#yqtales

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  • rdk_quotes 1d

    What's eternal bliss?

    The taste of each drop of water when
    you are extremely thirsty.

    Fragrance of the flowers that comes
    with the early morning air.

    The taste of the food after a period of fasting.
    Smell of the soil after the very first rain.

    When that cold air touches your body
    on a sunny evening.

    The view of that evening sky.
    The beauty of the glittering stars
    on a cold night.


    Yeah the nature always find a reason
    to make you happy

    So you should be grateful to the
    mother nature.
    And it's your duty to preserve it
    for the next generation.

    Thank you!❤
    Keep spreading the happiness...
    ©rdk_quotes

  • anuradhasharma 47w

    कैसे कर लेती हो तुम,
    क्या कोई नायाब फरिश्ता हो तुम।
    खुद की भूक-प्यास, भूल जाती हो तुम।
    सांस, भी मेरे सांस के बाद लेती हो तुम।

    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    बेकार गए रुतबे तुम्हारे।
    जो काम न आ पाएं हमारे।
    झूठी शान से अच्छी,
    इमान मेरी सच्ची।
    सोचना क्या पाया ऐसे?
    खोखली खुशी के साथ जीते हो कैसे!
    किस मुक्कदर को पाना है ऐसे।





    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    ये कैसा अफसाना जनेज़ाना,
    जो बया करने जाऊं.... ए हसीना!

    देख के मेरे दिल की हालत,
    कलम-ए-स्याही भी मांगे है मोहलत ।



    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    बारिश-ए-बहार, से बेतहाशा मुझे प्यार।
    मनचली बूंदें, कराती दिल-ए-दीदार।
    बेकरार सी करू मैं इंतज़ार,
    मेरा दिल जैसे परिंदा बेसबर,
    बूंदे दे रूह को सुकु के पर।
    तौफीक़-ए-ख़ुदा ये खास,
    दिलाए हसीन एहसास।



    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    मोहलत तो दे, "ए फसाने ज़िन्दगी"।
    तैयार होऊ, नई आजमाइशों को तेरी।
    पहले वाले ज़ख्म भर जाए,
    मोहलत दे कि हम संभाल जाए।
    कुछ वक्त उल्फते- ए - ख्वाहिशों को देखूं मरते,
    और कुछ आंसू न कबूली के बाकी रखूं सीने



    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    बड़ी सस्ती जान पड़ती जनाब,
    फरेब की कीमत, बाज़ार-ए-आम।
    लेकिन हम तो गुमां कर बैठे थे!
    तुम रब की मेहर से कम न थे।
    जिस फरेब के लिए, दुनिया को कोसा किए।
    उसे ही तुम तौफा दे, मेरे जां से खेल गए।




    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    मोबाइल न हुआ, नशा हो जैसे।
    छोटे सी डिबिया ने, जहान समाया ऐसे।
    ख़ुशी-गम भी इसी से बांटे ।
    कोई और न सुझे इसके आगे।
    तो तय रहा न, नाचीज़ का दामन!
    फिर न आना,लेके खुद-ख़ुशी सा मन।


    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    इक इक लम्हा इस कदर लगे,
    कि इस लम्हे क्या कर जाऊ,
    जो चैन दे, आराम दे।
    आने वाले लम्हे का हिसाब लगाऊ,
    क्या कहूं जानू ना,
    क्या चाहूं जानू ना,
    बस इस लम्हे का इंतजाम करू।
    जो सांस लू और मैं जिऊ।
    इसे छीन लू,
    या छोड़ दू,
    इस लम्हें कुछ जादू हो,
    ज़रा लम्हें हसीन हो।
    Anuradha Sharma




    .©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    दिल ने गुज़ारिश दोबारा की,
    नई हसरतें,अरमां सजाने की ।
    लेकिन अब भी, रूह नहीं भूला।
    ख़्वाब चूर पे, दिल का विरा होना।
    मन चाहे पाकीज़ा बनूं,
    पैर में पाज़ेब पहनूं।
    बेफिक्र हो, ताल पे नाचूं।
    लेकिन, अनहोनी से सेहेम जाऊं।
    ऐसा हो फ़िर बिखर, ख़ुद से जूझ जाऊं।
    -----Anuradha Sharma





    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    रफिक़ गुफ्तगू में,
    जाने किस फिराक में!
    पूछ डाला कि कभी,
    हो सफर में तुम्हारा नाम उम्दा कभी।
    याद आएंगे हम, मशहूर होने बाद।
    हमारा पता तो मेहरूम, न हो जाएगा बाद ।
    'बिना हिचक', जवाब में ये था मेरा।
    मूहफिल्सि का दौर, तुम्हारे न रहने से है मेरा।
    चाहे मैं कितनी भी, काबिलियत कमाऊ।
    मैं कितनी भी सोहरत ,इज्ज़त ,तबीयत चाहूं ।
    शर्त ये है, तुम्हारे करीब रह कर पाऊं!
    --Anuradha sharma


    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    Pg-4
    ...........
    गमों के समंदर में, दिल डूबता नहीं था।
    रिश्तों के बंधन से, दिल बेचैन होता नहीं था।
    मासूमियत में समा को डुबाना।
    सोने के सपने में खोना ।
    बहुत भाता था मुझे वो जीना।

    बेशकीमती बचपन बहार।
    इसके आगे, दौलत-शौरात बेकार ।
    फेर दो फिर से, लड़कपन की शामे।
    सौदे बाज़ी, जवानी की करनी हो चाहे।©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    Pg-3
    .........
    रेत के टीलों पे जाना,
    घरौंदे बनाना ,बनाके मिटाना।
    खेल-खिलौनों में ख़्वाबों को पिरोना।
    गुड्डे-गुड़ियों की शादी में रोना बिलखना।

    झूलों में बैठे, हवाओं से बातें करना ।
    साईकिल से गिरना, खुद ही संभालना।
    फिर साईकिल और तेज़ चालान।
    भाई-बहनों से लड़ना, फिर साथ खेलना।
    ...........


    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    Pg-2
    ........
    काबुलीवाला आए तो इंतजार रहता,
    अम्मी की साड़ी के कोने में बंधे सिक्कों का खुलना।
    नाराज़ होने पे, अब्बू का मनाना
    स्कूटर पे बिठा के मेला ले जाना।

    गर्मी की छुट्टियों में, खेतों की सैर करना ।
    पत्थर के टुकड़ों से कैरी गिराना।
    कड़ी धूप में, मुहल्ले के चक्कर लगाना ।
    तितली को पकड़ने में सुरूर रखना।
    ...............


    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    Pg-1
    बेशकिमती बचपन-ए-बहार,
    इसके आगे दौलत-शौरत बेकार।
    फेर दो फिर से लड़कपन की शामे,
    सौदे बाज़ी जवानी की करनी हो चाहे।

    सुनू नानी से परियों की कहानी,
    उसी किस्से में मुझे बना देती वो रानी।
    सावन के पानी का जम के बरसना,
    उसपे मेरा काग़ज़ की कश्ती उतारना।
    ..........

    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    आसान नहीं, मनमर्ज़ी-ए-ज़िंदगी ।
    बरक्कत हरदम, कश्मक की ।

    कभी लगे, हावाओं का रुख ही सही ।
    जहां झोखे ले जाए, मुड़ जाऊं वहीं ।

    इन पत्तों सा मौत-ए-कफ़न पहन लूं ,
    न होंगी चाह-ए-तलब, न पूरा करने का जुनू।

    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    अक्सर, यूं होता है ।
    अच्छा इंसा, अकेला होता है।
    बात हमेशा, सच्ची जुबां से निकलती।
    इसलिए, दुश्मनों की भीड़ है होती।
    मिलते सबसे है,
    मगर, रहते अजनबी से है।

    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    दिल्लगी मुबारक, दिलरुबा!
    साथ दिल-ए-रुखसती भी ।

    तेरे नज़ारों में दिल डूबा ,
    हैं तस्सवुर का आलम भी ।

    ये दिल तुझसे जुड़ा ,
    संदूक में था कैद कभी ।

    अब ऐसा हुआ अजूबा !
    तेरी मेरी खूसबू एक हो चली ।

    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    पिटारा, मेरी नटखट ख्वाहिशों का तुमसे।
    खुशनूमा, मेरे अंदाज़ में मिश्री घुले तुमसे।
    गूंज, मेरी खामोशियों में तुमसे।
    बेबाक मेरे इरादों, में हिम्मत तुमसे।
    जहां में रंग, पर रंगधनुष तुमसे।
    पलकों में सपने, सच करने का जुनून तुमसे।


    ©anuradhasharma

  • anuradhasharma 47w

    हाथों की मेंहदी सूखी भी नहीं थीं
    रंग केहेर बन गया हो जैसे
    अभी तो डोली उठीं न थीं
    सारे कहार सर पकड़ बैठे
    श्रृंगार ने भी साथ न निभानी थीं
    वो लग रहे बेबस और फ़ीके
    आंखो से सैलाब मां बाप के न थमती
    अपनी गुड़िया को कैसे रोकें
    लड़की ख़ुद को कोस न थक रही थीं
    जो समाज घाव को बनाए और तीखे
    पंडित ने मंत्र के शुरुआत नहीं की
    अब उसे फ़िक्र दक्षिणा की अपने
    भीड़ ने उसे जीने से मनाही दी
    आवाज़ दी हाथ थमने को एक युवक ने
    फ़िर क्या कुछ बात बिगड़ी न थीं
    समाज में क्रांति लायी इंसा के सोच ने


    ©anuradhasharma