kishor634

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Ab khud-sa nahi dikhta main...tune kya kiya...������✍️

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  • kishor634 65w

    ❤️❣️������यादें������❣️❤️
    #kavikishor #kishor_shukla10 @hindiwriters @hindiurduwriters @hindisahitya

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    यादें

    भोर में जो स्वप्न का, एक सुमधुर एहसास है,
    प्राण देती प्राण को, जो प्राणरूपी श्वास है।
    हो विदित यह सत्य कि, सबकुछ धरा रह जाएगा,
    शून्य होगी "याद" अगर, सबकुछ पड़ा रहा जाएगा।

    बाल्यकाल की चोरी हो, माँ के आंचल की कोरी हो,
    वो प्यार भरी थपकी चले, ऊपर से उसकी लोरी हो!
    ज्ञान गुरु का भरा-पूरा, तब कैसे काम में आएगा!
    शून्य होगी "याद" अगर, सबकुछ पड़ा रहा जाएगा।

    यादें पहली प्रेम की, दिल में सुकून भर जाती है,
    एक-पल देती मुस्कान, दूजे में आहत कर जाती है।
    उसके भौंहों के बीच का, टिका धूमिल हो जाएगा,
    शून्य होगी "याद" अगर, सबकुछ पड़ा रह जाएगा।

    यादें हैं एक गुरु स्वरूप, बहुतेरी बात सिखाती है,
    यादें पथों की जानकार, आगे का मार्ग दिखाती है।
    एक भूल का दंड मनुष्य, हज़ार बार भी पाएगा,
    शून्य होगी "याद" अगर, सबकुछ पड़ रह जाएगा।

    यादों को अपनी याद से, ओझल नहीं होने देना।
    पर याद रहे शोकातुर हो, एक-पल नहीं खोने देना।

    - किशोर शुक्ल
    ©kishor634

  • kishor634 66w

    ❤️सुकून❤️

    पत्थरों से उतरती सफेद नदी से लेकर,
    विशाल समुद्र के, फैलाव में ढूँढा.....!!!!
    तपते रेगिस्तानी रेतों से लेकर....
    बारिश की बूंदों के, बहाव में ढूँढा.....!!!!
    ढूँढा छितराए जंगलों के ऊँचे पेड़ों पर,
    शहर की भागदौड़, और गाँव में ढूँढा.....!!!
    ना मिला वो सुकून वो दुलार आज तक,
    जो माता के आँचल की छाँव में ढूँढा...!!
    - किशोर शुक्ल
    ©kishor634

  • kishor634 66w



    वो कपड़े जो कभी रौनक-ए-बदन थे,
    आज पड़े हैं किसी कोने में पोछे बनकर।
    जिनकी दोस्ती की मिसाल देती थी दुनिया,
    गुरुर में जुदा हैं दोनों ओछे बनकर।
    【दोस्ती में गुरुर का क्या काम】
    ©kishor634

  • kishor634 66w



    दिन-ब-दिन अपने और करीब आया करो....!!
    खुद लिए भी जिंदा हो, खुद को बताया करो.....!!
    अक्सर दूसरों के सामने मुखौटे पहनने वालों,
    कभी भीड़ से निकलकर भी, मुस्कुराया करो....!!

    ©kishor634

  • kishor634 66w



    तुझसे जबतक लोगों को........काम रहेगा,
    तबतक उनके मुँह पर तेरा.......नाम रहेगा।
    कुछ हद तक सम्मान का, लेना-देना है काम से,
    मतलब खतम हुआ तो तू....बदनाम रहेगा।
    - किशोर शुक्ल
    ©kishor634

  • kishor634 102w

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    ©kishor634

  • kishor634 104w

    विपिन सिंह "बहार" जी, आप एक अच्छे, साफ-सुथरे व्यक्तित्व हैं। आपकी लेखनी तो लाजवाब है ही, साथ ही आप एक अच्छे पाठक भी हैं। जब कोई अच्छा लिखता है तो आपको पढ़कर बहुत प्रसन्नता होती है। "अभिव्यक्ति" इस शृंखला को प्रारम्भ करने में भी आपका बहुत बड़ा योगदान है। लागातार स्वयं में सुधार लाने की प्रवृति ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है। आप यूँ ही हँसते-मुस्कुराते, कलम चलाते हमें दिखते रहें। प्रभु आपके जीवन की हर इच्छा की पूर्ति करें। आपको आपके जन्मदिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ।���������� @vipin_bahar ji

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  • kishor634 105w

    "जीवन"

    कभी चन्दन, कभी क्रंदन, कभी हो आत्म-अभिनन्दन।
    कभी दुर्भेद्य अंतर्मन..........कभी पावन कभी वंदन..!!

    कभी हर तत्त्व से ही दूर, फिरता है मेरा ये मन,
    कभी ताके है शून्य में.....नयन में घोल ले गगन..!!
    कभी दुःख-वास्तविकता हो, कभी हो कल्पना का क्षण,
    कभी प्रातः की किरणों से, चमकता है हृदय आँगन।

    कभी धरती-सा हो जाता, सहन-शक्ति समाता तन,
    कभी उपहास रत्तीभर, नहीं सहता ये अंतर्मन।
    कभी बजता बिगुल ऐसा, कि फिर आरम्भ होता रण,
    रहे जो ज्ञात नश्वरता, तो क्यों अमरत्व ढूँढता मन।

    कभी निज-भाव के आगे, त्याग देता समूचा धन,
    कभी अभिभूत धन से हो, करे निज-भाव का हनन।
    कहीं व्यापक है आलिंगन, कहीं तड़पन कहीं चुंबन,
    कहीं है प्रेम-व्यापकता, बसे कण-कण बसे जन-जन!

    कभी फिरता है सीना तान, करके वृक्ष का रोपण,
    कभी ले हाथ कुल्हाड़ी, दनादन काट देता वन..!!
    कभी कहता कि प्रेम से बड़ा, दिखता नहीं धरम,
    कभी इस्लाम को कोसे, सनातन में दिखे भरम..!!

    कभी हो वार कभी निसार, कभी खंजर कभी कंगन
    कभी टकरा भी जाता है, तेरा जीवन मेरा जीवन..!!
    यही एक सार जीवन का, कि जबतक साँस लेता तन,
    करो हर द्वेष का अर्पण, करो हर घाव का अर्पण।

    "हाँ, माना रुक गई हो श्वांस, डोलता नहीं अब तन,
    कि इससे भी बहुत आगे, तेरा जीवन मेरा जीवन..!!"
    - किशोर शुक्ल
    ©kishor634

  • kishor634 105w

    आतनिर्भर होना.... एक स्वभाव है.... एक सद्गुण है.... जिसकी आदत लगानी पड़ती है, जिसके लिए स्वयं को तैयार करना पड़ता है। ये छोटी-छोटी चीजों को मिलाकर ही तैयार होता है। इसके दो बड़े शत्रु हैं.... पहला "आलस्य" और दूसरा "आत्मसम्मान का न होना"।
    【छोटी सी रचना से शायद मैं आपतक पहुँच पाऊँ����】
    #abhivyakti06 @deepajoshidhawan @anita_sudhir @rikt__ @nema_ji @vipin_bahar

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    "आत्मनिर्भर"

    "" कभी खेत पर जाओ, किसी फसल के बिहन बो लो,
    कभी फुरसत में बैठो....मस्तिष्क के सब द्वार खोलो।
    आत्मनिर्भरता देश की, बहुत बाद की बात है,
    कभी गोतकर अपने हाथों से, अपने कपड़े धो लो। ""

    आलस्य में, या कि कहूँ परिश्रम के डर से,
    जब डोमिनोज़ का पिज़्ज़ा, "आर्डर" करते हो।
    सोचो कैसे....अपने ही अर्जन धन को साथी,
    एक झटके में आखिर, धुआँ-धुआँ करते हो।

    आत्मनिर्भर होना "व्हाट्सएप्प" पर "स्टेटस" लगाना नहीं है,
    क्यों बेवजह फ़िजूल के ज़ज़्बात भरते हो...!!
    परीक्षा से पहले कुंजी लेकर बैठने वालों,
    किस हक़ से आत्मनिर्भरता की बात करते हो!!

    बैठो कभी एकांत में, और पूछो खुद से,
    क्या मौत से हर वक़्त, बचना चाहते हो!
    या ज़िन्दगी के मात से आँखें मिलाकर,
    खुद के जुनून से खुद को, रचना चाहते हो!

    - किशोर शुक्ल
    ©kishor634

  • kishor634 105w

    #abhivyakti05 @rikt__ @vipin_bahar @nema_ji @deepajoshidhawan @saroj_gupta

    ��������✍��माँ-हिंदी✍����������
    ------------------------------------------------------
    छोटी नाक, छोटा चेहरा, छोटे-छोटे-से हाथ थे,
    तुम्हें देखकर मेरे दिल में, भर उठते ज़ज़्बात थे।
    जब घुटने के बल चलते थे, संकेतों में शिक्षा होती थी,
    कब निकलूँ तुम्हारी मुख से, यही एक इच्छा होती थी।
    तुम बड़े हुए, मुझे "माँ" कहा, मैं फुले नहीं समाई थी,
    आँख दिखाकर 'अंग्रेजी' को, छाती ठोककर आई थी।

    तुम ज़ोर-ज़ोर से बचपन में, कविता पाठ किया करते,
    मेरी छवि को जग के आगे, और विराट किया करते।
    धीरे-धीरे तुम मुझको, या मैं तुमको थी ओढ़ गई,
    तुम्हारी शिराओं-धमनियों में, सर-सर करती दौड़ गई।

    तुम बड़े हुए, बसंती हवा, झांसी की रानी पढ़-पढ़कर,
    तुमने सोचा दुनिया जीतोगे, इसी राह पर बढ़-बढ़कर।
    फिर आगे बढ़े, तो पता चला, औरों की भी माँएँ हैं,
    उन माँओं के आगे, जाने कितनों ने शीश झुकाए हैं।

    तुम आदर करते थे मेरी, मुझे इतना सम्मान दिया,
    पाँच विषय अंग्रेजी में, छठे में मुझको स्थान दिया।
    "टेंस-वॉइस" करते-करते, जीवन आगे बढ़ने लगी,
    नियति भी जाने छुप-छुपकर, कैसी लीला गढ़ने लगी।

    'या-या' 'फाइन' 'थैंक यू' कहकर, तुम 'कूल-डूड' तो हो गए,
    त्यागकर पारम्परिक भोजन, तुम 'फ़ास्ट-फ़ूड' के हो गए।
    मैं अब भी चढ़ाए भौहें, नाराज़ हूँ तुमसे ऐंठी हूँ....
    माटी वाले उसी आँगन में, जैसी थी वैसी बैठी हूँ।

    हाँ! जानती हूँ आज भी, जब कभी अकेले होते हो,
    मेरे ही सुर में सुर मिला, कभी हँसते हो कभी रोते हो!
    बुरा नहीं लगता मुझे, जो मुझको यूँ दरकिनार किये,
    भूलकर अपनी माता को, किसी और को ही प्यार दिए।

    पर फूट-फूटकर रोने को, तुम तब थे मुझको बाध्य किए,
    जीते-जी अपनी मईया का, दिवस मनाकर श्राद्ध किए।
    चाहती हूँ कभी-कभी, सारा विष दुनिया का पी लूँ मैं,
    तत्क्षण याद आता मुझे, बड़े बेटों के लिए ही जी लूँ मैं।

    आखिर में अहम सवाल यही, वो दिन भी कब दिखलाओगे,
    सभा बुलाकर ऐसी ही, अपने बच्चों से श्राद्ध करवाओगे।
    मुझ संग अपने बचपन की, यादों का वृतांत सुनाओगे,
    कम-से-कम उस दिन ही सही, "माँ" थी, ये तो बतलाओगे!

    - किशोर शुक्ल
    【जय हिंदी, जय जननी】

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    माँ-हिंदी

    सिर्फ और सिर्फ एक विनती है पाठकों से.... इस रचना को पढ़ें तो पूरा पढ़ें.... समयाभाव हो तो बाद में कभी पढ़ लें.... पर अभी अधूरा ना पढ़ें.... क्योंकि ये भाव एक माता का अपने संतान के प्रति है। लिखने की एक कोशिश की है मैंने.... पता नहीं आपतक कितना पहुँच पाऊँगा।
    【रचना के लिए कृपया अनुशीर्षक देखें】
    【रचना थोड़ी बड़ी हो गई, उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ】
    【काम निपटाकर आप सभी की रचनाएँ भी पढ़ता हूँ, लालायित हूँ】❤️❤️
    ©kishor634