• penholic_shan 63w

    ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार
    ये ग़ुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार
    ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ
    ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
    ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
    ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे
    ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

    ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
    ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
    - साहिर लुधियानवी