• rahat_samrat 17w

    जय श्री कृष्ण��

    शैलसुता छंद
    चरण- 4 ( दो-दो या चार चरण समतुकांत)
    विधान- IIII SII SII SII SII SII SII S

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    छंद
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    सलिल सुधाकर सुंदर सर्व सुकोमल साहस सर्वस हे,
    शिखि शशि श्याम ललाम विहाम सुनाम स्वबाम सुधारस हे।
    कुसुमित कुंज मुकुंद मनोहर मोहन मिथ्य विदारक श्री,
    प्रियपति संग प्रिया शिखि वर्ण विहार महोदधि पालक श्री।

    अविरल आदिक आद्य अनादिक देखि छ्वी हिय भार हरी,
    सरस सुधामय सम्यक नाहि विभा प्रभु मोहि विचार हरी।
    प्रभु विनती जुबती सुमती कुमती करतार कृपाल हरी
    नित नव नेति विहान नियंत्रक नौमि नरायण भाल हरी।

    छण किह कारज ठानि सुआनि परे प्रभु भोर निशा घन की।
    कहु किह कृत्य सुकृत्य प्रभू जिह जानि सकै करुणा मन की।
    व्यथित विचार अचार महा व्यभिचार पुकार प्रियापति हे,
    सुमिरु रसाल तिहूँ कर जोरि हरौ भय मोरि विभोर महे।

    गिरिवर गोपिक ग्वाल मराल सुभाल यशोमति लाल नमो,
    अमिय अलौकिक अम्बु सु अन्त्य अनंत्य अनादि स्वभाल नमो।
    मनहर मुग्ध मनोहर माधव मोहन मीत सुजीत नमो,
    वरुण विभावरि वर्ण विदारक वक्ष विकार विनीत नमो।

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