• thesoulscribbles 48w

    फ़ासले एसे भी होंगे ये कभी सोचा ना था
    मेरा होके भी तू मेरा ना था ।

    हर आहट पर लगा जैसे तू मिलने आया
    तू मुझे सोचे, तुझे फ़ुर्सत-ए-इक-दम ना था ।

    मेरे लहू के हर कतरे पर लिखा था नाम तेरा
    तेरे किसी भी लम्हे में ज़िक्र मेरा ना था ।

    तुझे हर चेहरे में दर-बदर ढूंढा मैने
    पर तुझ जैसा रूह-ओ-दिल सारी दुनिया में ना था ।

    ग़म-ए-फ़ुरक़त में घिरी थी मैं चार-सू
    आलम-ए-मायूस-ए-मोहब्बत का इल्म तुझे ना था ।

    बेनूर था दिन और बेबस हर शाम थी
    उस चाँद के सुरूर में भी सुकून तेरा ना था ।

    मेरे हर नब्ज़-ए-दिल में बसा था तू
    पर तुझे मेरे होने का एहसास ना था ।

    ख़्वाब-ज़ार में अक़सर मुलाक़ात हुई
    उनमें भी तेरा होना ना होने सा था ।

    ©thesoulscribbles
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    फ़ुर्सत-ए-इक-दम ~ spare time for a moment
    रूह-ओ-दिल ~ soul and heart
    ग़म-ए-फ़ुरक़त ~ sorrow of separation
    चार-सू ~ from all directions
    आलम-ए-मायूस-ए-मोहब्बत ~ state of a dejected lover
    नब्ज़-ए-दिल ~ pulse of heart
    ख़्वाब-ज़ार ~ field of dreams

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