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194 posts
  • 73mishrasanju 41w

    बस यूँ ही
    तम तमी अँखियों में बीत गई ,
    तुम बेवज़ा फिर याद आ गई ।
    हम टूट गए थे बा वज़ तुम पर
    तुम तम सी बेवफ़ा यामिनी हो गई।

    बा वज़ / सभ्यता के साथ
    बेवज़ा/ बगैर बनावटी ढंग के

    ©73mishrasanju

    26 /10/2021 4:00 am

  • 73mishrasanju 52w

    तकिया

    मैंने बदल दिया है
    वह तकिया जिस पर सर रखकर हम सोते थे
    सपने देखते थे
    बहुत दिनों तक मेरी नींद सोख लेता था वह तकिया
    सपने बुलबुले हो गए
    अपने जाने कहां खो गए
    धुल धुल कर भी ना गई तुम्हारी खुशबू
    उस तकिए से
    मेरा रतजगा बुलाती रही हर रात
    बिस्तर के हर तरफ से उतरता रहा, चढ़ता रहा पैर ,पेट ,कांधे सब सो गए ,सोते रहे
    सिवाय एक मन के ,
    जो प्रेत सा उड़ता रहा रात भर जागता रहा या पीता रहा अश्क ,मन मेरा ,अब
    मैंने वह तकिया बदल दिया है ।
    संजय मिश्रा
    15/8/2021

    ©73mishrasanju


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  • 73mishrasanju 62w

    जागृत स्वप्न

    दिनभर की थकन से पस्त हुआ
    बिस्तर पर आकर बैठा था
    आँखे बोझिल होती जाती थी
    जैसे तैसे सिरहाना सर को टिकाया था
    सरगोश नींद की हुई शुरू
    तभी शरारत करके अचानक
    मन ने सपनों को जगा दिया
    सोने पर तो सभी देखते
    तुम देखो जगती आँखों से ख़्वाब
    गहन नींद में गाहेबगाहे आये
    सपनों की तुलना से अधिक सजग होंगे
    नींद बेचारी अचकचाई सी
    ये गई कि वो गई
    देखने सपने शुरू किये
    बढ़ते ही गए बढ़ते ही गए
    कुछ छूटा कुछ पकड़ा
    कुछ बांधा कुछ छोड़ा
    कुछ लिया सहेज लिया सदा के लिए
    कुछ छोड़ दिए बस गिरह लगा
    ताना बाना भूली बिसरी
    खट्टी मीठी यादों की
    डोर पकड़ बढ़ता ही गया
    सपनों की विस्तृत ये चादर
    जितनी समेटी उतनी ही
    फैलती गई जिद्दन बच्ची सी
    कुछ रंग बिरंगे से सपने थे
    कुछ काले और सफेद भी थे
    कुछ स्वप्नों पर थी राख जमी
    कुछ दहके हुए लावे भी थे
    कुछ बर्फ से सर्द कठिन थे
    कुछ रंग बहारों के भी थे
    कुछ बीत चुके सपने भी थे
    कुछ नए सँजोये से भी थे
    सपनों की आपा धापी में
    गुजर तीसरा प्रहर गया
    नींद कहीं पथराई सी
    इंतजार करती होगी
    मैं सोच रहा आँखे खोले
    कल सुबह हकीकत क्या होगी
    सब प्यारे सपने पलकों में भर
    आँखों को कसकर भींच लिया
    अब नींद रूठ कर बैठी है
    आती भी नहीं बुलाने से

    संजय मिश्रा
    3/6/2021

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 67w

    जलती चिताओं की अनल अब ,
    दावानल वलय सी लगती है ।
    चमकती बेफिक्र ज़िंदगी अब ,
    धुँआ धुँआ , राख सी लगती है ।

    संजय मिश्रा - 1/5 / 2021

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 67w

    स्वप्नद्रष्टा

    मै एक अचेतन स्वप्नदृष्टा
    देखता हूँ अलस भोर में अँधकार से निकल भागने को आतुर सूर्य की छटपटाहट
    दोपहर को खुले आसमान में रार मचाते धरा को दह्काते सूर्य को
    और सांझ के साँवरे सलोने उच्च भाल पर बिंदी से जड़े शालीन सूर्य को
    मैं महसूस करता हूँ सुदूर प्रांतों से लंबा रास्ता
    तय करके आईं अद्भुत गुलाबी हवाओं को
    देखता हूँ मै विस्मय से मुंह खोले से नवपल्लवित नर्म पौधों को
    देख पाता हूँ चाँद के देर से आने पर भयभीत हिरणी सी बेसुध होती और खिल उठती चांदनी को
    हां मै हूँ एक अचेतन स्वप्नदृष्टा
    संजय मिश्रा 26/04/2019

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 76w

    जीवन बोध

    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं कुछ उजले कुछ धुंधले-धुंधले।
    जीवन के बीते क्षण भी अब कुछ लगते है बदले-बदले।

    जीवन की तो अबाध गति है, है इसमें अर्द्धविराम कहाँ
    हारा और थका निरीह जीव ले सके तनिक विश्राम जहाँ
    लगता है पूर्ण विराम किन्तु शाश्वत गति है वो आत्मा की
    ज्यों लहर उठी और शान्त हुई हम आज चले कुछ चल निकले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

    छिपते भोरहरी तारे का, सन्ध्या में दीप सहारे का
    फिर चित्र खींच लाया है मन, सरिता के शान्त किनारे का
    थी मनश्क्षितिज डूब रही, आवेगोत्पीड़ित उर नौका
    मोहक आँखों का जाल लिये, आये जब तुम पहले-पहले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

    मन की अतृप्त इच्छाओं में, यौवन की अभिलाषाओं में
    हम नीड़ बनाते फिरते थे, तारों में और उल्काओं में
    फिर आँधी एक चली ऐसी, प्रासाद हृदय का छिन्न हुआ
    अब उस अतीत के खंडहर में, फिरते हैं हम पगले-पगले।
    स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...
    अज्ञात



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  • 73mishrasanju 94w

    ये दिल अपना न जाने क्यूँ
    यूँ ही बस टूट जाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    मेरी दीवानगी मुझको,
    कहाँ ले कर के जाएगी
    मेरी ख़्वाहिश किसी को भी,
    न शायद रास आएगी
    ये ग़म मेरा न जाने क्यूँ,
    मुझी पर मुस्कुराता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    खिज़ाओं में बसे थे हम,
    बहारें थीं मुहाने पर
    क़रीब आईं नहीं पल भर,
    मेरे इतना बुलाने पर
    ये 'सच' मेरा न जाने क्यूँ,
    मुझे बरबस रुलाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को,
    तो जग ये रूठ जाता है

    मेरी ख़ुशियाँ मेरे दिल से,
    यूँ ही तक़रार करती हैं
    ज़रा ख़ुश हम जो होते हैं,
    हमीं पर वार करती हैं
    मेरा हँसना, न जाने क्यूँ
    क़हर मुझ पर ही ढाता है
    मनाते हैं जो हम दिलको
    तो जग ये रूठ जाता है

    ये दिल अपना,न जाने क्यूँ
    यूँ ही बस टूट जाता है
    मनाते हैं जो हम दिल को
    तो जग ये, रूठ जाता है

    ©73mishrasanju

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    ©73mishrasanju

  • 73mishrasanju 95w

    मेरा इश्क़ ही मेरी ज़िंदगी , इसको मिटायें किस तरह ,
    तेरी ज़ुस्तज़ू में जी रहे , तुझे भूल जायें किस तरह ।

    बीत जाये उम्र यूँ ही , नाम तेरे कर जो दी ,
    मेरी ज़िंदगी बेहिसाब है , इसका हिसाब दूँ किस तरह।

    हद से गुज़र जाये यूँ ही , ये तड़प जो मेरे दिल की है
    ये ईनाम हैं जो ज़ख्म हैं , उनको छिपायें किस तरह।

    दर पर तेरे झुक जाये यूँ ही , सज़दे को मेरी नज़र ,
    तू ख़ुदा है मेरा ख़फ़ा है क्यूँ , तुझको मनायें किस तरह।

    मेरी सांस रूक जाये यूँ ही , तेरी ख़ुशबू अब जुदा न हो ,
    धड़कन मेरी तेरे नाम हैं , तेरा नाम न लूँ किस तरह,

    करे जा सितम मुझ पर यूँ ही , तेरी हर सज़ा क़ुबूल है ,
    मुझे दर्द देना अदा तेरी , इसे न कुबूलूँ किस तरह ।

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 95w

    बैठ किनारे , देखता हुआ
    सरोवर में गिरती उन बूँदों को
    ओस की बूँदें , जो
    झिलमिलातीं, सपनों की रात सी ,
    परिणीति, तरंगें उत्पन्न करतीं ,
    आश्चर्य है ! मेरा हृदय भी शांत ,
    किन्तु कहीं-कहीं पर
    डूबती - उतराती
    वह यादें , जो ओस बन मेरी पलकों से झरीं थी कभी ।
    देखता हूँ मैं कि मेरे छूते ही ,
    वह पत्ता काँप उठता है,
    सह नहीं पाता क्या वह भी,
    तपती रेत की तरह मेरी आस को,
    जो चुनती है ,
    ओस ,
    और सुंदरतम अतीत के ,
    भाव विह्वल पल,
    जैसे कि मैं फिर पूछता हूँ तुमसे ,
    क्या मैं ,
    देख सकता हूँ तुम्हें ?
    अपने हाथों से ?
    तुम मुस्कुरा देती हो,
    अहसास करके मेरे हाथों की छुअन का ,
    वह स्पर्श , जो अधरों से किया , तुम्हारा ,
    मेरी अंगुलियों ने कभी ।
    आह ! नहीं है अंत इसका , यह सब कुछ,
    बनेगा - मिटेगा
    बस इसी तरह से,
    लहरें-तरंगें , आत्मसरोवर में उठेंगी किन्तु ?
    यह भी हलाहल है जो ,
    मजबूर कर रहा है , मुझे ,
    शिव बनने को ।
    बैठ किनारे ,
    सोचता हूँ मैं ,
    तुमसे है जीवन या तुमसे था कभी ?

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 95w

    मेरा इश्क़ ही मेरी ज़िंदगी , इसको मिटायें किस तरह ,
    तेरी ज़ुस्तज़ू में जी रहे , तुझे भूल जायें किस तरह ।

    बीत जाये उम्र यूँ ही , नाम तेरे कर जो दी ,
    मेरी ज़िंदगी बेहिसाब है , इसका हिसाब दूँ किस तरह।

    हद से गुज़र जाये यूँ ही , ये तड़प जो मेरे दिल की है
    ये ईनाम हैं जो ज़ख्म हैं , उनको छिपायें किस तरह।

    दर पर तेरे झुक जाये यूँ ही , सज़दे को मेरी नज़र ,
    तू ख़ुदा है मेरा ख़फ़ा है क्यूँ , तुझको मनायें किस तरह।

    मेरी सांस रूक जाये यूँ ही , तेरी ख़ुशबू अब जुदा न हो ,
    धड़कन मेरी तेरे नाम हैं , तेरा नाम न लूँ किस तरह,

    करे जा सितम मुझ पर यूँ ही , तेरी हर सज़ा क़ुबूल है ,
    मुझे दर्द देना अदा तेरी , इसे न कुबूलूँ किस तरह ।

    ©73mishrasanju

  • 73mishrasanju 95w

    बैठ किनारे , देखता हुआ
    सरोवर में गिरती उन बूँदों को
    ओस की बूँदें , जो
    झिलमिलातीं, सपनों की रात सी ,
    परिणीति, तरंगें उत्पन्न करतीं ,
    आश्चर्य है ! मेरा हृदय भी शांत ,
    किन्तु कहीं-कहीं पर
    डूबती - उतराती
    वह यादें , जो ओस बन मेरी पलकों से झरीं थी कभी ।
    देखता हूँ मैं कि मेरे छूते ही ,
    वह पत्ता काँप उठता है,
    सह नहीं पाता क्या वह भी,
    तपती रेत की तरह मेरी आस को,
    जो चुनती है ,
    ओस ,
    और सुंदरतम अतीत के ,
    भाव विह्वल पल,
    जैसे कि मैं फिर पूछता हूँ तुमसे ,
    क्या मैं ,
    देख सकता हूँ तुम्हें ?
    अपने हाथों से ?
    तुम मुस्कुरा देती हो,
    अहसास करके मेरे हाथों की छुअन का ,
    वह स्पर्श , जो अधरों से किया , तुम्हारा ,
    मेरी अंगुलियों ने कभी ।
    आह ! नहीं है अंत इसका , यह सब कुछ,
    बनेगा - मिटेगा
    बस इसी तरह से,
    लहरें-तरंगें , आत्मसरोवर में उठेंगी किन्तु ?
    यह भी हलाहल है जो ,
    मजबूर कर रहा है , मुझे ,
    शिव बनने को ।
    बैठ किनारे ,
    सोचता हूँ मैं ,
    तुमसे है जीवन या तुमसे था कभी ?

    ©73mishrasanju

  • 73mishrasanju 126w

    मेरी ज़िंदगी है , दर्द कि तरह,
    अश्कों से लिखी इबारत कि तरह।

    सुनता हूँ अपने दिल की , धड़कन कभी-कभी,
    जैसे मातमी शहनाई कि तरह,
    यादें सताती हैं, आहट कि तरह,
    उन कदमों कि, जिनके लिये मैं कभी,
    बिखरा था बनके ओस कि तरह,
    सिमटा हूँ चिता की राख कि तरह।

    मेरी ज़िंदगी है , दर्द कि तरह.....

    खो सा गया हूँ अपने ख्वाबों में इस तरह,
    जैसे धुंध में , परछाई कि तरह,
    तपिश , सताती है चाहत कि तरह
    उस दामन कि जिसके लिये मैं कभी,
    बिखरा था, बनके गुलाल कि तरह,
    सिमटा हूँ चिता की राख कि तरह ।
    मेरी ज़िंदगी है दर्द कि तरह,
    अश्कों से लिखी इबारत कि तरह।
    तुम बिन ज़िंदगी है ..........

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 129w

    प्रेम की अनुभूति और अभिव्यक्ति में अंतर क्यूं है।
    नम हुई आँख ज़रा, फिर ये समंदर क्यूं है |

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 139w

    उलझन

    उलझे विचार धांगो से
    सुलझते ही नहीं
    लाखों बार नहीं
    बार बार कई बार कोशिश की
    पर नहीं सुलझते
    सोचता था एक सिरा जो आ जाए हाथ तो हौले हौले कितना भी लम्बा वक्त लगे
    करीने से एकसार कर गोले बना दूंगा उलझे विचारों के
    ताकि तुम्हे न हो परेशानी एक ख्याल के दुसरे ख्याल में उलझ जाने की
    तुम्हारा हर ख्याल अलहदा हो
    हर विचार सुलझा हो तो
    सहज सरल हो जाए जीवन
    पर कितना सर मारा कितनी बार आँखों को आंसुओं से धोकर साफ़ किया
    अब तो याद भी नहीं सच्ची
    समझ गया तजुर्बों से उम्र के बढ़ते अंकों से और जीवन के कम होते वर्षो से
    उलझे विचार रेशमी धागों से है जो सिरे मिल जाने पर भी नहीं सुलझते कभी
    रेशमी धागों में पड़ी गांठे कहाँ खुलती है किसी से
    उन्हें तोड़ ही देना पड़ता है
    और टूटा हुआ कुछ भी हो व्यर्थ है
    चाहे रिश्ते हों या धागे
    विचार हो या ह्रदय
    सब अर्थहीन
    ©73 mishrasanju

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  • 73mishrasanju 141w

    मैं कोई सूफी नहीं तुम भी पैग़मबर नहीं
    पाप क्या है पुन्य क्या है आप ही समझाईये .
    वक्त कम है जो बचे हों वो गिले कर लीजिये
    आप की मर्जी है फिर जाईये न जाईये .
    भूल कर कल के दुखों को आज को अपनाइये
    रोने को दुनियां पड़ी है ,आप मुस्कराइये

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 154w

    कब ये देह त्यागू, शिशु सा मुस्कुराऊँ में.....
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......
    असीमित स्वप्न जो कल तलक,आँखों में पले थे.....
    आज हो विकल आहों से चले,.....
    में निशब्द,मौन,निरर्थक प्रश्नों में उलझा रहा,...
    सामने मेरे ही,मेरा हल निकलता रहा,...
    .अब ये हाल है.....साँसे भी भारी, मृत्यु ये तेरी आभारी,
    ले चल कहीं दूर,जहाँ पुनर्जन्म हो मेरा,
    इस रात के बाद हो नूतन सवेरा,......
    कब ये देह त्यागू,शिशु सा मुस्कुराऊँ में......
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......

    ©73mishrasanju


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  • 73mishrasanju 159w

    पेशानी की सिलवटों पे मेरी गौर ना करो,
    ग़ुम हूँ ख्यालों में तुम्हारे यूँ शोर ना करो।

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 160w

    रचनाकार: दुष्यंत कुमार


    कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
    कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

    यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
    चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

    न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
    ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

    ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
    कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

    वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
    मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

    जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
    मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

    मयस्सर=उपलब्ध

    मुतमईन=संतुष्ट

    मुनासिब=ठीक
    प्रस्तुति :- संजय मिश्रा

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  • 73mishrasanju 162w

    रिश्ते


    महके
    मन मेरा,
    मोगरे से रिश्ते,
    मेरे अपने मेरे पास,
    मत महक मन खोखले रिश्ते

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 163w

    हाँ ! अभी शेष है
    -----------------
    शेष है ह्रदय में स्पंदन अभी ।
    शेष है सहमा हुआ सा निश्छल प्रेम ।
    शेष है डरी हुई संवेदना
    सुनता है मन उजड़े ह्रदय की वेदना ।
    शेष है सुन्न होती चेतना ।
    शेष है भंगुर होता विश्वास ।
    शेष हैं जड़ें , सूखते वृक्ष की ।
    कान बहरा चुके आश्वासनो से अब।
    नही सुनपाते कान चीखें ,
    भीड़ में मारे गए मासूमों की,
    बिलखती विधवा और बच्चों की।
    नही सुनपाते कान ,
    आवाजें टूटती चूड़ियों की ।
    नही सुनपाते कान ,
    चीखें ,चीत्कार,
    बलात्कारियों की हवस की शिकार
    अबोध बच्चियों ,अबलाओं की।
    नहीं सुनपाते कान ,
    धर्मांध भीड़ के उत्पाती हल्ले की।

    शेष है आस सुखद परिवर्तन की।
    शेष हैं आशाएं सुखद अनुभूति की ।
    शेष हैं आशाएं बगीचे में बहारों के
    फिर लौटने की।
    शेष हैं आस लुभावने फूलों के फिर खिलने की।

    शेष है अडिग विश्वास
    शेष है अखंड निश्छल प्रेम ।
    शेष है मासूम सी संवेदना ।
    शेष है ह्रदय में स्पंदन अभी ।

    ©73mishrasanju

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