• parle_g 16w

    @vipin_bahar @prashant_gazal @bal_ram_pandey @iamfirebird @suryamprachands @my_sky_is_falling @abr_e_shayari @anas_saifi @dipps_ ��

    इक़ ग़ज़ल....नासूर...
    ग़ल-बदन - नाजुक शरीर कमल की पंखुड़ी की तरह
    अंजुमन - जिहन की भित्ति या महफ़िल भी
    पैरहन - पोशाक , वस्त्र जो पहने हुए है
    चर्ख-ए-कुहन - आसमाँ जिसकी उम्र हो गयी है
    पनघट - पानी भरने का घाट
    जकन - ठुड्डी , chin
    पा-ए-कोहकन - पर्वत तोड़ने वाले के पैर ( फ़रहाद के पैर )

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में.... मैं कभी कोई शेर... अच्छा नही कहती
    पर इस ग़ज़ल में.. कुछ शेर... काफी अच्छे लगेंगे... बस तवज्जोह दीजियेगा ��

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    ग़ज़ल ( नासूर )

    वज़्न - 2122 2122 2212 222

    रिसता है अक्सर मिरी जाँ इस गुल-बदन में नासूर
    इक़ मुहब्बत बढ़ रही है, औ' अंजुमन में नासूर

    ये न'जऱ का आयना नश्तर से नही कटता अब
    लग'ता है, फिर लग गया है इस पैरहन में नासूर

    मुझको बा'रिश से गिला कब तक होगा, रह'ने भी दो
    अब दिखा'ई दे रहा है चर्ख-ए-कुहन में नासूर

    वो हसीना जुल्फ के पन'घट में ज'हर भर'ती है
    अरसों पह'ले लग गया है, जिसकी जकन में नासूर

    हम दुहाई सब'को देते है, मौत आये सब'को
    इक़ हमारा जिस्म ही क्यों है, हर कफ़न में नासूर

    काटना पड़ ही गया, फिर ये पैर भी पत्थर से
    मार देता है जाँ फिर पा-ए-कोहकन में नासूर

    कुछ दिनों से शरहदों का सा'हिल उफ़ानी में है
    हर इमाम-ए-दहर, रखता है हर वतन में नासूर

    फिर जला है कोई आदम फिरसे ग़ज़ल में यारो
    हो रहा है, दिन ब दिन कोई, इस च'मन में नासूर
    ©parle_g