• aparna_shambhawi 39w

    उत्तरजीविता की होड़ में भागती मैं
    विलीन होती जाती हूँ
    गोधूलि की बयार में।
    मेरी अलक से उलझती टहनी
    झर देतीं रात रानी के फूल
    मेरी झीनी चुनरी में निमेष-पूर्ण आँखों से
    मुस्कुराते हुए,
    मेरी सुवासित चुनरी रात-रानी को समेट
    हो जाती और अधिक सफेद।

    यथार्थ की शोध में समाधिस्थ तुम
    परिणत होते जाते हो
    तिमिराच्छन्न के जल प्रपात में
    जिसकी नीरव प्रवाह से टकराती शशि किरणें
    पहिरा जाती हैं तुम्हें रजत शेखर।
    तुम्हारे कुर्ते की बहोली
    मद्धिम लहरों के टकराव से सरक कर
    कलाई पर आ रुकती है,
    और रोक देती है तुम्हें शोध में आगे बढ़ने से।

    रजनी के भींग जाने से ठीक पहले
    तुम ठहरा देते हो खुद को
    शिलाओं के मध्य उतर कर,
    जिसे देख व्याकुल नभ बुला लेता चँद्र को और करीब
    कि भींगने लगती रजनी और जल्दी!

    बढ़ती आर्द्रता से भारित मेरी चुनरी
    रुक जाती शिलाओं के टेक पर कुछ क्षण विश्राम हेतु
    कि अचानक!
    गिरने लगते रात-रानी के पुष्प
    उन्हीं शिलाओं की गोद में ,
    जैसे तुम्हारे माथे पर थपकी दे
    सार्थक हो जाने को आतुर हो उनका जीवन।

    मैं अमूक, एक टक देखती रहती
    तुम्हारे और पुष्पों की परस्पर क्रीड़ा,
    कि तभी अपनी बाध्यता तोड़ तुम
    घूमने लगते अपनी प्रवाह में पुष्प-माल समेटे
    मेरे इर्द गिर्द।
    सारे दिन की अलसायी मैं,
    मूँद लेती हूँ आँखें तुम्हारी बहती बहोली के सिरहाने,
    उषा की बजती धुँधली सीटी
    जगा जाती मुझे पौ फटने से थोड़ा पहले।


    मैं , नींदाई आँखों से अवाक
    देखती रह जाती हूँ मेरी सफ़ेद चुनरी
    जिसपर रात भर की साधना से
    तुमने गढ़ दिए रानी के उजले पुष्पों को
    रंग-बिरंगी कढ़ाई बना कर!

    हे संगतराश!
    कहो? कल पुनः रुकोगे ,
    मध्य शिलाओं के?


    ~ अपर्णा शाम्भवी