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  • penholic_shan 3w

    ख्याल हैं....

    ये ख्याल हर रोज आता हैं,
    ये सवाल हर रोज आता हैं,
    में जानता हूं जवाब उनके, पर,
    ख्याल हैं, अब आता हैं, तो आता हैं।
    क्या कुछ अलग हो सकता था,
    क्या वो कदम अलग रास्तों पर बढ़ाए जा सकते थे,
    क्या इनका परिणाम अलग होता,
    मैं जानता हूं जवाब इसका, पर,
    ख्याल हैं, अब आता हैं, तो आता हैं।
    कौन आगे निकला, कौन पीछे रह गया,
    क्या फर्क पड़ता हैं इन सब बातों का,
    फर्क होता अगर साथ पीछे रह गए होते,
    पर क्या इतना पीछे रहकर, काफी दूर जाया जा सकता था,
    मैं जानता हूं जवाब इसका, पर,
    ख्याल हैं, अब आता हैं, तो आता हैं।
    सबकुछ एक ही तारीख पर होना महज़ इत्तेफ़ाक तो नहीं,
    ये समझौते का सौदा क्यों जान पड़ता हैं,
    क्या अब भी वो न होना एक गलती हैं,
    क्या कुछ बदले में दे देना, मन को बहलाने का एक नया खिलौना हैं,
    आपको कबसे जरूरत पड़ गई ऐसे प्रपंच की,
    मेरा काम इतना भी मुश्किल न था,
    पर ये सब आखिर क्यों ऐसा हुआ,
    मैं जानता हूं, जवाब इसका, पर,
    ख्याल हैं, अब आता हैं, तो आता हैं।
    कुछ ज्यादा थोड़ी न मांगा था,
    कभी -कभी ही तो मन को कुछ अच्छा लगने लगता हैं,
    हर एक इच्छा पूरी होने की झूठी दिलासा तो तसव्वुर में भी नहीं देता खुद को,
    पर क्या ये इतना सा भी मुक्कमल होना जरूरी नहीं समझा उसने,
    और फिर उसी एक ख्वाब का धराशाई होना,
    मन मसोस कर,
    निरस्त चेहरा लिए,
    रोज उठना, रोज सोना,
    ये कौनसी रेखाओं का फेर हैं,
    ये कैसा किस्मत का खेल हैं,
    ये मेरे मन का तो नहीं हैं,
    ऐ खुदा, ये कैसा तुम्हारे मन का हैं,
    मैं शायद इसका ही जवाब नहीं जानता हूं, पर,
    ख्याल हैं, अब आता हैं,तो आता हैं।।

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 16w

    सब मुश्किलों पर धनुष तान दूंगा,
    श्री कृष्ण सा कोई, साथ तो होने दो ।
    वो पूछते हैं क्या रखा हैं सवेरों में,
    तमाशा होगा, सहमी रात तो होने दो ।
    मैं दिल को कल से पत्थर बना लूंगा,
    इस हताश मन को, पूरी शाम तो रोने दो ।
    अपनी ख्वाहिशों का खुद विसर्जन कर दूंगा,
    कोशिश की चिता में ठंडी, राख तो होने दो ।।

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 19w

    हिंदी दिवस की सभी को शुभकामनाएं

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    "हिंदी"

    कवियों की आशा हूं मैं,
    गीतों की भाषा हूं मैं,
    अंग्रेजी की प्रतिद्वंदी समझ बैठे मुझे,
    प्यारी सी हिंदी भाषा हूं मैं

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 23w

    In an ever evolving world
    we are still not powerful enough to achieve everything.
    We've Conquered lands, mountains,clouds and planets and yet
    deep down we have a void,
    a void so large that it would drain the inner calmness and
    would laugh on the so called human supremacy.

    In this journey
    we have to pay some unknown debts and
    we'll go from having
    all of it to
    some of it and
    then none of it in a short span
    and we'll have to watch it helplessly with no logical explanation at all.
    The universe sometimes conspire
    against all our might
    to snatch something that is dear to our heart
    and we won't be able to get it ever,
    no matter how hard we try.

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 28w

    सबसे खतरनाक होता है
    मुर्दा शांति से भर जाना,
    तड़प का न होना,
    सब सहन कर जाना,
    सबसे खतरनाक होता है
    हमारे सपनों का मर जाना
    -"पाश"

  • penholic_shan 29w

    Most of us are prisoned by the interpellation of bourgeois values........and now we all are in a rat-race with other prisoners.

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 32w

    Time blurs all the memories and yet a single word would bring them all back and crush you under its weight.
    Now you don't have to blur all the memories, you just have to blur those words in order to move forward.
    Remove those words from your dictionary and throw them away. Now your life has to content itself without those words.
    Try to fill the removed words with new words and make sure you don't have to remove them again.
    Life is a culmination of removing and adding words, willingly or unwillingly.


    ©penholic_shan

  • penholic_shan 34w

    ' कुछ लिखा नहीं.....

    "बहुत दिन हो गए यार कुछ लिखा नहीं"
    जो थी उम्मीद शब्दों की वो चेहरा आज दिखा नहीं,
    तुझे छोड़ कुछ और देखा, पर दिल में कुछ सूझा नहीं,
    सोचा कभी लिखूं भगवान को, कभी लिखूं आसमान को,
    कभी लिखूं कहानी परिंदों की, तो कभी लिखूं जुबानी वीरों की
    कभी लिखूं बादल भरे पानी से, तो कभी लिखूं लफ़्ज़ रूहानी से,
    कभी लिखूं बिलखते बच्चों को, तो कभी लिखूं मैं पिता के रिश्तों को
    तेरे तराशे रूप को लिखूँ या लिखूँ मैं तेरे चेहरे की धूप को,
    तेरे पलकों का अफसाना लिखूँ, या लिखूँ में तेरी आंखों का मयखाना,
    तेरी जुल्फों की घटाएं लिखुँ या लिखुँ मैं लबों की अदाएँ,
    उन समाजों का कसूर लिखुँ या लिखुँ मैं तेरी आंखों का नूर

    इस बीच थोड़ी देश की याद आयी,
    कुछ कुरीतियां सामने आयी,
    सोचा जगाना हैं समाज को,
    कुछ लिखना हैं बदलाव को,
    फिर याद आया , कि बदल तो तू भी गयी है,
    और फिर उस पुराने चेहरे की याद के बाद कुछ दिखा नहीं।
    ताश सा जो बिखरा था मैं, अब मुझे लिखने का मन नहीं,
    लाश सा जो पड़ा था मैं, अब इस कलम को चलाने का मन नहीं
    किसे लिखता,
    क्या बताता,
    क्या समझाता मैं,
    इस दुनिया को,
    जो खुद नशे में चूर पड़ी हैं,
    बन्ध आँखों से घूर रही हैं,
    मेरे प्यार की दास्तान सुनकर वाह करती,
    फिर कुछ पल सुनती और
    अगले वाह का इंतज़ार करती,
    दो घूंट और मद के नशे में घुलती,
    कुछ लुढ़कती,
    सोती-जागती,
    अर्ध-निंद्रा में आह करती,
    और फिर सुबह भूल जाती ।

    ऐसी कहानी सुनाने को उतावला था मैं,
    खुद को बेचने चला, बावरा था मैं
    एक दोस्त की नज़र पड़ी मेरे सिरहाने पर,
    और मर्ज समझ गया वो मेरा घर आने पर,
    में ढूंढ रहा था महफ़िल में उस अजीज को,
    जिसने बोया था मन में मेरे दर्द के बीज को,
    वो मुशायरा खत्म होता चला,
    और मैं उसका इंतजार करता चला,
    लगा था कि उसकी वाह में सच्चाई हैं,
    मैं घर पहुंचा तो पता लगा एक चिट्ठी आयी हैं,
    सब काम छोड़ कर मैं वो चिट्ठी खोलने लगा,
    कोरे कागज पे स्याही के निशान टटोलने लगा,
    जब पढ़ा तो खाली पाया उस चिट्ठी को,
    मन का तुफान ढल चुका था और
    बस यही लिखा था,
    "बहुत दिन हो गए यार कुछ लिखा नहीं"।

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 38w

    सब नीरस लगने लगा हैं तुम्हारे नाम के बाद से,
    हर शाम घुटने लगा हूं मैं, हमारी उस शाम के बाद से....

    ©penholic_shan

  • penholic_shan 46w

    ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार
    ये ग़ुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार
    ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ
    ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
    ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
    ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे
    ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
    ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
    - साहिर लुधियानवी