• aaditya 35w

    मेरी उदासी तुम्हारे प्रेम तक ले जाने वाली अदृश्य सीढ़ी है।
    जिसकी बढ़ती ऊँचाई के साथ मैंने हमेशा
    खुदको तुम्हारे थोड़ा और नज़दीक पाया है।

    ऊँचाई बढ़ने पर मैंने पाया की मेरा प्रेम डरा हुआ था।
    मैंने उसको अपनी मुट्ठी में क़ैद करके रख लिया
    और बिना किसी और बिना किसी को दिखाए ख़ूब रोया।
    अक्सर इतना रोना काफ़ी होता है की आपके मन में
    उदासी की जगह थोड़ा-सा प्रेम रह जाए।

    जानती हो
    दुःख को हमेशा प्रेम के साथ मिल कर पारदर्शी होना चाहिए।
    इतना की जब दुखी होके मैं अपने ईश्वर से तुम्हारी बुराई करूँ
    तो मेरे उदासी भरे संवाद को तुम प्रेम-मात्र समझो।
    मेरी प्रार्थनाएं वो आँसूँ बन जाएँ जो मेरी आँखों से होते हुए
    तुम्हारे होठों तक पहुँचे।

    जिन्हें तुम अपने मन में मेरा शोक
    और मैं संकोच करते हुए मेरे हिस्से का प्रेम समझ रख लूँ।

    ©आदित्य