geet_001

सफ़र में है

Grid View
List View
Reposts
  • geet_001 19w

    हम ने लिखा भी उसके लिए जिसने
    कभी पढ़ने की कोशिश नही की
    ©geet_001

  • geet_001 61w

    और फिर गायब हो जाएंगी दुनिया से सभी भावनाएं
    बचेंगे,केवल दिन
    विशेष दिन!
    ©geet_001
    (सभी को मुबारक हो सभी दिन
    विश्व मानवीय दिवस से लेकर स्वतंत्रता दिवस तक
    सभी को मुबारक हो जीवन का प्रत्येक दिन
    प्रेम बांटते रहिए..)
    साथ की मुबारक हो संविधान दिवस(26 नवंबर)

    --------------------------------------------------------------
    @amateur_skm @mittal_saab @jiya_khan @dipps_ @sanjay_kumr

    Read More

    और फिर दिन ढल गया
    मनुष्यता,
    एकता,
    समानता,
    बंधुत्व,
    प्रेम,और
    जीवन की सभी भावनाओं को समेट पोटली में बांध,
    संभाल कर
    रख दिया जाता है अलमारी के किसी कोने में।
    फिर किसी विशेष दिन
    उनका प्रयोग करने के लिए।
    ©geet_001

  • geet_001 66w

    एक अधूरी कविता का अंश...
    आशा है..कभी यह कविता पूरी कर पाएंगे...
    (गलती के लिए माफ़ी..)
    @amateur_skm क्योंकि इस बार आपने(#abhivyakti90) कोई शीर्षक नहीं दिया..तभी से मेरे मन ने 'शीर्षक हीन' से संबंधित कुछ लिखने का सोच लिया(जोकि पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसा लग रहा है) ।सोचा तो मन ने था..पर सजा मुझे मिल गई��अब इसके अलावा कहीं ओर काम करने के लिए मेरे दिमाग ने सीधा इन्कार कर दिया। और हमसे यह कविता अबतक पूरी नहीं हो पाई...कभी कोई विचार बगावत करने लगता है तो कभी कोई प्रेम की पूजा,कभी कोई विचार बाकी कविताओं का वकील बन उनकी पैरवी करता है तो कोई मुझसे ही सवाल। ख़ैर उमीद है, कभी ना कभी तो मैं इसपर कुछ लिख पाऊंगी।
    आपको बहुत सारा धन्यवाद इस विषय से संबंधित मेरी सारी बकवास सुनने और साथ ही अपनी रुचि दिखाने के लिए भी।
    और अब हम आपसे लगे हाथ माफ़ी भी मांगते है..क्योंकि अबतक हम इस कविता को पूरा नहीं लिख पाए(सभी बकवास के लिए भी माफ़ी सर जी)।आपके आशीर्वाद से हम एक दिन जरूर इसे पूरा लिख पाएंगे....
    बाकी सभी लोगों से भी मैं माफ़ी चाहती हूं..
    इस पोस्ट के माध्यम से आपको परेशान करने के लिए

    Read More

    प्रश्न होती है
    शीर्षकहीन कविताएं
    मनुष्य के अस्तित्व पर
    जो नाम के सिवाय कुछ नहीं!
    ©geet_001

  • geet_001 66w

    कॉलेज के द्वितीय वर्ष में ये पंक्तियां लिखी थी,जब ऑनलाइन गेम्स के ऊपर storyboard बनाने का असाइनमेंट दिया गया था।
    इन्हें लिखने के बाद जब एक बार पढ़ा,तब हजारों विचार फ़िर आ खड़े हुए मेरे सामने।
    ज़िन्दगी,जो एक छोटे से डिब्बे में क़ैद होकर रह गई है।बच्चो से लेकर बड़ों तक,सभी इसके मायाजाल में फंसे हुए है।सुबह मुर्गे की बांग या चिड़िया की आवाज़ सुनकर नहीं,कभी अलार्म बंद करने तो कभी इस मोबाइल की स्क्रीन को सुबह 3 बजे बंद करके रखने से होती।
    हम सभी storyboard तैयार करते समय अपने विचार कभी रंग की डिब्बी एक दूसरे को पकड़ाते हुए,कभी बोर्ड पर कील ठोकते हुए,तो कभी आस पास जो कूड़ा हम फैला चुके थे उन्हें समेटते हुए व्यक्त कर रहे थे।कोई अपनी कहानी बताता कि वो भी मोबाइल में घुसी रहती है तो कोई बदलाव की।नेहा ने तो आगे तक कि तैयारी करते हुए कहा,'मैंने अपने बच्चों को घर से धक्के मार कर बाहर निकल देना है कि है जाओ बाहर जाकर कूदो ये फोन में नहीं घुसना..वो लोग बाहर खेलेंगे ओर मै चैन से नींद पूरी करूंगी।' उसके ये कहते ही हम ज़ोर से हॅस पड़े।काम ज्यादा था,ओर समय कम इसलिए हम लोगों ने इसपर ज्यादा चर्चा ना करते हुए,काम ज़ारी रखा।
    हम लोगों ने सोचा तो था कि हम फोन में नहीं घुसा करेंगे पर..हम आज भी उसी में कैद है। फिर चाहे लॉकडाउन की शुरुआत में सुबह 'ऑनलाइन क्लास ज्वॉइन करलो guys' वाला मेसेज हो या फिर वीडियो कॉल।इंस्टाग्राम पर meme शेयर करने हो या फिर हर दूसरे दिन व्हाट्सप्प पर हमारा रिजल्ट कब आएगा यार की चिंता एक दूसरे को बताना। सब कुछ मोबाइल से।मैंने भी सोचा था कि मैं फोन कम से कम इस्तेमाल करने की कोशिश करूंगी(जो अब भी बस सोचा ही जा रहा है)।
    खैर मै ये सब अपने मोबाइल पर ही लिख रही हूं।��


    @dipps_ @amateur_skm @mittal_saab @shiv__ @rangkarmi_anuj

    Read More

    झूले की ख़ामोशी
    बेंच की चुप्पी
    और पार्क का सन्नाटा
    सब चीख कर पूछते है
    बच्चे मोबाइल से फ्री होकर यहाॅ कब आऍगे?
    ©geet_001

  • geet_001 66w

    सीमेंट का जंगल

    सीमेंट का जंगल
    खड़ा है
    मौत के टीले पर जिसके
    नीचे दबी है लाशें
    उन जीवों की
    जिनके आशियानें उजाड़
    निर्माण हुआ खंडरों का
    इनमें सुनाई देती है चीखें
    उनके मधुर संगीत की
    जिन्हे खा गई
    लाउडस्पीकर के पीछे से आती
    विकास की दलील
    जो उतनी ही खोखली है
    जितना ये
    सीमेंट का जंगल
    ©geet_001

  • geet_001 67w

    एक सवाल

    आज घर में एक अलग ही रौनक थी
    नन्ही परी की आॅखे भी बस चमक रही थी
    बार बार वो दरवाज़े पर जाकर बैठ जाया करती थी
    साथ में वो अपनी गुड़िया को भी ले जाया करती थी
    ये गुड़िया उसको सबसे चहेती थी
    आखिर ये उसको उसके पापा ने जो लाकर दी थी
    इस गुड़िया से वो ढेर सारी बातें किया करती थी
    पर सुबह से वो एक ही बात कहे जा रही थी
    'मेरे पापा आएंगे ढेर सारे खिलौने लाएंगे
    तेरे लिए एक घर भी मंगाया है
    जिसे हम दोनों को मिलकर सजाना है'
    पास बैठी उसकी दादी इन बातों को सुनकर हॅस दिया करती थी
    आखिर वो भी तो अपने बेटे की याद में आंचल बिछाए बैठी थी

    हफ्ते पहले आई चिट्ठी में उसके आने की खबर थी
    और इस खबर को खुशी पूरे मोहल्ले ने मनाई थी
    खुशी की घड़ी काफ़ी नजदीक थी और इसकी
    आवाज़ आज रसोईघर से आ रही थी
    वो नन्ही परी भी उम्मीद लगाए बैठी थी
    पापा उसके गाड़ी में आएंगे
    कंधे पर बैग और हाथ में खिलौने लिए उसे ज़ोरो से आवाज़ लगाएंगे
    पर जब गाड़ी घर के पास आई
    सारी खुशी कहीं चली सी गई
    गाड़ी में कुछ पॉच लोग थे
    कंधे पर बैग नहीं,वो कॉफीन लिए उतरे थे
    ये देख बूढ़ी मां जोरों से रोई थी
    पर पास खड़ी नन्ही परी की आंखें तो किसी को खोज रही थी
    रसोई का चूल्हा कुछ ठंडा पड़ गया
    जो शोर था चहल कदमी का सन्नाटे में तब्दील हो गया
    घर की बहू काॅफिन से लिपट कर रो रही थी
    पर पास खड़ी नन्ही परी चुप चाप खड़ी सब देख रही थी
    उसकी आॅखों में जो चमक थी वो सवालों में बदल गई थी
    सब लोग क्यों रो रहे है वो ये समझ ही ना पा रही थी
    छोटे छोटे कदम रख वो थोड़ा आगे बढ़ी
    पास खड़े वर्दी वाले अंकल से वो धीरे से बोली
    'अंकल इस डिब्बे में क्या है और मेरे पापा कहां है?'
    चुप्पी लगाए सिपाही वो बच्ची को देखता रहा
    फिर हाथ पकड़ उसका बड़े अफ़सर के पास ले गया
    मासूम सी आवाज़ में बच्ची ने फिर पूछा
    'दादा जी आप तो आ गए पर... पापा को कहां छोड़ आए हो और यहां सब लोग रो क्यों रहे है?'
    इतना सुन उन्होंने परी को गले लगाया
    और आंसू आँखों में रोक बस इतना ही बोला
    ये जो डिब्बा है उसे कॉफिन कहते है
    और ये आंसू गौरव के आॅसू है
    तेरे पापा अब शहीद हो चले है
    वो भारत माता की गोद में जा चुके है।
    ©geet_001

  • geet_001 67w

    धुंधली रोशनी

    मनुष्य ने हमेशा ऊंचाई को छूना चाहा।
    उसकी कल्पनाओं में था,
    पर्वत की सबसे शीर्ष चोटी पर खड़ा होना।
    धरती से कोसों दूर,
    बादलों के पार खुले आसमान में
    एक आज़ाद पक्षी की तरह उड़ना।
    धरती पर रह रही भीड़ से अलग,
    दूर अंतरिक्ष में स्थित
    एक चमकते तारे सा चमकना
    जिसकी ऊर्जा, उसके
    अनोखे होने का प्रमाण देती हो।

    करोड़ो मील दूरी का सफ़र करके आती
    यह रोशनी, सतह से
    टकराकर लौट जाती है।
    नीचे रह जाता है अंधेरा।
    ये प्रकाश,
    नहीं दिखा पाता,
    आसमान में उड़ रहे पक्षी को।
    ज़मीन पर उलटे पड़े,
    एक कीड़े को।
    जो अभी जूतों तले रौंदा गया है।
    छटपटा रहा है,
    फिर से रेंगने को।
    ये प्रकाश पार नहीं कर पाता
    काले बादलों से घिरी,
    पर्वत की चोटी को।
    ये प्रकाश,
    उतर नहीं पाता
    मन की गहराई में।
    ©geet_001

  • geet_001 69w

    मजबूरी के हाथों
    सच बिक जाता है
    ईमान के दाम पर
    ©geet_001

    #hindiwriters #hindiurdu #sahitya #twoliners #sach #jhoot #khreedar #gareebi #majbori
    @dipps_ @shiv__ @aquariansoul199 @aaditi_ @journey_of_life

    Read More

    'किसी' के सच को खरीद लिया जाता है
    'किसी' के ईमान को बेचकर
    ©geet_001

  • geet_001 69w

    हमने लिखा भी उसके लिए
    जिसने कभी पढ़ने की कोशिश नहीं की
    ©geet_001

  • geet_001 69w

    श्रृंगार क्या है?
    क्या तन का श्रृंगार ही श्रृंगार है?
    क्या सिर्फ,ये पुरुषों को रिझाने के लिए है?
    क्यों कोई लड़का श्रृंगार नहीं कर सकता?
    श्रृंगार बुरा या समाज की सोच?
    मन का श्रृंगार,१६ श्रृंगार से सुंदर है।
    मन से किया श्रृंगार,१६ श्रृंगार का आधार है।
    श्रृंगार,किया जाता है ईश्वर का।
    मन से।
    श्रृंगार,है सबका हक।

    #umeed57 #hindiwrites
    @amateur_skm @dipps_ @journey_of_life @aaditi_ @shiv__

    Read More

    श्रृंगार

    श्रृंगार
    एक ऐसी क्रिया
    जिसकी आड़ में
    समाज छुपाता है
    अपने कु-कर्मो को।
    श्रृंगार
    एक ऐसी क्रिया
    जिसको नाम दे फ़र्ज़ का
    होता है एक स्त्री का शोषण।
    श्रृंगार
    एक ऐसा बोझ,
    जिसकी सजावट तले,
    दब जाती है स्त्रियां।
    बलि चढ़ जाती है
    तमाम बालिकाओं की ख्वाहिशें।
    श्रृंगार
    एक ऐसा हक
    जिसे छीन लिया जाता है,
    एक विधवा से।
    श्रृंगार
    एक ऐसी क्रिया
    जिसकी जरूरत है सिर्फ स्त्री को?
    क्या कोई विधवा, स्त्री नहीं?
    ©geet_001