• shriradhey_apt 36w

    तुम काफ़ी हो ...

    समय कितनी तेज़ी से बदल जाता है...

    मेरे लिये तुम काफी हो... जाने कितनी ही दफ़ा कहा होगा ये मैंने उसे पर हर बार, हाँ हर बार उसने इसे मज़ाक में उड़ा दिया। उसे हमेशा ही यहीं लगता रहा कि कोई कभी किसी एक के लिए काफी कैसे हो सकता है। सच ही तो है ना कभी किसी की आँखें सुंदर, किसी की बातें अच्छी तो कभी किसी का अंदाज़, कुछ ना कुछ किसी ना किसी में अच्छा लग ही जाता है, इसलिए उसे कभी समझ नहीं आया कि कोई एक कैसे.... सच कहूँ तो मुझे वो सर से पाँव तक सब पसंद है। उसके रहते मुझे कभी किसी और की ज़रूरत कभी लगी ही नहीं।

    दिन भर की सारी उलजुलूल बातों से लेकर रात की तीसरी दुनियां के लोगों की कहानियों तक हर छोटी से छोटी बात मुझे उसे बताना बहुत पसंद है। वो फिर चाहें कितना भी व्यस्त हो अपने काम में, चाहें ऑफिस की कितनी भी थकान हो मेरी सारी बातें बहुत मज़े से सुनता है। कभी कोई परेशानी हो या कोई उलझन तो बस सिर्फ़ उसका ही ख़्याल आता है कि उसके पास इन सवालों का कोई तोड़ तो ज़रूर होगा। सब कुछ कितना परफ़ेक्ट लगता है ना, बिल्कुल वैसे ही जैसे हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही जाने कब उसने अपने और मेरे बीच बातों की एक ऊँची दीवार बना ली और रोज़ बीतते दिनों के साथ उस पर एक ईंट रखता चला गया।

    आज आलम ये है कि दीवार के इस पार यानी मैं चिल्ला-चिल्ला कर भी कहूँ ना की मेरे लिए सिर्फ़ तुम काफ़ी हो तो यक़ीनन उस पास से वो आवाज़े टकरा कर लौट आयेंगी पर उसके दिल पर ज़मी परत की एक तह भी कम नहीं होगी।

    ©shriradhey_apt