• anshuman_mishra 7w

    |3.12.21|

    वज़्न - 1222 1222 1222 1222

    Read More

    क्या किया जाए!

    लुटी कश्ती, नहीं कोई किनारा.. क्या किया जाए!
    हमारा था जो कल, अब है तुम्हारा, क्या किया जाए!

    इधर थी प्यास काफी, और उधर थी ज़हर की बोतल,
    था मरना हर तरफ से तय हमारा.. क्या किया जाए!

    मगर हमको नहीं लगता मुनासिब... बद्दुआ देना,
    कि जिसने जान ली, था जां से प्यारा, क्या किया जाए!

    अभी कल तक हरी थीं, आज ये जो सूख आईं हैं,
    कि बेलें मर चुकीं हो बे’सहारा, क्या किया जाए!

    कि जिन हाथों ने सींचा कल तलक था प्यार से इसको
    उन्हीं हाथों, शज़र कटता बेचारा, क्या किया जाए!

    कि वो नज़रें भी हैं पहचानने से अब मना करतीं,
    जिन्होंने था कभी जी भर निहारा, क्या किया जाए!

    सभी मशरूफ थे, उस चांद की तारीफ करने में,
    किसी को ना दिखा रोता सितारा, क्या किया जाए!

    क्या किया जाए..

    _अंशुमान मिश्र___