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  • iam_vaibhav07 1d

    "उसका नाम!"

    आज बहुत दिनों बाद मैंने अपनी कलम उठाई, क्योंकि शायद मुझे कुछ याद आ गया। अब अगर आप मुझसे पूछें कि, "ऐसा क्या याद आ गया?" तो मैं अपनी सबसे ख़ूबसूरत मुस्कान सामने रख कर उसका नाम ले लूँगा। और मेरा उसे इस तरह याद करना बड़ा दिलचस्प होता है, दरअसल उस एक क्षण में मैं कुदरत की हर ख़ूबसूरती का स्मरण कर लेता हूँ, फ़ूल, पत्तियाँ, पेड़, पौधे, परिंदे, सिर के उपर नीले आसमान की मखमली चादर, यह सब मुझे उसके होने का एहसास दिलाते हैं, मानों वो यहीं कहीं आसपास हो, और मुझे उसका स्मरण करते हुए निहार रही हो, और मन ही मन खुशी के मारे नाच रही हो। मेरे घर के पीछे एक बागीचा है जिसमें काफ़ी पुराना एक दशहरी आम का पेड़ है, जिसपर अक्सर मैं और वो बैठ कर आम खाते थे, आज वो मुझसे दूर, किसी दूसरे शहर में अपना आनंदमय जीवन व्यतीत कर रही है। उसे अपनी माँ के हाथ की खीर बहुत पसंद थी, तो हर शनिवार की शाम जब भी उसके पापा दूसरे शहर से अपने घर आते तो उसकी माँ अपनी लाडली बेटी और उसके पिता के लिए स्वादिष्ट खीर बना देती थी। हर शाम हम दोनों उसके घर के सामने वाले पार्क में बाकी दोस्तों के साथ लुका-छुपी खेला करते थे। औरों को खोजने में मुझे थोड़ी समस्या होती थी मग़र उसे खोजना मेरे लिए बड़ा आसान होता था, मैं उसे उसकी मन को शांत करने वाली खुशबु से खोज लेता था, और वो हर बार मुझे सवालों से बांधने का प्रयास करती कि आखिर कैसे खोजता हूँ मैं उसे, और मैं हर बार उसकी तरफ़ देखता और मुस्कुरा कर कहता, "जादू से!" और यह सुनकर वह ग़ुस्से से लाल हो जाती। अब आप ही बतायें, यह जादू नहीं तो और क्या है, जो कक्षा की एक मेधावी छात्रा, काशी के एक आवारा लड़के से स्वार्थहीन प्रेम करती है, और उसके साथ अपना कीमती समय बांटती है। आज वो दूसरे शहर में अपनी वकालत की पढ़ाई कर रही, अब हम पहले की तरह मिल नहीं पाते मगर फोन पर बात करते वक़्त आँखें बंद कर ख़ुद को एक दूसरे के पास महसूस कर लेते हैं, और तब सुकून का एक अलग और मुलायम सा एहसास होता है, और फिर हम चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान लिए सो जाते हैं।

    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 11w

    Hi! कैसी हो? उम्मीद करता हूँ अच्छी होगी। तो बात ये है कि आज बहुत दिनों बाद मुझे हमारी वो तस्वीर मिली जो हमने हमारी पहली मुलाकात पर खिंची थी, मेरा Samsung का फोन था जो काफ़ी पुराना था, 8 mega pixel के कैमरे वाले फोन से शायद मैंने पहली बार अपनी पूरी तस्वीर ली थी, यूँ तो मैंने अपनी बहुत तस्वीरें खिंच रखी थी उससे मग़र ना जाने क्यूँ वो सारी तस्वीरें अधूरी लगती थी, इस बार शायद तुम्हारे साथ की वज़ह से तस्वीर और ख़ुद मैं पूरे लग रहे थे। 30 June को जब हमारी पहली बात हुई तो उसकी शुरुआत छोटी सी अनबन से हुई थी, फ़िर हमारी बातें होने लगीं, हाँ मैंने कुछ गलतियाँ की थी शुरुआत में जिस वज़ह से शायद आजतक तुम्हारा भरोसा नहीं जीत पाया। पर तुमने मुझे तब माफ़ कर दूसरा मौका दिया, और इस बार मैंने तुम्हें शिकायत का एक मौका नहीं दिया। धीरे-धीरे हम बेहद करीब आ गए ऐसा मेरा मानना था, क्योंकि शायद तुमने हमारे बीच हमेशा से सीमा बना रखी थी जो मुझे नहीं दिखती और उस सीमा को ना तुमने पार किया ना मुझे करने दिया। मैंने अपने कल्पनाओं में एक ऐसी दुनिया बना ली थी जिसमें सिर्फ़ हम हैं, वहाँ तुम मुझे मुझसे ज़्यादा प्यार करती थी, जल्द ही हम अपने रिश्ते को एक नाम देने वाले थे मग़र कल्पनायें अगर पूरी होने लगेंगी तो उन्हें कल्पनायें क्यूँ बोला जाएगा। मुझे ना जाने कब तुम्हारी आदत सी लग गयी, मेरी सुबह भी तुम्हारे ख़ाब देखकर होती थी और रात तुम्हारी तस्वीर देख कर, मैंने अपने कीमती समय की सूची में तुम्हारा नाम जोड़ दिया था। मैं तुम्हें अपनी कल्पना की हर तस्वीर सुनाता था मग़र वो तुम्हें मज़ाक़ लगता था जो मैं तुम्हें पाने के लिए करता था, मग़र मैं अपने हर एक शब्द की ठीक उस प्रकार ज़िम्मेदारी लेता था जैसे मेरे पिता ने मेरी ली थी। मैं चाहता तो पूरा लेख लिख देता, मग़र मैं रिश्ते की कहानी सुना रहा हूँ, अपने जज़्बात नहीं। तो कहानी काफ़ी छोटी थी हमारी मग़र मेरे अकेले की मोहब्बत कहीं ज़्यादा है।

    ��वैभव

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    "मेरी कल्पनाएँ"

    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 14w

    कल मेरे तमाम उलझे ख़्यालों में एक ख़्याल ऐसा आया जो शायद पहले कभी ना आया, न शायद आगे कभी आएगा। यकीन मानों मैं ऐसा सोचकर बेचैन हो गया और ख़ुद को कोसने लगा कि, "मैं आख़िर ऐसा सोच भी कैसे सकता हूँ।" कल्पना करो, क्या होता अगर मैं एक आवारा आशिक़ की तरह तुमसे अपनी मोहब्बत का इज़हार करता और डरा धमका कर तुम्हें 'हाँ' करने पर मज़बूर कर देता, और मेरे इस दबाव और उत्पीड़न के बावज़ूद तुम मना कर देती, सोचो अगर मैं बाकी ज़ाहिल आशिक़ों की तरह तुम्हारा पीछा करता और तुम्हें असुविधाजनक स्तिथि में डाल देता। ये सब करके मैं तुम्हें हासिल तो कर लेता मग़र तुम्हारे प्यार से हमेशा के लिए वंचित रह जाता। पता है, ज़रूरी ये नहीं कि तुम मेरे साथ ही रहो, ज़रूरी ये है कि तुम हमेशा खुश रहो भले ही तुम किसी और के साथ रहो। तुम्हारे दूर जाने या पास रहने से मेरी मोहब्बत की सीमा कम नहीं होगी, मुझे आज भी तुमसे उतनी ही मोहब्बत है जितनी पहले इज़हार के वक़्त थी। आख़िरी बार जब हमारी बात हुई थी तो तुमने मुझसे एक वादा लिया था कि, 'अगर किसी ने मुझसे अपनी मोहब्बत का इज़हार किया तो मैं उसे हाँ कर उसके साथ एक रिश्ता शुरू कर दूँ', मग़र तुम ही बताओ क्या उस लड़की के साथ ऐसा करना सही रहेगा कि तुम्हारे वादे को निभाने के लिए मैं ना चाहते हुए भी उसके साथ रहूँ, नहीं न? ऐसा करके मैं उसे उसके हक़ का प्यार कभी नहीं दे पाऊँगा और शायद वो भी इस बात से कभी ख़ुश नहीं रहेगी। तो बेहतर यही होगा कि मैं मेरे हाल पर ही रहूँ क्योंकि मैं ख़ुश हूँ, तुम्हें सोच कर मैं कविताएँ लिखता हूँ, और हर पंक्ति में तुम्हें याद करता हूँ। हाँ मैं तुमसे आज भी मोहब्बत करता हूँ, और यक़ीनन एक दिन तुम्हारे वादे को भी पूरा करूँगा, अगर तुमसे बढ़कर किसी से मोहब्बत हुई तो, तबतक के लिए ऐसे ही कविताएँ लिखता रहूँगा और तुम्हें याद करता रहूँगा।

    ~वैभव

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    "उलझे ख़्याल"

    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 16w

    सुनो! इश्क़ है हमें तुमसे, और इतना कि ख़ुद हम नहीं जानते, और देखो अब ये बेतुके सवाल न करना कि, "क्यूँ है?", "कैसे है?" क्योंकि तुम्हारे इन सवालों का  ज़वाब नहीं है हमारे पास, और सच बताएँ तो हमने कभी ज़वाब ढूँढ़ने की ज़हमत ही नहीं की, क्योंकि हम अपनी मोहब्बत को किसी 'कारण' के दायरे में नहीं बाँधना चाहते हैं। हम चाहते हैं हमारी मोहब्बत की गौरैया 866 किलोमीटर की दूरी तय करके हर रोज़ तुम्हारे कमरे की खिड़की पर बैठे जिसे तुम हर सुबह आँख खोलते ही देखो। हमारे तुम्हारे बीच की ये दूरी सिर्फ़ शारीरिक रूप से है, मानसिक और ज़ज़्बाती रूप से तुम हर वक़्त हमारे बगल में बैठी रहती हो और अपना सिर हमारे कंधे पर रख कर ये कहती हो कि, "क्यूँ न हम यूँ ही सारी उम्र साथ रहें" और हम तुम्हारे बालों को अपनी उँगलियों से तुम्हारे कानों के पीछे लगाकर हमेशा कहते हैं और हमेशा कहते रहेंगे कि, "यार हम इसी के लिए तो बने हैं"।

    ~वैभव

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    "सुनो!"

    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 25w

    रात को उठकर चाय बनाती,
    माँ तु कितनी चिंता करती थी,
    हम इस दौड़ में पीछे ना रह जायें,
    इस बात से तू भी डरती थी,
    लिखा पढ़ी में दाम लगा,
    और काम मिला सरकारी में,
    तेरी तस्वीर सम्भाले रखे हैं,
    हम अपनी उस अलमारी में।

    सरकारी पर्चा देखकर तेरे,
    चेहरे पर हरियाली थी,
    जो सबसे ज़्यादा गूंजी थी,
    माँ वो तेरे हाथ की ताली थी,
    घर दुआर सब छोड़कर अपना,
    आ गए हम तैयारी में,
    तेरी तस्वीर सम्भाले रखे हैं,
    हम अपनी उस अलमारी में।

    नौकरी की फर्माइश थी,
    कि व्यस्त रहें हम काम में अपने,
    बिस्तर डालकर सोते थे तो,
    दिखते थे बस काम के सपने,
    वो वक़्त यहाँ पर मिलता नहीं,
    जो बीता था बेकारी में,
    तेरी तस्वीर सम्भाले रखे हैं,
    हम अपनी उस अलमारी में।

    धूल में पड़े वो दस्तावेज़,
    हम जब संख्या में लगवाते थे,
    भूले भटके कितने नोट,
    फाइलों में मिल जाते थे,
    तनख्वाह अपनी सीमित थी,
    बोनस लगे त्यौहारी में,
    तेरी तस्वीर सम्भाले रखे हैं,
    हम अपनी उस अलमारी में।

    फ्राइड राइस खाने वाला लड़का,
    दाल चावल में खुश रहता है,
    ज़ुबां पर लगाकर संकोच का ताला,
    बस आँखों से ही कहता है,
    कि, स्वाद हाथों का तेरे नहीं,
    दफ्तर की तरकारी में,
    तेरी तस्वीर सम्भाले रखे हैं,
    हम अपनी उस अलमारी में।

    ✒️वैभव

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    "तस्वीर"
    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 26w

    जिन हाथों को पकड़ हम अस्सी के किनारे चले थे,
    तू एक बार जा तो सही, मैं वो हाथ भूल जाऊँगा!

    तेरी जिस बात ने मुझे तेरा दीवाना बनाया,
    तू एक बार जा तो सही, मैं वो बात भूल जाऊँगा!

    जिन हालातों में मैं तेरे साथ खड़ा रहा,
    तू एक बार जा तो सही, मैं वो हालात भूल जाऊँगा!

    चमकती चाँदनी के तले हम साथ बैठते थे ना,
    तू एक बार जा तो सही, मैं वो रात भूल जाऊँगा!

    और जिस मुलाकात पर मैं खुशी से पागल हो गया,
    तू एक बार जा तो सही, मैं वो मुलाकात भूल जाऊँगा!

    ✒️वैभव
    @iam_vaibhav07

  • iam_vaibhav07 28w

    चाय और सुट्टा

    तुम अंग्रेज़ी Whiskey का खंबा हो,
    मैं देसी ठर्रे की बोतल हूँ,
    तुम DU की शहज़ादी हो,
    मैं विद्यापीठ का लोकल हूँ,
    तुम घाट इस पार की भीड़ हो,
    मैं उस पार का सन्नाटा हूँ,
    तुम लक्ष्मी चाय की चुस्की हो,
    मैं तलब लगा एक सुट्टा हूँ।

    तुम Girls Squad की leader हो,
    मैं लौंडों में भौकाली हूँ,
    तुम रात की प्यारी चाँदनी हो,
    मैं ढ़लते सूरज की लाली हूँ,
    तुम Domino's में लगती Tax हो,
    मैं कपड़ों पर मिलता बट्टा हूँ,
    तुम लक्ष्मी चाय की चुस्की हो,
    मैं तलब लगा एक सुट्टा हूँ।

    तुम बड़े Restaurants की Chilli Potato,
    मैं सड़क पर बिकता समोसा हूँ,
    तुम McDonald's की burger हो,
    मैं Kerala Café का डोसा हूँ,
    तुम राजभोग सी मीठी हो,
    मैं इमली जैसा खट्टा हूँ,
    तुम लक्ष्मी चाय की चुस्की हो,
    मैं तलब लगा एक सुट्टा हूँ।

    तुम Zara की Shopping हो,
    मैं Sale में मिलता कपड़ा हूँ,
    तुम आपस में होते समझौते सी,
    मैं लौंडों में होता लफड़ा हूँ,
    तुम James Bond की Pistol सी,
    मैं मिर्ज़ापुर का कट्टा हूँ,
    तुम लक्ष्मी चाय की चुस्की हो,
    मैं तलब लगा एक सुट्टा हूँ।

    तुम बहती गंगा सी शीतल हो,
    मैं एक झरने का पानी हूँ,
    तुम किसी लेखक की उपन्यास हो,
    मैं ख़ुद की लिखी कहानी हूँ,
    तुम हरिश्चंद्र सी सच्ची हो,
    मैं भोला सा एक झूठा हूँ,
    तुम लक्ष्मी चाय की चुस्की हो,
    मैं तलब लगा एक सुट्टा हूँ।

    ~वैभव

  • iam_vaibhav07 29w

    "एक शब्द"

    एक शब्द से शुरुआत करते हैं,
    कविता में कुछ जगह छोड़ देते हैं,
    और उन जगहों को तेरे नाम से भरते हैं।

    आगे हो या पीछे, प्रेम तेरे नाम के साथ रहेगा,
    तू जैसे जैसे कविता पढ़ती जाएगी,
    अश्रु हर पंक्ति के साथ बहेगा।

    कविता में लिखे हर शब्द तुझे कुछ और सुनाई देंगे,
    मुझे प्रेम तुझसे आज भी है, हर शब्द तुझसे यही कहेंगे।
    मेरे यार दोस्त सब तुझे भूल जाने को कहते हैं,
    अरे वही, जो मेरे हर ऊंच-नीच में मेरे साथ रहते हैं।

    और सच बताऊँ तो तुझे भूलना तो मैं भी चाहता हूँ,
    मग़र तू मेरे कविताओं की पंक्तियाँ बन गयी है,
    तेरी सारी बातें और यादें मेरे कलम की स्याही बन गयी है।

    अक्सर तेरा ज़िक्र महफ़िल में मेरे यार कर देते हैं,
    मैं मना भी करूँ तो मेरी ग्लास जाम से भर देते हैं,
    यहाँ भी मैं अपनी कविता तेरे नाम से पढ़ता हूँ,
    फ़िर बोतल उठा कर जाम अपने हाथ से भरता हूँ।

    -वैभव

  • iam_vaibhav07 31w

    मेरे ख़याल

    एक वक़्त था जब मैं इस मोह माया की नदी को पार कर उस पार जाना चाहता था, जहाँ मुझे कोई नहीं जानता होगा, जिसके लिए मैंने तेरे प्यार की कश्ती का सहारा लिया इस बात से बिल्कुल अनजान की उस कश्ती में छेद था। नतीजा मैं गिर गया और आजतक उसी मोह माया की नदी में गोते खा रहा हूँ। तैरना तो आता है मग़र किस ओर जाना है कुछ पता नहीं। सोचता हूँ धीरे धीरे उस तारे की ओर चलूँ जिसे हम दोनों छत पर साथ बैठ कर देखते थे, मग़र रास्ते से अनजान हूँ तो इस बात से डर लगता है कि कहीं दुबारा उसी छोर पर ना पहुँच जाऊँ जहाँ से मैंने अपना सफ़र शुरू किया था।
    कहते हैं कि, "डूबते के लिए तिनके का सहारा भी बहुत है", पर सोचने वाली बात ये है कि मुझे तो तेरे प्यार का तिनका भी नसीब नहीं हुआ। प्यार करना तो बहुत दूर की बात है, मेरे हिस्से तेरी नफ़रत भी नहीं आयी, अगर आती तो कम से कम उसी बहाने तू मुझे याद तो करती। ख़ैर जो हुआ सो हुआ, अब तो किसी को अपना हाल-ऐ-दिल सुनाता हूँ तो मुझे शायर बोल दिया जाता है, महफ़िलों में मेरी शायरीयों की फर्माइश होने लगी है, अगर कोई पूछता है कि, "कौन है वो " तो जवाब में मैं बस मुस्कराता और समझने वाले समझ जाते हैं कि, 'वो मेरी इसी मुस्कान की सबसे ख़ूबसूरत वज़ह थी '। अब उम्मीद दूसरी कश्ती के आने की है जो मुझे निकाले मग़र लेकर कहाँ जाए, कोई अंदाज़ा नहीं। और दुआ यही है कि इस बार कश्ती खाली रहे मग़र खोखली नहीं।

    -वैभव
    ©iam_vaibhav07

  • iam_vaibhav07 32w

    ये प्यार मोहब्बत की बातें अकेले में हो जायें तो ठीक है,
    शोर शराबे में इज़हार की ख़नक ग़ुम हो जाती है।

    -वैभव