kanchanjha

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think positive, dream positive, act positive

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  • kanchanjha 1w

    चांद मेरा खो गया है, इस खुले आकाश में।
    और हम रातों को जागे, फिर मिलन की आस में।

    हंस रही है रात मुझपर ,देख दीवानापन मेरा
    दिल मेरा हर रात रोयें,विरह के अहसास में ।

    फिर मिलेगा मुझसे आकर चाँद आधा ही सही।
    चल रही है धड़कने अब तक इसी विश्वास में।

    फिर ग्रहण जाये न इस चांदनी में चांद को।
    आ छपा लूं चांद तुझको,अपने दिल के पास में।


    ©kavya_sansar

  • kanchanjha 2w

    जी भर के तुम मुस्कुरा लो ,कि फिर कभी वक्त मिले न मिले।
    हर रंज गम भुला दो ,कि फिर कभी वक्त मिले न मिले।

    मन मैल को मिटाकर,शिकवे गिले भुलाकर,
    सबको गले लगा लो कि फिर कभी वक्त मिले न मिले।

    ये वक्त सम सरित है,अनमोल हर एक क्षण है।
    निज जिंदगी संवारो,कि फिर कभी वक्त मिले न मिले।
    ©kanchanjha

  • kanchanjha 2w

    कुछ लोग बस अपना काम निकलने तक ही अपने होते हैं।
    ©kanchanjha

  • kanchanjha 15w

    ऊँची कद वाले लोग

    छोटी छोटी चीजें,
    देख कहाँ पाते हैं,
    ये ऊँची कद वाले लोग।
    अक्सर नीची कद वालों पर,
    हावी हो जाते हैं,
    ये ऊँची कद वाले लोग।
    अक्सर जब भूल जाते हैं ,
    झुकना ,अहम में चूर,
    ये ऊँची कद वाले लोग।
    खड़े जमीन पर हैं,
    भूल जाते हैं जब,
    ये ऊँची कद वाले लोग ।
    गिरते हैं ठोकर खाकर,
    आहत होकर,
    ये ऊँची कद वाले लोग।
    आ जाते हैं पूर्ण रूपेण,
    पुनः धरातल पर,
    ये ऊँची कद वाले लोग ।
    कद कितनी भी ऊँची हो,
    नाम ऊँचा हो,शान ऊँची हो।
    पर याद रहे,
    झुकना जरूरी है अपनी शान,
    ऊँची बनाये रखने के लिए।
    ©kavya_sansar

  • kanchanjha 30w

    मैं बीमार हूँ

    हाँ मैं बीमार हूँ,
    गम्भीर बीमारी है ,
    मुझे सच बोलने की,
    ईमानदारी की ,वफादारी की।
    असह्य पीड़ा देती है, दिल को,
    कभी कभी, मेरी यह बीमारी,
    पर क्या करूँ, मजबूर हूँ,
    क्योंकि जन्मजात है,
    मेरी यह असाध्य बीमारी
    क्योंकि कहीं नहीं मिलती,
    इस मर्ज़ की दवा ।
    वैसे तो मुझसे अधिक,
    दूसरों को तकलीफें देती हैं,
    मेरी यह अनोखी बीमारी।
    कभी सबसे अलग ,
    बिल्कुल अकेले कर देती है।
    हाँ मैं बीमार हूँ,
    और मुझे जान से भी,
    ज्यादा प्यारी है,
    मेरी यह पुरानी बीमारी।

    कंचन झा,दिल्ली

  • kanchanjha 30w

    पेड़

    मैं तरुवर परिधान प्रकृति का,धरती हरित बनाऊं।
    कोकिल गायन करे बैठ द्रुम, उपवन रमन बनाऊं।

    मंद समीर बहे तन छूकर,झूमें कोमल पात हमारे।
    सावन की रिमझिम निज डाल पे ,झूला तुझे झुलाऊं।

    दुर्लभ जड़ी बूटियों से तन व्याधि सकल तव मेटूं मैं,
    क्षुधा तृप्त हो,खा मम फल तव काया स्वस्थ बनाऊं।

    काया जर्जर शून्य प्राण जब,तेज हीन गतिहीन, शिथिल,
    देऊं सहारा चलन फिरन ,तव कर कुटी बन जाऊँ

    हर विष दूषित वातावरण से, प्राण वायु संचार करूँ मैं,
    परहित हेतु खड़ा मही ऊपर,फिर भी काटा जाऊँ।
    ©kavya_sansar

  • kanchanjha 31w

    पिता

    पिता के पास नहीं होता आँचल,
    मां की तरह,
    जिसमें छुपाकर वो हमें ,
    हर खतरे हर मुसीबत से बचा ले,
    शायद इसलिए वो हमें स्वयं ,
    हर खतरे, मुसीबतों से डटकर,
    सामना करना सिखाते हैं।
    पिता के पास नहीं होता आँचल,
    माँ की तरह,
    जिससे कि वे अपने आँसू पोंछ सकें ,
    शायद इसी लिए वे अपनी हर तकलीफ,
    हर किसी से छुपा लेते हैं,
    और कभी आँसू नहीं बहाते।
    नहीं होता माँ की तरह कोमल,
    पिता का हृदय ,
    क्योंकि कोमल लता को ऊपर उठने के लिए,
    होती है ऐसे सहारे की जरूरत
    जो सख्त हो और सीधे खड़ा हो,
    शायद इसलिए हमारे पिता भी,
    ऊपर से जरा सख्त होते हैं,
    ताकि मजबूती मिल सके,
    हमारे परिवार के नाजुक रिश्ते को।
    पिता अपने औलाद के लिए,
    स्वयं को कितना बदल लेता है।
    मन मौज सी जिंदगी जीने वाला,
    परिवार के लिए जीना सीख लेता है।
    एक लापरवाह, गैर जिम्मेदार लड़का,
    जब पिता बनता है।
    जिम्मेदारियों के बोझ तले दबता है,
    सारी ख्वाहिशे दफन कर मन के कोने में कहीं,
    बच्चों की ख़्वाहिशें पूरी करने को ,
    अथक श्रम करता है।
    स्कूल बंक करने वाला वो नादान लड़का,
    बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए,
    न जाने कितना मेहनत करता है।
    समय अधिक नहीं दे पाता अपने परिवार को,
    क्योंकि उनकी खुशी के लिये दिन रात ,
    संघर्ष करता है।
    एक पिता अपने बच्चों की ,
    आन,बान और शान होता है।
    सच पूछो तो पिता का दिल भी,
    मां के ही समान होता है।
    माँ यदि गोद लेती हैं,
    तो पिता छत्रछाया देते हैं।
    पिता के प्यार की तुलना जग में,
    कोई नहीं कर सकता,
    यदि मां दौड़ना सिखाती है,
    तो पिता अंकुश लगाते हैं।
    सही राह पर पर चलना,
    पिता जी सिखाते हैं।
    हर पल करते हमारे भविष्य की चिंता,
    इसलिए तो ईश्वर का रूप हैं पिता।
    पिता के बिना जिंदगी दुखों का दरिया है।
    पिता हमारे जिंदगी में उम्मीद का दिया है।



    ©kavya_sansar

  • kanchanjha 32w

    चेहरे खुली किताब

    चेहरे खुली किताब हैं, पढने वाला हो अनुभवी।
    इन चेहरे ने बना दिया कितने लेखक,शायर, कवि।
    लिपि बद्ध नहीं, भावबद्ध होते हैं ये चेहरे।
    इन चेहरों में छिपे हैं, न जाने कितने भाव गहरे।
    जो चेहरे की भाषा को समझ जाता है।
    वही दिल के राज पढ़ पाता है।
    कोई मासूम चेहरा बयां करता है अनमोल बचपन।
    मस्ती भरे दिन बेफिक्र सा जीवन।
    खिलखिताते अधर शिशु की किलकारी।
    नन्हें फूल से महकती हर फुलवारी।
    जवानी के दिन बताता है माथे का पसीना।
    कितना मुश्किल है सबको खुशी देकर जीना।
    कुछ शरारती और कातिल नज़र
    घायल करते हैं दिल जिगर।
    जब जब भर आता है आखों में पानी।
    आँसू बताता है दुख भरी कहानी।
    जब किसी चेहरे का रंग उतर जाता है।
    इंसान ठगा ठगा सा नज़र आता है।
    कुछ चेहरे गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं।
    इंसान ही इंसान को छलते हैं।
    चेहरे खुली किताब हैं, पढने वाला हो अनुभवी।
    इन चेहरों ने बना दिया कितने लेखक शायर और कवि।

  • kanchanjha 32w

    "कागज के फूल "

    खुद को कागज का नहीं, बागों का फूल बनाओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    खुद को कागज़ का नहीं बागों का फूल बनाओ।
    कागज के फूल कब बहार लाते हैं।
    बारिश की एक बूँद भी न सह पाते हैं।
    उड़ जाते हैं जरा सी हवा के झोंके से,
    छोटी सी चिन्गारी भी झेल कहाँ पाते हैं।
    तुम स्वयं को इतना हल्का न बनाओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    न मंडराती तितली कागज के फूलों पर,
    न करते भ्रमरे गुंजन कागज के फूलों पर।
    कब हरियाली आती कागज के फूलों पर।
    न सजता शबनम कागज के फूलों पर।
    जिंदगी की असलियत न नजरें न चुराओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    कागज के फूलों को इत्र से मंहकाया जाता है।
    बागों के फूल इत्र बनाया जाता है।
    परवश होता है कागज का फूल सदा ,
    बहारों का फूल स्वतंत्र झूमता गाता है।
    खुद को किसी के हाथों की कठपुतली न बनाओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    बहारों का फूल पानी में नहीं गलता है।
    कंटक शैया पर भी ,दिल से मुस्कुराता है।
    डाली से जुड़कर बाग को मंहकाता है
    टूट भी गया तो किसी के काम ही आता है।
    झूठे आडम्बर से, खुद को बचाओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    कागज का फूल बस नजरों को भाता है ,
    बागों का फूल दिल बाग बाग कर जाता है।
    इसीलिए तो पाता है स्थान देवों के शीश पर,
    किसी की अंतिम यात्रा पर भी फूल चढ़ाया जाता है ।
    बाहरी चोले को नहीं ,मन को खूबसूरत बनाओ।
    खुल कर जियो खुले आसमां तले,
    बंद कमरे में खुद को गुलदस्ते में न सजाओ।
    ©kavya_sansar

  • kanchanjha 32w

    यमुना के किनारे, एक पीली सुनहरी शाम।
    राधिका किशोरी संग रास रचाते हैं।

    भाल तिलक पीत,कुंडल वसन पीत।
    पीली बांस वंशी धुन मन हर जाते हैं।

    पीली चुनर राधा,पीत पट ओढ़े श्याम।
    लागे श्याम शशि पीत ज्योत में नहायो हैं।

    श्याम को वरण श्याम, चंद्र मुख भानु लली।
    निरखि जुगल जोड़ी मन न अघायो है।

    पीत किरणें पड़े ज्यों कारी कालिंदी तरंग।
    लागे ऐसे चटक चुनर ललराई है।

    पीत सुमन सुरभित करे उपवन ,
    घन उडुगन पीत मुक्ता सौं सजायो।

    एक ही कन्हाई सोभै, सखियाँ हजार बिच।
    लागे ऐसे तारे बिच चंद्रमा सुहायो है।
    ©kavya_sansar