• krati_sangeet_mandloi 139w

    "मिट्टी में नश्वर,मिट्टी के अनश्वर से अछूता रह जाता है"

    इस पंक्ति का आशय नश्वर देह में स्थित अनश्वर, अनंत परमात्मा का अंश (आत्मा) से है।

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    सब मिट्टी

    माटी का बना पुतला, माटी में मिल जाता है,
    सब मिट्टी हो जाता है, सब मिट्टी हो जाता है।

    पाने-खोने के इस अनसुलझे खेल में,
    जीवन चक्रव्यूह के जाल में उलझ जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    सच से खुद को किनारा करके,
    भ्रम के घेरे में सब धुँधला हो जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    सहेजते है जिसे ताउम्र,
    सब कुछ यही रह जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    पानी का एक बुलबुला,
    तेरे-मेरे की मोह माया में डूब जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    वर्तमान की स्थिरता का कोई साज़ नहीं,
    अनजान कल में मन स्थिर हो जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    अहंकार है जिस-जिस पर भी,
    एक क्षण में चकनाचूर हो जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य से दूर,
    मानव सांसारिक नाटक का किरदार बन जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    सब मिट्टी में, मिट्टी में सब,
    मिट्टी में नश्वर,
    मिट्टी के अनश्वर से अछूता रह जाता है।
    सब मिट्टी हो जाता है...

    ©Krati_Mandloi✍️
    (18-05-2019)