• aaditya 35w

    अपने शब्दों से ख़ौफ़ खाता लेखक
    असल में अपने शब्दों में भी प्रेम के ना मिल पाने की नाकाबिलियत से डरता है।
    फिर भी मैंने हमेशा तुमको ठीक ठीक लिखने की कोशिश की है।
    अगर प्रेमी लिखना जानता है तो कभी मर नहीं पाता।
    वह ना चाहते हुए भी खुदको ज़िंदा रखने की कोशिश
    अपनी कहानियों में करता है।
    ठीक उसी तरह जैसे की एक तैराक कभी
    आत्महत्या करने को नदी में नहीं कूदता।
    उसकी जगह अपने छत पर मज़बूत पंखा लगाने की कोशिश करता है।

    पर शायद तुम्हें ठीक ठीक लिखने की कोशिश इस लिए करता हूँ
    की मेरे ना रहने पर भी मेरा प्रेम तुम्हारे समक्ष रहेगा।
    मैंने अपनी कल्पना में भी हमेशा खुदको तुम्हारा पाया है।

    जानती हो
    प्रेम को कभी अमर नहीं होना चाहिए।
    एक उम्र हो जाने के बाद उसका मर जाना ठीक रहता है।
    ज़्यादा उम्र होने पर प्रेम डरावना हो जाता है
    क्योंकि दो प्रेमी कभी उतना ज़िंदा नहीं रहते।
    वह धीरे धीरे मरते जाते हैं।
    फिर आप साथ तो सोते हैं पर बिस्तर के किसी कोने पर
    आपका प्रेम अकेला पड़ा रहता है।
    अपने मृत्यु की प्रतीक्षा में।
    ठीक उसी तरह जैसे किसी गाड़ी से कुचले जाने पर
    सड़क के एक कोने पर जानवर पड़ा रहता है।
    उसको जीवन से ज़्यादा मौत की ज़रूरत होती है।
    ठीक उतनी जितनी एक डरे हुए लेखक को ज़रूरत होती है,

    प्रेम की।

    ©आदित्य