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  • gunjit_jain 3h

    All the best 12th walo��❤️��

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    फ़क़त दहलीज़ पे दिल की, फ़िज़ाओं की ज़रूरत है,
    ज़मीं के चंद हिस्सों में, हवाओं की ज़रूरत है,
    यहाँ मेरी परीक्षा का सुनो यह दौर जो आया,
    मुझे अब आपकी थोड़ी, दुआओं की ज़रूरत है।
    ~गुंजित

  • gunjit_jain 4d

    @rani_shri ��दुख, दर्द, कष्ट, पीड़ा, यातना, वेदना


    यूँ न छेड़ो हमें, हम सताए हुए हैं

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    Rani di:- कुछ लोग कहते हैं कि वो हमको झेलते हैं

    Me:-
    बताए क्या तुम्हें अब हाल दिल का आज "गुंजित"
    तुम्हारे साथ में अब ग़म हमारा भी यही है।

  • gunjit_jain 1w

    पैहम- लगातार
    जीस्त- ज़िन्दगी

    ❤️✨अगर पढ़ ही लिया है तो ज़रा खुलकर मुस्कराओ❤️

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    मुस्कान का आलम हो, खुशियां यहाँ पैहम हो,
    ये जीस्त है दो पल की, दो पल में गँवानी है।
    ~ गुंजित जैन

  • gunjit_jain 2w

    कुछ यूं ही

    मुस्तैद- तैयार
    शब- रात
    शैद- फ़रेब/छल

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    निगाहों में सितारों को कहीं मुस्तैद रक्खा है,
    ये गालों पे शबों की चाँदनी को क़ैद रक्खा है,
    लबों पर मुस्कुराहट का ये आलम जो सजाया है,
    मेरी ये मौत रक्खी है, या कोई शैद रक्खा है।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 3w

    कुछ यूँही, कुछ यही❤️

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    ग़ज़ल बनने को कुछ मतले.......... कहीं तैयार बैठे हैं,
    मुसलसल वक़्त की क़िल्लत फ़क़त मुझको सताती है।

    ~ गुंजित

  • gunjit_jain 4w

    दीपावली की अनंत शुभकामनाएं✨❤️��

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    दीपावली

    अंधकार यह दूर हो, उज्ज्वल हो हर राह।
    मन के भीतर हो सदा, सुंदर ज्योति प्रवाह।।

    दीपों से जगमग रहें, अंतर मन के द्वार।
    सदा प्रज्ज्वलित हो धरा, सुखी रहे संसार।।

    नष्ट सभी के बैर हों, हो बस मेल मिलाप।
    आई है दीपावली, दूर हुए संताप।।

    हिय से मंगल कामना, हो सुख शांति समीप।
    जीवन में हों आपके, खुशियों के ही दीप।।

    हर घर में हो सर्वदा, माँ लक्ष्मी का वास।
    शुभ हो यह दीपावली, करूँ हृदय से आस।।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    #humari_deepawali_by_gjain

    *कहानी- हमारी दीपावली (भाग-2)*


    रफ़ीक़ साहब अपने गल्ले के पास बैठे ये सब सुन रहे थे। मुकेश के माता-पिता के इंतज़ार का एहसास, उन्हें अहमद के बचपन में, उनके किये इंतज़ार में हो गया था। माता-पिता के भावों का कोई मज़हब कहाँ होता है! इसी ख़याल के साथ उन्होंने ठान लिया कि इस साल की दीपावाली पर एक बेटा अपने माँ-बाप से दूर नहीं रहेगा।
    अहमद से कहकर उन्होंने कुछ दो सौ रुपये के मिट्टी के दीपक और मुकेश के लिए गाँव की एक टिकट मंगवाई। "ज़रा मुकेश भाईजान को बुलाकर लाना" कहकर उन्होंने अहमद से मुकेश को बुलाने को कहा।
    "भाईजान, अब्बा बुला रहे हैं!" अहमद ने इतना कहाँ ही था कि मुकेश अपने सेठ जी के आदर में एकाएक खड़ा हो गया और बाहर की तरफ़ आने लगा।

    "जी...जी सेठ जी कहिए" एक काले कपड़े से हाथ पौंछता हुआ वो सेठ जी के नज़दीक आकर खड़ा हो गया।
    रफ़ीक़ साहब ने गल्ले को खोलने के बाद कुछ पैसे और पास रखे दीपकों को आगे बढ़ाते हुए कहा, "अब तो तेरी दीपावाली आ रही है, ले ये पैसे रख मेरी तरफ़ से मिठाई के लिए।"
    "मेरी दीपावाली नहीं आ रही सेठ जी" मुकेश सरलता से बोला, "हमारी दीपावाली आ रही है। आपकी, मेरी, हम सबकी दीपावाली।"
    "हाँ बिल्कुल, हम सबकी दीपावाली" रफ़ीक़ साहब कुछ अधिक खिलकर मुस्कुराने लगे "आई-बाबा को भी मेरी तरफ़ से मिठाई और दीपावाली की बधाई देना।"
    "जी सेठ जी, पार्सल करवा दूंगा। इस बार काम ज़्यादा है तो गाँव तो अगली बार ही जा पाऊं शायद" कहता हुआ मुकेश फ़िर वो परिचित मुस्कान लिए मुस्कुराने लगा, वही पीड़ा और बिखरी उम्मीद भरी मुस्कान!
    "अरे पागल, पार्सल क्यों। सुबह सात बजे की ट्रेन है, यह दीपावाली आई-बाबा के साथ मनाना" कहते हुए उन्होंने टिकट मुकेश की तरफ़ बढ़ाया, और मुस्कुराने लगे।

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    "पर सेठ जी..." इसके आगे मुकेश कुछ कहता उतने में खाँ साहब ने बात काटते हुए कहा, "पर-वर कुछ नहीं। सेठ मैं हूँ और मैंने तुझे जाने को कहा है, बात ख़त्म। यहाँ का काम हम देख लेंगे। तू टिकट रख और आई-बाबा को खुशखबरी दे दे।"
    रफ़ीक़ साहब फैसले के पक्के आदमी थे, वे टस से मस होते नज़र नहीं आ रहे थे।
    मुकेश की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। वो सेठ जी के आशीर्वाद लेने को झुका ही था कि सेठ जी ने उसको ऊपर उठाकर गले लगा लिया और बोले "चल अब जा, ट्रैन सुबह जल्दी है तो फटाफट तैयारी कर घर जाकर।"

    अली, अहमद और रफ़ीक़ साहब को दीपावाली की बधाई देकर वो निकल ही रहा था कि सेठ जी ने आवाज़ लगाई,
    "अच्छा सुन, आई के हाथ का हलवा लाना मत भूलना। आख़िर दीपावाली तो हमारी भी है भई!" इतना कहते हुए सेठ जी हँसने लगे। "जी सेठ जी, हमारी दीपावाली!!" मुकेश की आँखें नम थीं, और चेहरे पर मुस्कान थी। मगर इस बार एक नई, उज्ज्वलित मुस्कान, ठीक दीपावली के दीपकों की तरह।
    © गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं, एवं दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं��✨ आपका जीवन सदैव रोशन रहे।
    इसका अगला भाग भी साथ ही अगली पोस्ट में पोस्ट कर रहा हूँ।

    #humari_deepawali_by_gjain



    *कहानी- हमारी दीपावली (भाग-1)*

    शहर के पुराने बाज़ार की एक सँकरी गली की कई दुकानों में रफ़ीक़ खाँ साहब की चूड़ियों की एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी। छोटी वो केवल नाम की ही थी, वरना वहाँ छोटी-बड़ी, तरह तरह की सुंदर सुंदर चूड़ियों की भरमार थी। दूर दूर से लोग उस गली में उनकी दुकान की उन छोटी गोलाकार अद्भुत कलाकारी, अर्थात चूड़ियों को खरीदने आते थे।

    रफ़ीक़ साहब आस-पास के सभी दुकानदारों में ख़ुदको सबसे अधिक भाग्यशाली माना करते थे। भाग्यशाली मानने की वजह उनकी प्रसिद्धि को न समझा जाए, इसकी असल वजह थे उनकी दुकान में काम करने वाले दोनों कारीगर। वे स्वयं को दुनिया के दो सबसे बेहतरीन कारीगरों से घिरा मानते थे। उनकी इस बात से उनके सभी साथी दुकानदार भी सहमत थे। वाकई, अल्लाह ने रफ़ीक़ साहब को दो चुनिंदा हीरों से नवाज़ा था। एक का नाम था मुकेश, और दूसरा रफ़ीक़ साहब के दूर के रिश्तेदार का लड़का, अली।
    आने वाले हर ग्राहक से रफ़ीक़ साहब इन दोनों की तारीफ़ करने में कभी नहीं चूकते थे। जैसे ही किसी ग्राहक को कोई चूड़ी पसंद आई, वैसे ही उसको बनाने वाले के गुणगान शुरू, "अल्लाह का रहम है, हमें कारीगरों की शक़्ल में खरा सोना बख़्शा है!"
    और उनके दोनों कारीगर भी इसी तरह अपने सेठ जी का बहुत आदर और गुणगान किया करते थे।

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    रफ़ीक़ साहब का एक बेटा भी था, अहमद। कुछ उन्नीस वर्ष की आयु होगी उसकी! कभी कभी रफ़ीक़ साहब के दोनों हीरों से काम सीखने वो अपने अब्बा के साथ आ जाया करता था, तो कभी त्योहारों के समय दुकान में बढ़ते काम को देखकर अब्बा का हाथ बटाने।
    इसी विचार के साथ, इस बार दीपावाली के सात-आठ दिन पहले से वो रोज़ अब्बा के साथ आने लगा।

    दीपकों के इस पावन त्योहार से पहले ही उनकी दुकान ग्राहकों से रोशन थी। यकीनन सबको थकान बहुत होती थी, मगर लक्ष्मी जी भी अक़्सर मेहनतकशों के घर रहना ही पसंद करती हैं।

    एक रोज़ मुकेश और अली अपनी कारीगरी में लीन हुए ही बातें कर रहे थे। मुकेश अपने गाँव की दीपावाली के बारे में अली को विस्तार से बता रहा था। और अली अपने चेहरे पर एक खूबसूरत चाव लिए उसे सुना जा रहा था।
    "पिछले दो सालों से कोरोना के चलते गाँव नहीं जा पाया, अगर भगवान ने चाहा तो इस बार दीपावाली पर आई-बाबा के पास गाँव जाऊंगा" कहता हुआ मुकेश मुस्कुराने लगा। उस मुस्कुराहट में एक पीड़ा साफ़ दिखाई पड़ रही थी और साथ ही उसमें एक बिखरी उम्मीद नज़र आ रही थी।
    "बिखरी" इस बार इतनी अधिक ग्राहकी की वजह से। भला इतने काम को बीच में छोड़कर कोई कैसे जाए!

    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    शब्द लिखना तो कई लोग सिखा देते हैं मगर शब्दों को पूजना, उनकी साधना करना हर कोई नहीं सिखा सकता�� आपके जन्मदिन पर आपको नमन करता हूँ सर, सदा आपने मेरा मार्गदर्शन किया उसके लिए जितनी बार वंदन करूँ कम है��जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं सर, सादर चरण स्पर्श���� आपको समर्पित एक छंद सृजन��
    @sanjeevshukla_ ����

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    *स्रग्विनि छंद*
    रगण × 4

    दिव्य आनंद के, काव्य के, छंद के,
    सर्वदा भूप हैं, गीत के, गान के।
    मुख्य स्तंभ हैं, लेखनी वृंद के,
    भक्त साहित्य के, अब्धि हैं ज्ञान के।।

    मातु हिंदी सदा, विश्व प्रख्यात हो,
    रम्य साहित्य भी, विश्व को ज्ञात हो।
    है यही कामना, आपकी सर्वदा,
    दीप्त हिंदी रहे, मध्य में भान के।।

    सर्वदा दक्ष हैं, पूर्ण निष्पक्ष हैं,
    लेखनी है धरा, आप ही वृक्ष हैं।
    हैं पिता तुल्य भी, नेह बाहुल्य भी,
    हैं सुगंधों भरे पुष्प उद्यान के।।

    पुष्ट आधार है, भाव विस्तार है,
    लेखनी का सदा आप से सार है।
    सर्वदा ही सिखाया मुझे आप ने,
    शब्द को पूजना, देवता मान के।।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 5w

    जन्मदिन मुबारक हो दीपसी❤️ @dipsisri

    इतनी देर से लिखा वो भी कुछ अच्छा नहीं लिख पाया, माफ़ी चाहता हूँ। कल से दिमाग में सिर्फ़ इंटीग्रेशन चल रहा है�� तोहफ़े में कैलकुलस की क़िताब दूंगा तुम्हें����

    पी.एस. :- जाने क्यों जन्मदिन के शुभकामना के साथ मैं कुछ न कुछ प्रकृति का जोड़ ही देता हूँ, हर बार का हो गया है�� स्ट्रेंज।
    *पर ये बाबू राओ का स्टाइल है*

    केक भिजवा देना��

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    जब दरवाज़े से ठीक सात कदम दूर खड़े बूढ़े, पुराने नीम के पेड़ की सख़्त डालें देखता हूँ तो एक अलग सा सुकून महसूस होता है। सुकून की वजह उस डाल को, या उसपर लहराती पत्तियों को न समझा जाये, सुकून की असल वजह तो वहाँ अक़्सर आकर बैठने वाली चिड़िया है।

    चंचल और भोले मन की वो चिड़िया मानो रोज़ मुझसे कुछ कहती है। हर रोज़ कुछ शब्द उसकी चोंच में कहीं उलझ कर रह जाते हैं, मगर फ़िर भी निरन्तर कहने की कोशिशें करती रहती है।

    शायद वो चिड़िया मुझे उस खुले आसमान की कुछ बातें बताना चाहती हो, जिसमें पर फैलाकर उड़ना उसको सबसे अधिक प्रिय है। या शायद उन बादलों की कुछ कहानी सुनाती हो जिसमें वो हमेशा गोते खाती है।
    या शायद मुझे कुछ कविताएं कहती हो। वो कविताएं जो वो ख़ाली वक़्त में अक़्सर लिखती रहती है, इन मुस्कुराती पत्तियों को देखकर!

    जानती हो?
    जब हम इत्मीनान से अपने आस-पास देखें तो हमें अपनी ज़िंदगी के हर किरदार कहीं नज़दीक ही मिल जाते हैं। किसी भी रूप में, किसी भी शख़्स में, मगर हम उन्हें देख ही लेते हैं।

    ठीक वैसे ही, जैसे मैं उस चिड़िया में कहीं तुम्हें देख पाता हूँ।
    जो बीतते वक़्त के साथ भी ख़ुद में एक शरारती मासूमियत आज भी छिपाए रखती है। जो कविताओं के अपार आकाश में हमेशा उड़ने को आतुर रहती है, जिसको शब्दों के बादलों में गोते खाना सबसे अधिक प्रिय है, जो अक़्सर कविताएं कहती रहती है। और इन सबसे ज्यादा, जो हमेशा मुझे मेरे नज़दीक ही कहीं नज़र आती है।

    खैर! बहनों को ऐसा ही होना चाहिए।
    है न?

    मौजूदगी तुम्हारी उस मासूम चिड़िया की आहट जैसी है,
    ये कविताएं बिल्कुल उस मधुरता भरी चहचाहट जैसी है,
    एक भाई और एक बहन के रिश्ते की, यह मजबूत डोर
    चेहरे पर खुशियों भरी एक खूबसूरत मुस्कुराहट जैसी है।

    ~ गुंजित