mallah

ham hi gadhe hai jispar kahawate bani hai 😃

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  • mallah 25w

    मत का पर्व

    ढेरों राज्य यहाँ हर राज्य में पार्टियों का पाखंड इतराया
    जातीय गड़ना, अधिकारों को सहेजने का नारा छाया
    चाय की चुस्की नदारद हुई, मदिरा का मन सबने बनाया
    आया-आया मतदाताओं का, संवैधानिक महोत्सव आया

    इतिहास की अति और लीपा-पोती का संस्करण छाया
    धीमी विकास की गति, गाँवों की छती का मुद्दा गर्माया
    किसी ने की व्यक्तिगत टिप्पणी तो कोई लांछन लगाया
    आया-आया मत विभाजन करने का, मत महोत्सव आया

    कार्यकर्ताओं ने काट निकाली, मूर्खता भयी अभिमानी
    सांसद ने बदली पार्टी, मूर्खों ने जहालत फैला डाली
    बहु-बेटियाँ पर्दे में रहे या नहीं? इसपर जंग हुई भारी
    हाय रे बेबस मतदाता की बुद्धि के बन गए सांसद माली

    शिक्षा, रोज़गार, क़ानून व्यवस्था पर हो रही आनाकानी
    आप और मैं से तू, तू से तू-तू की छिड़ी है जंग ज़ुबानी
    राष्ट्र विकास की लुटिया डूबाकर करने लगे है मनमानी
    मतदाताओं की मती मरी पार्टियों के लिए कर रहे प्रधानी
    कर रहे है प्रधानी….

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  • mallah 27w

    सुध

    मिलना, मिलकर बिछड़ना, लम्हा राख़ सा प्रतीत होता है
    लबों पर उलझे शब्दों में उसका साथ धूमिल लगता है।
    उसकी साँसों में कोई राज़ है जो ज़ुबा पर आता ही नहीं?
    हमसे वह ज़ाहिर करता है शर्तों संग, सुध लेता ही नहीं?

    झुकी निगाहें, उँगलियों संग आलिंगन को तरसती है
    वह मुलाक़ात के लिए जाने कितने ही जतन करती है।
    उससे मिलना, मिलकर बिछड़ना अलग सा लगता है?
    उम्मीद सा मुझमें बसकर मिलता है, सुध लेता ही नहीं?

    भय और भ्रम का शोर अंदर-ही-अंदर उफान भरता है
    मुझसे बन मुसाफ़िर रूबरू होकर मुसाफ़िर कर देता है।
    वाक़िफ़ होते हुए हालातों से भी वह हाल बया करता है
    अंदर ठहरी अनल को देकर हवा, सुध लेता ही नहीं?

    दूरियों संग-संग सवालों का कोहरा घनघोर छाया है
    मेरे उसके बीच में कुछ तो है अपना तो कुछ पराया है।
    वह मंज़िल की तलाश में है मुलाक़ातों से घबराया है
    दबाए रखा है सिने में साँसे सावन की, लिए यादों को,
    वह ख़ुद-में-ख़ुद से यूँ उलझा है की सुध लेता ही नहीं?

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    ✏️trickypost 📆 ३०-०१-२०२२ #trickypost

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  • mallah 42w

    जाने यह कैसे क़ाफ़िले हररोज हर शहर गली निकलते है
    कभी ख़ुशियों के ढोल तो कभी ग़मों की बारात होते है
    कभी जश्न सिंधुर का तो कभी ढलती शाम होते है
    यह अपने है पर जाने कब से यह शहर गाँव एक दूसरे के ख़िलाफ़ निकलने लगे है

  • mallah 42w

    मैंने मेरी गली के चाँद को सँवरते और बिछड़ते देखा
    मैंने मेरी गली में चाँद को सूरज को निगलते देखा,
    मैंने देखा यहाँ कितनो के आशियानो में दर्द का पहरा है
    मैंने देखा उसकी ज़िंदगी में आज भी वही ठहरा है।

    उस मासूम लड़की को भी बेवफ़ाई करते देखा
    काली रातों में मैंने पिता के काँधे को खटते देखा,
    उन्हीं रातों में पराए संग अपना होते साखों को देखा
    जुर्म पर मरहम लगाते सफ़ेदपोश बापों को देखा।

    ग़ुलामी की निशानी पर जश्न की शाम को रोशन देखा
    आज़ाद मुल्क में हक़ के लिए रोते जनता को देखा,
    मुँह के निवाले के लिए भटकती माता को मृत देखा
    लाशों पर मुस्कुराते so called पुत्र को भी देखा।

    जाने कैसी फिदरत का चोला हमने अब ओढ़ लिया
    जाने कैसे रिश्तों के मोह में लहूँ को हमने छोड़ दिया,
    धधकते शमशान में शोलों ने भी अपना रुख़ है बदला
    इंसानों की जमात को राख करना उसने है छोड़ दिया।
    उसने है छोड़ दिया।।

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  • mallah 43w

    Dedicated to सखी @raaj_kalam_ka

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    सखी रे सखी

    जाने यह कैसे धागे पिरोए है आपकी दस्तक ने
    जाने यह कैसे रंगों से सराबोर हुए है आधि रात
    इन किरणों को कैसे मेरे रंगत पर इतना ग़ुबार हुआ
    कैसी हवा चली जो अपनी आग़ोश में लिए है हमें
    सब तेरे बंधन का क़सूर है या मौसम का बदला मूड है