• nisha45 19w

    मां

    तू तो खुली किताब है
    हर मुश्किल का जवाब है,
    अनुभव तेरी विशाल है।
    पगडंडियों पर दौड़ती,
    स्थिर हर बहाव में।
    नभ चूमती तेरे हौसले,
    पहाड़ 'तू'शत्रु समक्ष।
    हर बला को अबला करे
    अपने प्रचंड वेग से।
    वाकपटुता कुशल तेरी,
    छिपे मौन में सवाल है।
    दुष्टों के पांव कांपते
    तेरे एक अट्टहास से।
    मन मोहती स्वजनों के
    तेरी वाणी की माधुर्यता।
    भूखा तृप्त लौटता,
    खुले तेरे भंडार से।
    दीन-दुखियों व आस्रितों को
    नित भावों से सिंचती।
    तेरी सामिप्यता,अनुगम्यता
    बचाता हर कुचक्र से।
    सबके खुशियों का भान है,
    खुद का सिमटा अरमान है।
    कर्तव्यनिष्ठा से भरी कूट-कूट
    निश्छल,निर्मल गंगधार है।
    सुंदर, शीतल लोचनों में
    दिखता संपूर्ण ब्रह्मांड है।
    ©nisha45