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  • iamankyt 10w

    She: Sometimes I get the feeling you resent me?

    I said I was angry, and then I found out that my anger is based solely on my own interests. Within seconds, my anger killed itself, saying that my personal interests can never belittle you.

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 12w

    मुद्दत-ख्याल

    कभी जो मैं अपने हौंसले बदहाल हो जाऊँ
    कभी जो मैं तेरी बातों से निढाल हो जाऊँ
    कभी जो तू खामोशी से कहकशाँ के दामन में छिप जाये
    कभी जो मेरे जिस्म से सहरा लिपट जाये
    कभी मैं जो मुनासिब हो वही करूँ
    कभी जो मैं सच के आगे झूठ करूँ
    कभी जो मैं बसों को छोड़कर पैदल ही गाँव चल लूँ
    कभी जो तुझे देख कर मैं अपनी आँखें मल लूँ
    कभी जो आसमान में सितारा टूटता नज़र आये
    कभी जो मैं क्या माँगू यही समझ ना आये
    कभी जो तुम्हें सागर में ऊँचा उछाल दिखे
    कभी जो मेरी बातों में तबाही का उबाल दिखे
    कभी जो मैं छत से दौड़कर हवाओं में उड़ना चाहूँ
    कभी जो मैं उड़ते परिंदों के पैर पकड़ना चाहूँ
    कभी जो तराशूं मैं बादलों में सीरत कोई
    कभी जो ढूँढूँ मैं पानी में रंगत कोई
    कभी जो मैं धुँए को और धीमा करना चाहूँ
    कभी जो मैं नशे में हर लम्हा रहना चाहूँ
    कभी जो मुझे कुछ भी मेरा हिसाब ना रहे
    कभी को मुझको तारीखें भी याद ना रहे
    कभी जो मैं तरस खाकर अपनी तन्हाई मिटाऊँ
    कभी जो घर से निकलकर शज़र को गले लगाऊँ
    कभी जो मुद्दतों में भी कुछ बदला ना हो
    कभी जो अभी तक हमारा फैसला ना हो

    तुम किस हाल में रहोगी तब
    मैं किस खुशी में रोऊँगा तब
    क्या तब भी मुझसे आकर तुम जुनून की बातें करोगी
    क्या मैं तब भी अपनी बेपरवाही की अना अदा करूँगा
    क्या तुम पूरी तरह से खो चुकी होगी तब तक
    क्या किसी तरह मैं तुम्हें पा चुका होगा तब तक

    मानो अगर ये चाँद ईश्वर के लिये
    चुनिंदा फिल्मों को इकट्ठा करता हो
    उनमें से एक कहानी हमारी भी हो
    तो क्या हमारे चलचित्र देखकर ईश्वर रोयेगा
    क्या वो भी सोचेगा हमें किसी तरह मिलाने की
    जैसे
    किसी फिल्म को देखकर
    उनके किरदारों को मिलाने की तड़प हम में बस जाती है।

    क्या मैं इस तरह ख्याल कर के
    तुम्हारे हिज़्र में ज़िंदगी बसर कर सकूँगा
    क्या मैं जहाँ रोज़ आग लगनी है वहाँ उस चमन में गुलाब खिला सकूँगा
    क्या किसी तरह मैं एक झूठ को ही मैं अपना सच बना सकूँगा।
    या फिर
    तुम जो हो, जहाँ हो, खुश हो, इतनी सी दिलासा देकर
    मैं अपने हर शौक से मुँह फेर लूँगा।

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 13w

    कुछ हो तो भी ठीक या कुछ ना भी हो
    तुमसे तो होगी बात भले तुम ना भी हो

    मिट जाये तेरे साये आँखों से तो क्या
    आओगे याद तुम, तसव्वुर ना भी हो

    कर लेगी सफर तय अपने हिसाब से
    खाली हो कश्ती जो नाविक ना भी हो

    कैसी अदा है ये रोने की तेरी जुदाई में
    सोचा तुझे उदास, तू उदास ना भी हो

    मान लूँ सच जो कहो मेरे इंतखाब को
    वो तो सब भूल थी जो भूल ना भी हो

    बढ़ने दो सब्र का दरख़्त बहार के बिना
    मिट्टी बँधी तो रहेगी जो सब्ज़ ना भी हो

    दिल बहलाने को टहलता हूँ मैं यहाँ वहाँ
    बच्चा तो रोता ही है अगर दर्द ना भी हो

    वो परेशाँ कर मुझे हँसकर कहते थे कि
    हम तो करेंगे ये काम, ज़रूरत ना भी हो

    मैं आता हूँ मिलने जल्दी बहाने से कोई
    वो करते हैं देर अगर मशरूफ ना भी हो

    शायर की उदासी, हारने की सोच नहीं
    रहता है ख़ून गरम जो तपन ना भी हो

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 15w

    आईने में कहाँ मिलता हूँ खुदको
    अपने निशान में ढूंढता हूँ खुदको

    अँधेरी रात में तेरी याद का बरगद
    शमा जला कर रोकता हूँ खुदको

    कर कर छेद अब कश्ती में अपनी
    वाज़िब वाज़िब सोचता हूँ खुदको

    ज़ख्मों से बने सितारें उभरते जब
    बेसूरत सियाह लगता हूँ खुदको

    जब करती हो मीठी बाते मुझसे
    शहद की तरह चखता हूँ खुदको

    शाम टकराती है जब दरख्तों से
    बेसबब सवाल पूछता हूँ खुदको

    तुम आती हो तो खुल जाता हूँ
    वरना फक़त समेटता हूँ खुदको

    अपने ही गाँव में तआरुफ़ नहीं
    अना ये है कि जानता हूँ खुदको

    लिखता हूँ ग़ज़ल बिना लहज़े के
    कागज़ जैसा फाड़ता हूँ खुदको

    सब गँवाने का हुनर पसन्द आया
    जीत की तरह हारता हूँ खुदको

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 16w

    बस कुछ देर का मिलना है फिर तो बिछड़ जाना है
    इसमें भी ये लुकाछिपी, अरे हमने कल मर जाना है

    तुम्हीं बोलो मेरी बातों में कब इंतज़ार नहीं दिखा तुम्हें
    भला अँधेरी आंखों को कैसे उजाला भूल जाना है

    नशे में भी तुमको तो छोड़ चुका हूँ घर सलामती से
    थकान ये है कि मुझको भी तो घर वापस जाना है

    कभी सोचता हूँ तू बैठी है मेरे इंतज़ार में कहीं पर
    और कोई जो तेरे पास बैठा,तुझको सरक जाना है

    क्या बताऊँ बेबसी कि उसकी उदासी सुनकर भी
    दूर से ही मुझे बातों बातों का हौंसला रख जाना है

    इसी बहाने रुका रहता हूँ मैं तुमसे मिलने के लिये
    कि फिर मुसलसल दूर जाना है और बेहद जाना है

    खुद तुम्हें करनी होगी अब मेरी वकालत खुद तुमसे
    वैसे तो एक रोज़ सब दलीलों का रंग उड़ जाना है

    पला बढ़ा तुम्हारी याद में, शौक मुतमईन रहने का
    एक ऐसा ज़ख्म था कि मरहम में ये फन जाना है

    मुझसे क्या पूछना कि अब क्या है आगे का रास्ता
    इस फैसले के लिये अभी तो एक तूफान सजाना है

    जो बदल गया तू, मलाल है मगर सोचता भी था
    तेरे शौक ओ सूरत में रंग भरकर मैंने छँट जाना है

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 20w

    Read it after the image.

    ख़ैर जब ख़्वाब से जागा
    तो फिर से ख्याल करने लगा
    कि ये किस तरह की हालत थी
    ना तो मैं खुश था ना ही दुखी
    दरअसल मैं कहीं दिखा ही नहीं
    मानो जैसे तुझको सोचना था
    और खुदको तुझसे दूर भी रखना था।
    ये सबकुछ याद करके
    ऐसा लगता है जैसे मानो
    कोई गरीब अमीरों की बस्ती में घूमने गया हो
    जैसे कोई भाँग पीकर मेले की मस्ती में घूमने गया हो
    जैसे मैं फिर से कोई गली जबरदस्ती में घूमने गया हो।

    ©️I A M A N K Y T

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    सहरा सब्ज़ा

    मैं अपने अँधेरे से निकल कर
    जब भी तेरे साये से जुड़ा हूँ तो
    चाँदनी ने मुझे अपना सा माना है
    मैं जब भी हवाओं की नमी बनकर
    तेरे बालों पर बिखरा हूँ तो
    मौसमों ने मुझे अपना दोस्त माना है
    मैं जब भी बारिश की बूंद बनकर
    तेरी हथेली पर रुका हूँ
    तब मुझे अपनी ताज़गी का एहसास हुआ
    मैं हमेशा तुझसे वस्ल की
    अमित सम्भावनाओं में रहा हूँ
    जहाँ कभी गया नहीं
    वहाँ भी अपनी चीज ढूँढी है
    मैंने मौत के बाद भी
    तुझसे मिलने की उम्मीद ढूँढी है

    मैं ख्याल करते करते जब
    नींद के आगोश में गया
    तब ख़्वाब ने बताया कि
    तेरे इधर आने से
    सहरा में एक बस्ती बनी
    और आबाद होते चली गई
    यहाँ पर पहाड़ उठे
    खूब बारिशें हुई
    सब्ज़ा हुआ
    यहाँ आकर वो तितलियां बसी
    जो चाँद पर बैठा करती है
    यहाँ की मक्खियां
    सूरज से रस लिया करती है
    यहाँ किसी प्रकार का ना कोई बंधन है
    यहाँ की मिट्टी फरिश्तों का चन्दन है
    यहाँ ज़मीन जैसा कोई पिंजरा नहीं
    यहाँ तो पानी भी
    ज़मीन से कुछ ऊपर उठकर बहता है
    यहाँ इतनी मोहब्बत है कि
    शिकायतों को
    खुदसे ही शिकायत हो जाती है
    यहाँ की हवाएं
    जब गालों पर फूटती है तो
    तन्हाई रंग देती है
    आँखों मे रक़्स भर देरी है
    सादगी में नशा कर देती है
    यहाँ के खेल भी अलग है
    यहाँ जंगलों में
    जहाँ मुलायम घास है वहाँ
    सबको अकेला छोड़ दिया जाता है
    जो ढूंढते है यहाँ
    मुश्किल से मिलने वाले काँटे।
    इनका मानना है कि
    उन काँटो से खुदको ज़ख्म देकर ही
    तुझको बुलाया जा सकता है
    तेरा लम्स पाया जा सकता है
    मग़र हक़ीक़त शायद कुछ और ही है।
    ये काँटे दरअसल
    तूने अपने अंदर छिपा रखी वो नाराज़गी है
    जो अगर किसी को मिल जाये
    तो शायद ये पूरी बस्ती लूट जाये।
    और ऐसे ही जाने कितने राज पर
    ये पूरी दुनिया टिकी हुई है
    जहाँ अगर उजाला हो जाये तो
    उसके आगे की कल्पना
    मेरी मदहोशी के पास नहीं।
    पर्दानशीं इस राज से परे
    यहाँ सबको एक ही डर है
    वो ये कि तुझको ये लोग
    कहीं खो ना दे
    क्योंकि यहाँ पर रह रहे
    हजार साल के बूढ़े ने कहा है
    कि तू एक लापता शख़्स है
    जो गलती से इधर आ गया
    एक रोज तू अपने मुकाम पर मग़र
    चला ही जायेगा
    या वो ही तुझे यहाँ आकर ले जायेंगे।


    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 21w

    बेचैनी

    आज आ पहुंचा मैं
    उस मरकज़ पर जहाँ
    मेरे अंदर से कभी
    ज्वालामुखी खुला था
    निकले थे कई रंग और खनिज
    जैसे: जुनून, जज्बात
    ख़्वाब, ख्वाहिशें, आवारगी
    दीवानगी और भी कई सारे।
    आज आते ही एक धुन में
    भर रहा था इस मुख को
    और सोच रहा था बहुत कुछ।
    क्या ये सिर्फ मेरी ही आदत है
    कि जब
    सफर शुरू होता है तो
    बड़े जुनून और खूब ख्याल होते है
    मग़र मंजिल आते तक
    जुनून को शिकवें डंसते जाते है
    लगता है जैसे
    मैं यहां आया ही क्यों
    अब यहाँ कभी नहीं आऊँगा
    अब इनके साथ कभी नहीं रहूँगा।
    और फिर लौटते वक्त तक
    सब कुछ मर जाता है
    बस खामोशी से लौटता रहता हूँ
    शनासा मोड़ की दिशा में।।
    कभी लगता है
    आख़िर मैं हूँ ही क्या
    असुरों की कहानी में
    कभी पूरा ना होने वाला यज्ञ
    या वो वरदान जिसे पा तो लिया
    मग़र कभी काम में ला न सका।

    मुझे यूँ तो अपनी काबिलियत पर
    बहुत यकीन है मग़र
    अब खुद को आसानी से
    नाकारा कह देता हूँ
    कस देता हूँ
    कितना ही कड़वा तंज खुदपर।
    और हँसता हूँ खुद ही पर
    फिर सोचता हूँ काश
    कुछ नहीं तो
    मैं एक मज़ाक ही होता।
    कभी लगता है कि
    मुझसे आश्ना होते ही
    हर चीज गलत हो जाती है
    मैं समन्दर में चलूँ तो
    हवाये पलट जाती है

    कभी लगता है कि जैसे
    मेरे चेहरे पर
    डाइवर्जन का ठप्पा लगा है
    जिससे हर आती चीज़
    पहले ही मुड़ जाती है
    और पीछे से टक्कर
    मारती रहती है
    अतीत से आती गाड़ियाँ।

    कभी लगता है कि
    मैं हाइवे के किनारे
    लेटा हुआ
    अँधेरे का गम मनाता
    धूप सेंकता हुआ
    वो शख़्स हूँ जिसने
    खुद अपनी कलाई से
    आँखे ढक रखी है।

    कभी सोचता हूँ कि काश
    कोई काटकर अलग कर दे
    मेरे मन के भीतर उलझे धागों को।
    मग़र फिर ये काम सिर्फ़
    मैं ही कर सकता हूँ
    लेकिन जब भी
    इन्हें काटने जाता हूँ तो
    एक जुनून आता है
    फिर से इन्हें सुलझाने का
    और दो चार पुरानी उलझने
    तो सुलझा लेता हूँ मग़र
    दस बीस नई उलझने बड़ा देता हूँ।

    काश जम जाये अब
    लावा ज्वालामुखी पर
    इस तरह जैसे
    जम जाता है ज़ख्म पर
    खून का थक्का।

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 22w

    जवाब

    जितने बड़े बड़े ख़्वाब देखे मैनें
    मैं उतना ही छोटा रह गया
    एक यार से मैंने कहना भी चाहा
    मैं बहुत टूटा हुआ हूँ
    मग़र फिर सोचा
    कोई क्या ही समझेगा
    ख्वाबों की शिकायत को
    सो सुनता ही रहा उसके तकल्लुफ़ को
    मैंने कुछ इशारा भी किया
    अपनी बात जताने का
    मगर उसकी नासमझ
    मुझे चुप रहने की समझ दे गई।
    और अगर बताता भी तो
    वो मुझे ही कसूरवार समझता
    और लगभग मैं ही कसूरवार हूँ
    इस बात में कोई शक नहीं।
    मैं कहना तो नहीं चाहता मग़र
    कहीं न कहीं खुद पर
    थोड़ी सांत्वना चाहता था
    कि खुदसे तो अब
    खुदको सांत्वना देने का दम नहीं।

    मैं लोगों से तो अब भी
    बड़ी बड़ी बातें कर सकता हूँ
    मग़र खुद से किस गवाही पर करूँ।
    यानी जैसे घर के बाहर तो
    अब भी सरकारी खम्भों से
    रोशनी थी मग़र घर के अंदर
    तो कोई ऊर्जा नहीं।

    मैं अब हर तरह से झुकने को तैयार हूँ
    अपना हर कद बौना करने को तैयार हूँ
    मैं अब खुद अपने आप को
    गाली देने के लिये तैयार हूँ
    मैं तो कुछ ना होने को भी तैयार हूँ

    क्यों दिल के हाथ पैर नहीं होते
    क्यों ये मुझे छोड़ कर निकल नहीं जाता
    क्यों कोई मेरी अक्ल को गुलाम बना नहीं जाता
    क्यों मेरा स्वार्थ
    मेरी नैतिकता से जीत नहीं जाता
    क्यों मैं बला का बुरा हो नहीं जाता
    क्यों
    क्यों
    क्यों।।

    मग़र मेरी ये सब हालतें भी बौनी है
    मेरी एक आदत के सामने।
    हिम्मत ना हार सकने की आदत
    मैं हिम्मत हारकर भी
    हिम्मत हार नहीं पाता।
    चाहे मैं अपने आप में
    कोई सुधार कर ही ना पाऊँ
    और उम्र भर नाकामयाब रह जाऊं
    मग़र फिर भी
    हिम्मत कभी हार ना सकूँगा।


    शायद कभी मुमकिन हो सके
    मेरा वो जवाब बनना
    जो आज उठते सवालों को
    शर्मिंदा कर दें।

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 22w

    झूठा है अगर सवाल तो झूठ ही कहूँगा
    आप पूछोगे जो हाल तो झूठ ही कहूँगा

    रूह ने जो उसकी खबर दी वही सच है
    ये आँखों देखा हाल तो झूठ ही कहूँगा

    दशाएँ बदली, बिछड़ने वाले मिल गये
    किताबों में ये कमाल तो झूठ ही कहूँगा

    करके वादा फिर कभी मिलने का मुझसे
    जो लोगे मेरा ख्याल तो झूठ ही कहूँगा

    किसी दिन आकर गिनाकर अपनी यादें
    पूछोगे मेरा मलाल तो झूठ ही कहूँगा

    बहक कर अग़र करूँगा खुल के बात
    कहोगे दिल सँभाल तो झूठ ही कहूँगा

    मुन्तज़िर पेड़ परिंदों का देख जो कहोगे
    खूबसूरत है ये डाल तो झूठ ही कहूँगा

    छू ना सकी कश्ती चाँद चाँदनी रात में
    समन्दर का उछाल तो झूठ ही कहूँगा

    नहीं हुई जो बर्दाश्त शब ए हिज़्र मुझसे
    गुजरा हुआ विसाल तो झूठ ही कहूँगा

    ©️I A M A N K Y T

  • iamankyt 23w

    किसी के नाम से अपना नाम क्यों करें हम
    गैरों के बहाने से अपना काम क्यों करें हम

    ठीक है मौजूद फिर गुमनाम ही कहीं पर
    आबरू ए खामोशी बदनाम क्यों करें हम

    जो हम में निहाँ है किसी को तो पता है
    ये खूबसूरती खुदसे सरेआम क्यों करे हम

    हाँ तू छिपाता है तुझ तक आने का रास्ता
    पर सफर ये मज़ा है आराम क्यों करें हम

    खेलें तेरे शहर आकर कोई ना आता खेल
    मुखातिब तेरे कोई इंतजाम क्यों करें हम

    किसी की बातों में आकर, कसमें खाकर
    अपने जी का हाल यूँ तमाम क्यों करें हम

    निभायेंगे साथ आपका बेसबब भी मग़र
    है गफलत आपमें तो सलाम क्यों करें हम

    नहीं तूफान को ना मुझे तूफान से फर्क़ अब
    इस हाल में नज़र सर ए बाम क्यों करें हम

    हमको तो फ़िराक़ में यह तसव्वुर सताया है
    बंदिशों में यूँ खुद पर लगाम क्यों करें हम

    ज़ुबान से तो नहीं कहा मुझे चले जाने को
    इशारों में कहा है तो औहाम क्यों करें हम

    ©️I A M A N K Y T