• veesharma 88w

    Vs' 53

    दुखों का दरिया और शर्म का समंदर,
    कुछ इतना खौफनाक हो गया है ये भूख का मंज़र |

    वो पैदल ही चल दिए अपने अपने आशियाने की ओर,
    जो ज़िम्मेदारियां निभाने आये थे परिवार से दूर |

    बहोत दर्द है हर जगह आज जहाँ भी देखे,
    कोई भाग रहा है निवालों के लिए तो कोई अपने नाम के पीछे |

    बस अब बंद भी करो तुम्हारा ये नफ़रतें फ़ैलाने का सिलसिला,
    नासमझी में कहीँ रख न देना सर्वनाश का तुम कदम पहला |

    दे दो सहारा उन बेबसों को भी जो तुमसे आस लगाए बैठे है,
    ज़ात-पात राजनीती और हर बैर को छोड़ चलो इंसान बनकर जीते है |

    - Vikas Sharma