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  • kritikakiran 58w

    तुम,
    जो हाशिये पर खड़े हो,
    मेरी ओर देख रहे हो,
    बताओ, तुम्हें क्या दूँ मैं?

    मेरे पास ना कमाई हुई एक कौड़ी है
    ना ही तुम्हें देने के लिए कुछ और,
    क्या है?
    बस चंद शब्द ही तो हैं..

    हाँ, चंद शब्द हैं
    और वो इतने कर्मठ हैं
    कि वो रहेंगे तुम्हारे साथ
    तब भी जब कोई और ना हो..

    तुम्हारी साँसें
    साथ छोड़ देंगी तुम्हारे शरीर का
    पर ये शब्द, जो अब मेरे नहीं, तुम्हारे हैं,
    थामे रहेंगे तुम्हारा हौसला!

    बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 59w

    वो धर्मनिरपेक्ष है,
    समाजवादी है,
    समता - पसंद,
    और तर्कसंगत है।

    वो बिल्कुल वैसा ही है जैसा
    तुम्हें,
    मुझे,
    या उन्हें होना चाहिए।

    क्या अब भी तुम्हें इसमें कोई संदेह है कि,
    "भूख"
    भारत देश का
    "सर्व - सर्वोच्च" नागरिक है?!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 59w

    किसी संघर्ष के दौरान
    ताप का शिकार हुई ज़मीं पर
    जब ख़ून की छींटें पड़ती हैं
    तब छनछना कर उठता है अराजकता का धुआँ...

    पेड़ों पर गर्दन झुकाए आराम करते गिद्धों के
    सिर उठ जाते हैं;
    और इनका समूचा झुंड, पूरे पंख फैला कर
    आसमाँ में करता है तांडव...
    एकदम बेधड़क!
    वहीं दूसरी तरफ़ एक गौरैया,
    चोंच में धान का बीज दबाए
    भागती है घोंसले की ओर
    और किसी मासूम से बच्चे की तरह
    डर से पंखों में छुपा लेती है मुँह अपना...

    गिद्धों ने हमेशा चाहा है दुनिया को बनाना
    एक मरुस्थल...
    चाहे हैं सिर्फ़ शव ही शव...
    वहीं इन गौरैयों ने चाहा है
    ब्रह्माण्ड भर का प्रेम...
    अन्न से भरे..खिलखिलाते आँगन।

    सालों से मेरे घर की मुंडेर पर
    कोई गौरैया पानी पीने नहीं आई...
    हाँ! गाहे बगाहे, दुनिया भर के
    गिद्ध दिख जाया करते हैं, एक साथ...
    कभी संसद के गलियारों में
    तो कभी टीवी पर....समाचार पढ़ते!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 59w

    जब जब चाहा धरा ने
    प्रेम
    तब तब बरसायी अम्बर ने
    आग़
    और जब जब चाहा अम्बर ने
    सौहार्द
    तब तब भिजवाया धरा ने...
    ख़ाक

    यूँ जो
    हुआ विस्तार
    शून्यता का
    बीच धरा और अम्बर के..
    लगी अटकलें और प्रश्न उठे
    कि "क्या वजह है अलगाव की?"
    कि मुद्दा यहाँ दम्भ का है...
    या बात यहाँ है स्वाभिमान की?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 73w

    नाम
    तुम्हारा

  • kritikakiran 75w

    मेरी या तुम्हारी दृष्टि से ये कहाँ सोच पाएँगे
    गिद्धों के गुरु हैं जो, हमें तो वो नोच खाएँगे

    क्या मतलब है इनको कि, जनता नाशाद है
    ये तो वो लोग हैं जो चुटकुलों से चोट खाएँगे

    जाओ और लिख दो दीवारों पर : "आज़ादी"
    फिर देखो कैसे कलेजों पर साँप लोट जाएँगे

    ग़लती से भी इनसे क्यों लगा लेते हो उम्मीद
    ज़मीर के सौदागर, मुँह पर चूना पोत जाएँगे

    खूब भौंकेंगे ये उनपर जो दुर्बल हैं, लाचार हैं
    सत्ता के आगे तो पाँव पकड़ कर लोट जाएँगे

    ये तो वो बहादुर हैं जो विपक्ष से माँगेंगे जवाब
    दबाने के लिए सच ये सरकारों से नोट खाएँगे

    क्या दोष देंगे उनको जब ख़ुद बेज़ुबाँ हैं आप
    शिकारी से ज़्यादा यहाँ शिकार में खोट पाएँगे

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 75w

    कुछेक राज़ पन्नों पर होते हैं
    और कुछ होते हैं कलम में..
    कुछ ऐसे भी होते हैं
    जो रहते हैं बीच में..
    कलम और काग़ज़ के
    जो ना ही ठहर पाते हैं, ना ही उतर
    बस लटके पड़े रहते हैं...
    जैसे लटके पड़े हैं हम
    फ़िलहाल..
    "हाँ" और "ना" के बीच,
    बीच में!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 75w

    जब जब चाहा धरा ने
    प्रेम
    तब तब बरसायी अम्बर ने
    आग़
    और जब जब चाहा अम्बर ने
    सौहार्द
    तब तब भिजवाया धरा ने...
    ख़ाक

    यूँ जो
    हुआ विस्तार
    शून्यता का
    बीच धरा और अम्बर के..
    लगी अटकलें और प्रश्न उठे
    कि "क्या वजह है अलगाव की?"
    कि मुद्दा यहाँ दम्भ का है...
    या बात यहाँ है स्वाभिमान की?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 76w

    उसकी आमद होती है
    चुपके से
    दबे पाँव....
    फिर यूँ कि
    पीछे से करता है वो
    एक ज़ोरदार "धप्पा"...

    प्रेम
    यक़ीनन
    एक शरारती बच्चा है!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 76w

    फ़लसफ़ा नहीं कोई, ये हम सब की असलियत है
    सच, झूठ, सही, ग़लत क्या है? सब सहूलियत है

    ©kritikakiran