• jigna_a 22w

    My favourite

    किसीका निर्भर करता है,
    के आज रसोईघर से महक कैसी आई,
    या कोई कहता है,
    बहू ने आज चाय समय से नहीं बनाई,
    कोई कहता क्यूँ छू लेती हो मेरा सामाँ,
    जब पासवर्ड की तुमने समझ नहीं पाई,
    समय के चलते गुलों में महकते लगाव ने,
    बिस्तर की सिलवटों में शरणागति पाई,
    पर बोलना मत ये सब सखी री,
    कहेंगे नारीवाद के ढोल क्यों बजाती,
    अरे! ढोल से याद आया,कोई अपनी ही कह रही थी,
    ढोल सी बन गई है, कहकर भद्दा मुस्कुराई थी,
    और मैं, मैं अब तिलमिलाती नहीं, ना झुंझलाती,
    पेट पर पड़े निशान सबूत है मैं सर्जक हूँ, माँ हूँ,
    और ढोल जैसी काया में मैं पाती गरिमा हूँ,
    जब शिकायत करते तो लगता कि फर्ज़ निभाई थी,
    सिलवटों में मैंने भी अठखेली जताई थी,
    हाँ ढोल हो गई हूँ पर वैसे ना बजती हूँ,
    मैं एक बंद मुट्ठी सी आप सबको जँचती हूँ,
    पर आप सब का शुक्रिया,
    मुझे आज़ाद करने के लिए,
    ये तो चलता ही रहेगा,
    चाय लाती हूँ अभी!!
    ©jigna_a