दे दिल किए बिना विदाई नहीं जाती

    अभी रूबरू भी होती नहीं यादें उनकी
    शिद्दत से थमी हुई ये तन्हाई नहीं जाती

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    ग़ज़ल

    तुम्हारी जुदाई का कैसा असर हुआ
    लगता दिले रेजा पूरा ऐ शहर हुआ

    इल्म नहीं रखता आख़िर क्यों हुआ
    हमीं का दिल हमीं से बेखबर हुआ

    दर्दे ज़िगर लाइलाज लगे तुम बिन
    काफिला यादों का ये ज़हर हुआ

    सहरा बन गया जीवन अब सारा
    गुमनाम हमी से हमारा सफ़र हुआ

    सख़्त हुए गमे हिज्र से तुम्हारे हम
    कूचे कूचे का लम्हा नज़रे नज़र हुआ

    कहा जाएगा क्या हाले दिल 'विशू'
    तलाशे यार में ख़ुदी रहे गुज़र हुआ

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 56w

    #nishabd #vishu #gazal #hindi #succhiii

    शग़ब-noise, मुसब्बब- कोई एक वज़ह, दर्स-ए-अख़्लाक़-morel lesson, मर्ग-ए-तलब- death of desire, उज़्र-ए-तक़्सीर-fault

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    ग़ज़ल

    है ग़र यक़ी के, यक़ीनन सही सब था
    वहीं क़ातिल मिरा, जो मिरा ही रब था

    मुसलसल इश्क़ में, जाँ-निसार कराया
    गुलिस्ताँ कभी जो, सहरा बना अब था

    ख़ामोश जलज़ला, चराग़ों से उभरता
    शब-ए-ग़म में बस, उस का शग़ब था

    सादा-ए-दिल शख़्सियत में क्यों ख़ुदा
    हरेक झड़ का बस, यहीं मुसब्बब था

    दर्स-ए-अख़्लाक़ ज़ीस्त, क्या तिरी याँ
    मऱज-ए-दवा में सिर्फ़ मर्ग-ए-तलब था

    उज़्र-ए-तक़्सीर में वाँ, ज़ुबानी बयाँ था
    दास्ताँ-ए-'विशू' का, ख़ाली क़ल्ब था

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    ताल्लुक होता नहीं तो, बे-दाग़ हम भी होते,
    आफ़्ताब से बेहतर दबाए,आग़ हम भी होते,

    बुझे तो बस उन, जलते शम'अ् की वजह से,
    वगर्ना दौर-ए-मुश्किल में, चाग़ हम भी होते,

    कर देते रौशन कायनात, ख़ुद-ब-ख़ुद सारी,
    ग़र शब में अकेले, जलते चराग़ हम भी होते,

    बर्बाद हुए हम भी, उस ताल्लुक़ात से उन के,
    होता नहीं तो, गुलों से भरी बाग़ हम भी होते,

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  • drunken_heart 57w

    ग़ज़ल

    सादा-ए-दिल अली-वली के मेहर से मिला,
    बर्बाद होने को फ़िर इश्क़ के ज़हर से मिला,

    तलाश-ए-बुत की ख़ातिर मुसाफ़िर हूँ बना,
    कौनसी मंज़िल थी जो, इस सफ़र से मिला,

    गाँव कुदरत से हराभरा जो भाया करता था,
    ख़ोज़ में बुत के फ़िर, आकर शहर से मिला,

    ख़्वाब अन-चाहे देखता रहा इस क़दर यहाँ,
    टूटा तो जाकर, सिर्फ़ आब-ए-नहर से मिला,

    मन्नत-कश-ए-अम्वाज तुमीं, जो छोड़ चले,
    तलाश-ए-यार में काँ, कज़ा-ओ-क़दर से मिला,

    सल्तनत प-ए-हूँ तुमीं, आलम-ए-दिल में रहे,
    'विशू' तराशता तुम्हें तो, वाँ मसदर से मिला!

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  • drunken_heart 56w

    ग़ज़ल

    तख़य्युल भी अब तिरे अंदाज-ए-नज़र आते है
    गुम'नाम हो भी जाऊँ लौट उसी श'हर आते है

    सुर्ख़ियों को निहारता हूँ गुज़रे कल कि है पास
    महफ़ूज है इतने के बनके ताज़ा ख़बर आते है

    सुर्ख़ स्याही से हर्फ़-दर-हर्फ़ लिख जाता जभी
    उमड़ कर फ़िर निग़ह में आब-ए-नहर आते है

    ताल्लुक़'आत इक सिर्फ़ तुम से है अहबाब मिरे
    वग़र्ना न जाने कितने पास में हम-सफ़र आते है

    फ़ासले कट गए इंतिज़ार में तिरे कैसे समझाऊँ
    बस समझ ले इतना के वाँ हो दर-ब-दर आते है

    अंदाज-ए-ज़ुबानी तिरे क़ायनात में न देखी कभी
    'विशू' को पागल कराने कज़ा-ओ-क़दर आते है

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