• parle_g 8w

    अबक़े वो शोर भी नही है मोहतसिब
    अबक़े मिरी जाँ निकली है क्या !
    ~ज़िया वाज़िल ( सबका दुख )

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    ग़ज़ल

    वज़्न - 2122 2122 2122 2122

    वस्ल के आसार थे फिर रम-हसीना पी गया हूँ
    मैं बड़ा ही कम्बख्त हूँ, मैं कमीना पी गया हूँ

    ये तिरे लह'जे तिरे उन'वान की तस्कीन हाए
    अब तुझे यूँ देख'कर लगता, नबीना पी गया हूँ

    कोई बीमारी नही जाती मिरे आलाम से अब
    चाहे मैं हर घाट का पानी, मदीना पी गया हूँ

    कल कोई हुबआब दरियाओं से झगड़ा कर रहा था
    मैं कहीं गर्क-ए-हवा ठहरा, सफ़ी'ना पी गया हूँ

    अब मिरे हाथो में का'सा आ गया है ख़ाक'सारों
    मैं सारे अजदाद मैं सारे दफीना पी गया हूँ

    हो उसे कोई ख़बर मर जाने की तो कह'ना उससे
    कोई आशिक है तिरा झल्ला, श'बीना पी गया हूँ

    तुम निकालो उससे पहले ही चले जायँगे दिल से
    गालिबन में अपनी फुर'कत का म'हीना पी गया हूँ

    कोई नागिन अपने अंडों की हिफ़ाजत करती है कब
    तुम जहर की बात कर लो, मैं नगीना पी गया हूँ

    इक़ तिरे सहरा पल पल प्यास लग'ती है अनासिर
    अब कोई शिकवा नही है, मैं प'सीना पी गया हूँ

    ये ग़ज़ल दर दर की ठोकर खा चुकी है, क्यो ज़िया अब
    मैं तिरी महफ़िल के चक्कर में क'रीना पी गया हूँ
    ©parle_g