• penholic_shan 51w

    ' कुछ लिखा नहीं.....

    "बहुत दिन हो गए यार कुछ लिखा नहीं"
    जो थी उम्मीद शब्दों की वो चेहरा आज दिखा नहीं,
    तुझे छोड़ कुछ और देखा, पर दिल में कुछ सूझा नहीं,
    सोचा कभी लिखूं भगवान को, कभी लिखूं आसमान को,
    कभी लिखूं कहानी परिंदों की, तो कभी लिखूं जुबानी वीरों की
    कभी लिखूं बादल भरे पानी से, तो कभी लिखूं लफ़्ज़ रूहानी से,
    कभी लिखूं बिलखते बच्चों को, तो कभी लिखूं मैं पिता के रिश्तों को
    तेरे तराशे रूप को लिखूँ या लिखूँ मैं तेरे चेहरे की धूप को,
    तेरे पलकों का अफसाना लिखूँ, या लिखूँ में तेरी आंखों का मयखाना,
    तेरी जुल्फों की घटाएं लिखुँ या लिखुँ मैं लबों की अदाएँ,
    उन समाजों का कसूर लिखुँ या लिखुँ मैं तेरी आंखों का नूर

    इस बीच थोड़ी देश की याद आयी,
    कुछ कुरीतियां सामने आयी,
    सोचा जगाना हैं समाज को,
    कुछ लिखना हैं बदलाव को,
    फिर याद आया , कि बदल तो तू भी गयी है,
    और फिर उस पुराने चेहरे की याद के बाद कुछ दिखा नहीं।
    ताश सा जो बिखरा था मैं, अब मुझे लिखने का मन नहीं,
    लाश सा जो पड़ा था मैं, अब इस कलम को चलाने का मन नहीं
    किसे लिखता,
    क्या बताता,
    क्या समझाता मैं,
    इस दुनिया को,
    जो खुद नशे में चूर पड़ी हैं,
    बन्ध आँखों से घूर रही हैं,
    मेरे प्यार की दास्तान सुनकर वाह करती,
    फिर कुछ पल सुनती और
    अगले वाह का इंतज़ार करती,
    दो घूंट और मद के नशे में घुलती,
    कुछ लुढ़कती,
    सोती-जागती,
    अर्ध-निंद्रा में आह करती,
    और फिर सुबह भूल जाती ।

    ऐसी कहानी सुनाने को उतावला था मैं,
    खुद को बेचने चला, बावरा था मैं
    एक दोस्त की नज़र पड़ी मेरे सिरहाने पर,
    और मर्ज समझ गया वो मेरा घर आने पर,
    में ढूंढ रहा था महफ़िल में उस अजीज को,
    जिसने बोया था मन में मेरे दर्द के बीज को,
    वो मुशायरा खत्म होता चला,
    और मैं उसका इंतजार करता चला,
    लगा था कि उसकी वाह में सच्चाई हैं,
    मैं घर पहुंचा तो पता लगा एक चिट्ठी आयी हैं,
    सब काम छोड़ कर मैं वो चिट्ठी खोलने लगा,
    कोरे कागज पे स्याही के निशान टटोलने लगा,
    जब पढ़ा तो खाली पाया उस चिट्ठी को,
    मन का तुफान ढल चुका था और
    बस यही लिखा था,
    "बहुत दिन हो गए यार कुछ लिखा नहीं"।

    ©penholic_shan