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  • mamtapoet 11h

    तुम रोज़ मन की जमीं पे ,
    बिखरो हरसिंगार की तरह
    मैं समेट लू तुम्हें साँसों में
    प्राण वायु की तरह।

  • mamtapoet 13h

    #rachanaprati120
    @anandbarun ,@anusugandh,@piu_writes
    जब जब मुझसे निकलकर मैं आज़ाद हुई,।
    तब तब मैं ख़ास हुई।

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    बचपन में जब स्कूल में पहली बार
    Drawing compitition में
    प्रिंसिपल से इनाम मिला,
    लगा जैसे मुझको रब ने कुछ खास दिया।
    जब कॉलेज में कलेक्टर से, ट्रॉफी मिली,
    सच मन को एक नई अनुभूति मिली।
    भाई के विवाह में जब
    अपनी ही कविता को
    स्वयं का स्वर दिया,
    तालियों से हर्ष वंदन हुआ,
    इन सब अवसर पर मम्मी पापा के चेहरे जो खिले,
    यूँ लगा जैसे रब से मुझे कुछ आशीर्वाद विशेष मिले।

  • mamtapoet 1d

    मेरी प्रिय,

    मैं जानता हूँ,
    तुम अपना सर्वोत्तम दे सकती हो
    मुझे तुम पर पूरा भरोसा है,
    मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ,
    तुम्हारा साथी
    तुम्हारा मन
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 2d

    #rachanaprati119
    @goldenwrites_jakir, @anusugandh, @anandbarun


    सब कहे मुझे तेरी परछाई
    पर भाई में मुझे तू नज़र आई
    आईना क्यों झूठ बोले
    तेरी छवि तो मैंने उसमें पाई।

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    परछाई

    बचपन से सुनती आई हूँ
    लड़की जो पिता को गई
    बड़ी भाग्यवान वो कहलाई।
    लड़के ने यदि माँ से संस्कारो की विरासत पायी
    तो वो क्यों न कहलाया मां की परछाई।

    छोटी सी थी तब मम्मी मुझे छोड़कर भगवान के पास चली गई, क्योंकि उनको भी मेरी मम्मी जैसी मम्मी चाहिए थी, यही तो कहा था भैया ने। बस तब से ही भैया मेरी मम्मी बन गये , बिल्कुल मम्मी की परछाई जैसे हर दम मेरे साथ, प्रत्यक्ष और अपनी सीख और बातों से अप्रत्यक्ष रूप में। मेरी चोटी बनाने से लेकर, H. W. कराने और हाँ किस से कैसे बात करनी है, और कब चुप रहना है, सब कुछ तो मुझे भैया ने ही सिखाया।
    जब जब मम्मी की जरूरत थी वहाँ भैया मेरे साथ थे। और आज भी, जब पहली बार शादी के बाद पीयूष के साथ अपने घर में आई। पूजा की थाल हाथ में लिए माँ ने ( भैया)मेरी नज़र उतारी तो आँसू आ रहे थे उनकी आँखों में, मुझसे पूछा तू खुश तो है न, अपने नये संसार में, कभी कोई भी तकलीफ़ हो हिचकिचाना नहीं और सीधा मुझे आकर बताना, सबकी खबर ले लूँगा। ये कहते हुए उनकी आँखों में आँसू बहने लगे और उनकी आँखों में मुझे नज़र आई माँ की परछाई।

  • mamtapoet 4d

    स्त्री

    रोज़ सुबह से लेकर शाम तक
    कितने टुकड़ों में खर्च हो जाती हूँ
    और रात को, मुझमें
    फ़िर, मैं ही बची रह जाती हूँ।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 4d

    #rachanaprati118

    @anusugandh ji@jigna_a,ji@anandbarun ji,@aryaaverma12@alkatripathi79 ji,@goldenwrites_jakir ji,@piu_writes @gannudairy jiआप सभी की रचनाएँ बहुत ही मनमोहक और काबिले तारीफ़ है, @anandbarun sir ji aur @goldenwrites_jakir neवो शब्द की अति उत्तम अभिव्यक्ति को दो दो रचनाओं में प्रकट किया। आज नये सदस्य @gannudairy ji की रचना की सराहना भी जरूर करूँगी, और मैं चाहूँगी कि वो इस श्रृंखला को आगे बढ़ाये और उनको सभी का सहयोग प्राप्त हो।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 4d

    Thank you WN for like ����
    @hindinama, @hindiwriters, @writersnetwork

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    चांदनी में झुलसा है बदन
    शायद धूप में ही शीतल हो

    हकीम का दिया जख्म है
    शायद नासूर ही इलाज़ हो।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 5d

    #rachanaprati117
    @jigna_a, @anusugandh, @anandbarun

    आज का विषय है "वो", वो पल, वो शख्स, वो खत, यहाँ वो शब्द सजीव निर्जीव कुछ भी हो सकता हैं, तो बस बुन लीजिये इस शब्द को लेकर खूबसूरत सी कोई कविता, कहानी।
    समय कल शाम 5 बजे तक। विषय चुनाव में विलंब के लिए क्षमा ।��

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    वो

    वो पल फिर याद आ गए
    जो गुलाब सी खूबसूरती रखते थे
    जाते जाते हाथ जख्मी कर गए
    क्योंकि वो काँटों से सलामी करते थे
    फ़ितरत जरा देर से समझ में आयी
    वो जो मुँह में राम, बगल में छुरी रखते थे
    कहने को अब कोई रिश्ता नहीं उनसे हमारा
    वो जो पराये होकर भी मुझमें मैं बनके रहते थे
    पलकों के समंदर ने भी कर लिया किनारा
    वो जो कभी खुशी के बादल बन मन को भीगोते थे।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    #rachanaprati116
    @jigna_a,@anandbarun,@anusugandh,@psprem,
    अगर यादों के गलियारों को
    बदलना मुमकिन हो पाता,
    तो हर याद खिलखिलाती,
    हर कली अनछुए स्पर्श पर
    अगर कछुए जैसे ख़ुद को अपने में समेट कर
    कठोर खोल ओढ़ पाती,
    जीवन्त हो उठता हर आँख का
    सलोना सा सपना,
    अगर ऐसा हो पाता, तो
    सच मैं गवाह बनना चाहती उस
    एक पल की।।

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    अगर...

    कुछ पल के लिए ही
    अगर,मैं तुम बन पाती,
    और तुम बन जाते मैं,
    अगर ऐसा सच में कभी होता,
    तो,
    तो तुम्हें अहसास होता,
    मेरी सुप्त होती उम्मीदों का, जो
    कभी पंख फैलाये सूरज को तकती थी।

    अगर ऐसा होता तो तुम्हें होता अहसास
    उन अनकही बातों के जज्बातों का
    जो शब्द बनने के पहले ही ,
    न जाने कितनी परतो के नीचे
    घुट कर रह गए।

    अगर ऐसा होता तो, तो तुम समझ पाते,
    कि क्यों बाँवरी सी तुम्हारे आगे पीछे घूमती थी
    क्योंकि शायद तुम्हारे पास होने
    को ही तुम्हारा सानिध्य समझ कर
    अपने मन को बहला पाऊँ।

    तुम्हारी तरह खुद में मशगूल होना
    नहीं सीखा मैंने,
    सपनों के रंगीन उलझे तारों से ही
    कैसे सजा ली है मैंने अपने मन की तस्वीर।।

    काश अगर एक बार भी तुम, मैं बनकर देख पाते.....
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    देखो,फ़िर से सिमट आई हूँ मैं,
    सफेद पन्ने पर,
    स्याही बनके तुम भी आ जाओ,
    और मिलकर रचाते है खूबसूरत,
    शब्दों का विन्यास।